आंग्ल-मैसूर और आंग्ल-मराठा युद्ध: महत्वपूर्ण युद्ध एवं संधियाँ
भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का इतिहास केवल व्यापार तक सीमित नहीं था, बल्कि यह अनेक युद्धों, राजनीतिक संघर्षों और संधियों से होकर गुजरा। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब मुगल साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हुआ, तब भारत में कई क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरकर सामने आईं। इनमें मैसूर राज्य, मराठा साम्राज्य, हैदराबाद, सिख साम्राज्य तथा बंगाल प्रमुख थे। इसी समय ईस्ट इंडिया कंपनी भी धीरे-धीरे एक व्यापारिक संस्था से राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो रही थी।
प्लासी का युद्ध (1757) और बक्सर का युद्ध (1764) जीतने के बाद अंग्रेज़ों ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद उनका अगला उद्देश्य दक्षिण और पश्चिम भारत की शक्तिशाली रियासतों को अपने अधीन करना था। इस विस्तारवादी नीति के कारण अंग्रेज़ों का संघर्ष सबसे पहले मैसूर राज्य और बाद में मराठा साम्राज्य से हुआ।
मैसूर के शासक हैदर अली और उनके पुत्र टीपू सुल्तान अंग्रेज़ों की बढ़ती शक्ति को रोकना चाहते थे। दूसरी ओर, मराठा साम्राज्य अभी भी भारत की सबसे प्रभावशाली सैन्य शक्तियों में से एक था। अंग्रेज़ जानते थे कि जब तक मैसूर और मराठों जैसी शक्तियाँ स्वतंत्र रहेंगी, तब तक पूरे भारत पर उनका प्रभुत्व स्थापित नहीं हो सकता। यही कारण था कि उन्होंने कई वर्षों तक लगातार युद्ध किए और विभिन्न राजनीतिक संधियों के माध्यम से भारतीय राज्यों को कमजोर किया।
आंग्ल-मैसूर युद्धों की श्रृंखला 1767 से 1799 तक चली। इन चार युद्धों में अंग्रेज़ों को कभी सफलता मिली तो कभी उन्हें कठिन पराजय का सामना करना पड़ा। विशेष रूप से द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध में हैदर अली और टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों को गंभीर चुनौती दी। हालांकि अंततः चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799) में टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त हुए और मैसूर पर अंग्रेज़ों का प्रभाव स्थापित हो गया। इसके साथ ही दक्षिण भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व लगभग सुनिश्चित हो गया।
दक्षिण भारत पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद अंग्रेज़ों का ध्यान पश्चिम भारत की ओर गया, जहाँ मराठा साम्राज्य एक बड़ी शक्ति के रूप में मौजूद था। मराठा संघ के भीतर आंतरिक मतभेद, पेशवा पद के लिए संघर्ष तथा विभिन्न मराठा सरदारों के बीच प्रतिस्पर्धा का लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाया। 1775 से 1818 के बीच हुए तीन आंग्ल-मराठा युद्धों ने मराठा साम्राज्य की शक्ति को समाप्त कर दिया और अंग्रेज़ों को भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बना दिया।
इन युद्धों के दौरान केवल सैन्य शक्ति ही निर्णायक नहीं थी, बल्कि कूटनीति (Diplomacy) भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। अंग्रेज़ों ने कई महत्वपूर्ण संधियाँ कीं, जिनमें मद्रास की संधि (1769), मैंगलोर की संधि (1784), श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792), सालबाई की संधि (1782) तथा बसीन की संधि (1802) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन संधियों ने भारतीय राज्यों की स्वतंत्रता को धीरे-धीरे सीमित किया और ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।
आंग्ल-मैसूर और आंग्ल-मराठा युद्ध केवल दो राज्यों और अंग्रेज़ों के बीच हुए संघर्ष नहीं थे, बल्कि ये भारत के राजनीतिक इतिहास के ऐसे निर्णायक मोड़ थे जिन्होंने पूरे उपमहाद्वीप की सत्ता व्यवस्था को बदल दिया। इन युद्धों के परिणामस्वरूप अंग्रेज़ों को दक्षिण और पश्चिम भारत में स्थायी राजनीतिक तथा सैन्य प्रभुत्व प्राप्त हुआ, जबकि भारतीय शक्तियों की स्वतंत्रता लगातार कमजोर होती गई।
आधुनिक भारतीय इतिहास में इन युद्धों का अध्ययन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन्हीं संघर्षों के बाद अंग्रेज़ों ने सहायक संधि (Subsidiary Alliance) जैसी नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया और बाद में लॉर्ड वेलेजली तथा लॉर्ड हेस्टिंग्स जैसे गवर्नर-जनरलों ने पूरे भारत में ब्रिटिश सत्ता का तेजी से विस्तार किया। यही घटनाएँ आगे चलकर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की मजबूत नींव बनीं।
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से भी यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। UPSC, SSC, Railway, State PCS, NDA, CDS तथा अन्य परीक्षाओं में आंग्ल-मैसूर युद्धों की संख्या, वर्ष, प्रमुख सेनानायक, महत्वपूर्ण संधियाँ, टीपू सुल्तान एवं हैदर अली का योगदान, आंग्ल-मराठा युद्धों के कारण, परिणाम तथा बसीन एवं सालबाई की संधियाँ नियमित रूप से पूछी जाती हैं। इसलिए इन सभी घटनाओं का क्रमबद्ध अध्ययन प्रत्येक अभ्यर्थी के लिए आवश्यक है।
इस लेख में आप क्या सीखेंगे?
इस विस्तृत लेख में हम निम्नलिखित विषयों का क्रमवार अध्ययन करेंगे—
आंग्ल-मैसूर युद्ध का परिचय (Anglo-Mysore Wars)
18वीं शताब्दी के मध्य तक दक्षिण भारत का मैसूर राज्य भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे शक्तिशाली रियासतों में से एक बन चुका था। प्रारंभ में मैसूर पर वोडेयार (Wodeyar) वंश का शासन था, किंतु समय के साथ सेना के एक कुशल सेनापति हैदर अली ने अपनी प्रतिभा, सैन्य कौशल और राजनीतिक सूझबूझ के बल पर राज्य की वास्तविक सत्ता अपने हाथों में ले ली। उनके नेतृत्व में मैसूर ने अपनी सैन्य शक्ति को अत्यधिक सुदृढ़ किया और दक्षिण भारत में एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में उभरा।
उसी समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी व्यापार के साथ-साथ राजनीतिक विस्तार की नीति अपना रही थी। बंगाल में सफलता प्राप्त करने के बाद अंग्रेज़ों की दृष्टि दक्षिण भारत पर पड़ी। लेकिन यहाँ उन्हें मैसूर जैसी संगठित और आधुनिक सैन्य शक्ति का सामना करना पड़ा। यही कारण था कि अंग्रेज़ों और मैसूर के बीच लगभग 32 वर्षों (1767–1799) तक लगातार संघर्ष चलता रहा।
आंग्ल-मैसूर युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं थे, बल्कि यह दक्षिण भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने की लड़ाई थी। इन युद्धों में अंग्रेज़ों का मुकाबला पहले हैदर अली और बाद में उनके पुत्र टीपू सुल्तान से हुआ। दोनों शासकों ने अंग्रेज़ों के विस्तारवाद का दृढ़ता से विरोध किया और आधुनिक हथियारों, अनुशासित सेना तथा प्रभावी कूटनीति के माध्यम से लंबे समय तक अंग्रेज़ों को चुनौती दी।
इन युद्धों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी थी कि अंग्रेज़ों ने कई भारतीय रियासतों, विशेषकर हैदराबाद के निज़ाम तथा समय-समय पर मराठों के साथ गठबंधन कर मैसूर को अलग-थलग करने का प्रयास किया। दूसरी ओर, हैदर अली और टीपू सुल्तान ने भी फ्रांस सहित अन्य विदेशी शक्तियों से सहयोग प्राप्त करने की कोशिश की। इस प्रकार आंग्ल-मैसूर युद्ध केवल दो राज्यों के बीच संघर्ष नहीं थे, बल्कि उस समय की अंतरराष्ट्रीय राजनीति से भी जुड़े हुए थे।
इन चार युद्धों का अंतिम परिणाम यह हुआ कि 1799 ई. में चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त हुए और मैसूर पर अंग्रेज़ों का प्रभाव स्थापित हो गया। इसके बाद दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की शक्ति लगभग निर्विवाद हो गई और ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग और अधिक प्रशस्त हुआ।
हैदर अली (Hyder Ali)
प्रारंभिक जीवन
हैदर अली का जन्म लगभग 1720 ई. में हुआ था। वे किसी राजवंश से संबंधित नहीं थे, बल्कि अपनी असाधारण सैन्य क्षमता के कारण मैसूर की सेना में उच्च पद तक पहुँचे। धीरे-धीरे उन्होंने राज्य के प्रशासन और सेना पर नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा मैसूर के वास्तविक शासक बन गए।
हैदर अली औपचारिक रूप से अधिक शिक्षित नहीं थे, लेकिन वे एक उत्कृष्ट सेनानायक, कुशल प्रशासक और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने सेना का आधुनिकीकरण किया, तोपखाने को मजबूत बनाया तथा यूरोपीय सैन्य तकनीकों को अपनाया।
हैदर अली का योगदान
- मैसूर की सेना को आधुनिक बनाया।
- यूरोपीय शैली की सैन्य व्यवस्था विकसित की।
- शक्तिशाली तोपखाने का निर्माण किया।
- अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति का सबसे पहले प्रभावी विरोध किया।
- फ्रांसीसियों से मित्रता स्थापित कर अंग्रेज़ों के विरुद्ध संतुलन बनाने का प्रयास किया।
- दक्षिण भारत में मैसूर को एक शक्तिशाली राज्य के रूप में स्थापित किया।
हैदर अली का महत्व
यदि हैदर अली अंग्रेज़ों का विरोध न करते, तो संभवतः दक्षिण भारत पर अंग्रेज़ों का अधिकार बहुत पहले स्थापित हो जाता। उन्होंने लगभग दो दशकों तक अंग्रेज़ों की प्रगति को रोककर रखा और भारतीय इतिहास में विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया।
टीपू सुल्तान (Tipu Sultan)
हैदर अली की मृत्यु 1782 ई. में हुई। इसके बाद उनके पुत्र टीपू सुल्तान मैसूर के शासक बने। टीपू सुल्तान अपने साहस, आधुनिक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध थे। उन्हें इतिहास में “मैसूर का शेर (Tiger of Mysore)” कहा जाता है।
टीपू सुल्तान ने अपने पिता की नीतियों को आगे बढ़ाते हुए अंग्रेज़ों का लगातार विरोध किया। उन्होंने सेना को और अधिक आधुनिक बनाया तथा रॉकेट तकनीक (Mysorean Rockets) का प्रभावी उपयोग किया। बाद में इन्हीं रॉकेटों से प्रेरित होकर यूरोप में आधुनिक सैन्य रॉकेट तकनीक का विकास हुआ।
टीपू सुल्तान ने फ्रांस के साथ मैत्री संबंध स्थापित करने का प्रयास किया और अंग्रेज़ों के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करने की कोशिश की। उन्होंने प्रशासन, व्यापार, मुद्रा व्यवस्था तथा कृषि सुधारों पर भी विशेष ध्यान दिया।
टीपू सुल्तान का योगदान
- आधुनिक रॉकेट तकनीक का सैन्य उपयोग।
- अंग्रेज़ों के विरुद्ध लगातार संघर्ष।
- प्रशासनिक एवं आर्थिक सुधार।
- विदेशी व्यापार को बढ़ावा।
- फ्रांस सहित यूरोपीय शक्तियों से सहयोग का प्रयास।
- मैसूर को आधुनिक सैन्य शक्ति के रूप में विकसित करना।
टीपू सुल्तान की मृत्यु
1799 ई. में चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी मृत्यु के साथ ही मैसूर की स्वतंत्र शक्ति लगभग समाप्त हो गई और दक्षिण भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित हो गया।
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767–1769)
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध अंग्रेज़ों और मैसूर राज्य के बीच हुआ पहला बड़ा सैन्य संघर्ष था। इस युद्ध में एक ओर हैदर अली थे, जबकि दूसरी ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, हैदराबाद के निज़ाम तथा प्रारंभिक चरण में मराठा शक्ति भी अंग्रेज़ों के साथ थी।
युद्ध के प्रमुख कारण
1. अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति
बंगाल में सफलता के बाद अंग्रेज़ दक्षिण भारत में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे। मैसूर इस विस्तार में सबसे बड़ी बाधा था।
2. मैसूर की बढ़ती शक्ति
हैदर अली ने सेना और प्रशासन को मजबूत बनाकर मैसूर को दक्षिण भारत की प्रमुख शक्ति बना दिया था, जिससे अंग्रेज़ चिंतित थे।
3. निज़ाम और मराठों की राजनीति
अंग्रेज़ों ने हैदराबाद के निज़ाम तथा मराठों के साथ गठबंधन कर मैसूर को कमजोर करने की योजना बनाई।
4. राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
दक्षिण भारत में सर्वोच्च शक्ति बनने की होड़ ने दोनों पक्षों के बीच तनाव को युद्ध में बदल दिया।
युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
युद्ध के प्रारंभिक चरण में अंग्रेज़ों को कुछ सफलताएँ मिलीं, लेकिन हैदर अली ने अपनी सैन्य रणनीति और तेज़ गति से किए गए अभियानों के माध्यम से स्थिति बदल दी।
1769 ई. में हैदर अली अपनी सेना के साथ तेज़ी से आगे बढ़ते हुए मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के निकट पहुँच गए। अंग्रेज़ इस अप्रत्याशित स्थिति के लिए तैयार नहीं थे। परिणामस्वरूप उन्हें संधि करने के लिए विवश होना पड़ा।
मद्रास की संधि (Treaty of Madras), 1769
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत 1769 ई. की मद्रास की संधि से हुआ।
इस संधि की प्रमुख शर्तें थीं—
- दोनों पक्ष एक-दूसरे के विजित प्रदेश लौटाएँगे।
- आवश्यकता पड़ने पर दोनों एक-दूसरे की सैन्य सहायता करेंगे।
- युद्ध समाप्त कर शांति स्थापित की जाएगी।
यद्यपि यह संधि हुई, लेकिन अंग्रेज़ों ने बाद में इसकी शर्तों का पूरी तरह पालन नहीं किया। यही आगे चलकर द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का एक महत्वपूर्ण कारण बना।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780–1784)
प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद हुई मद्रास की संधि (1769) से यह अपेक्षा की गई थी कि अंग्रेज़ और मैसूर के बीच स्थायी शांति स्थापित होगी। परंतु ऐसा नहीं हुआ। कुछ ही वर्षों में दोनों पक्षों के बीच अविश्वास बढ़ने लगा। अंग्रेज़ों ने संधि की शर्तों का पूरी तरह पालन नहीं किया और दक्षिण भारत में अपने प्रभाव का विस्तार जारी रखा। दूसरी ओर, हैदर अली अंग्रेज़ों की नीतियों से अत्यंत असंतुष्ट थे और उन्हें विश्वास हो गया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी का वास्तविक उद्देश्य पूरे दक्षिण भारत पर अधिकार करना है।
इसी बीच अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों के बीच वैश्विक स्तर पर संघर्ष तेज़ हो गया। फ्रांस, मैसूर का महत्वपूर्ण सहयोगी था। जब अंग्रेज़ों ने माहे (Mahé) नामक फ्रांसीसी बंदरगाह पर अधिकार कर लिया, तो हैदर अली ने इसे मैसूर के हितों पर सीधा आक्रमण माना। यही घटना द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का तत्काल कारण बनी।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के प्रमुख कारण
1. मद्रास की संधि का उल्लंघन
1769 की मद्रास संधि के अनुसार दोनों पक्ष आवश्यकता पड़ने पर एक-दूसरे की सहायता करेंगे। लेकिन जब मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया, तब अंग्रेज़ों ने हैदर अली की सहायता नहीं की। इससे दोनों पक्षों के संबंध अत्यंत खराब हो गए।
2. अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति
ईस्ट इंडिया कंपनी दक्षिण भारत में अपना राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव बढ़ाना चाहती थी। मैसूर इस नीति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा था।
3. माहे (Mahé) पर अंग्रेज़ों का अधिकार
माहे फ्रांसीसियों का महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था और मैसूर का सहयोगी भी था। अंग्रेज़ों द्वारा माहे पर कब्ज़ा किए जाने से हैदर अली ने इसे अपने विरुद्ध शत्रुतापूर्ण कदम माना।
4. फ्रांस और मैसूर की मित्रता
हैदर अली ने अंग्रेज़ों का मुकाबला करने के लिए फ्रांस से सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया। अंग्रेज़ इस गठबंधन को अपने लिए गंभीर खतरा मानते थे।
युद्ध का प्रारंभ
1780 ई. में हैदर अली ने लगभग 80,000 सैनिकों के साथ कर्नाटक क्षेत्र पर आक्रमण किया। उनकी सेना सुव्यवस्थित, प्रशिक्षित और आधुनिक हथियारों से सुसज्जित थी। युद्ध के प्रारंभिक चरण में अंग्रेज़ों को लगातार पराजय का सामना करना पड़ा।
पोलिलूर का युद्ध (Battle of Pollilur), 1780
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण घटना पोलिलूर का युद्ध था।
इस युद्ध में हैदर अली और उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों की सेना को करारी पराजय दी। इसे भारत में अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी प्रारंभिक सैन्य हारों में से एक माना जाता है।
इस युद्ध में मैसूर की सेना ने आधुनिक मिसाइल एवं रॉकेट तकनीक (Mysorean Rockets) का प्रभावी उपयोग किया। इन रॉकेटों ने अंग्रेज़ी सेना में भारी अव्यवस्था फैला दी और युद्ध का परिणाम मैसूर के पक्ष में गया।
पोलिलूर युद्ध का महत्व
- अंग्रेज़ों की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचा।
- हैदर अली की सैन्य क्षमता पूरे भारत में प्रसिद्ध हुई।
- मैसूर की आधुनिक सैन्य तकनीक की शक्ति सिद्ध हुई।
- अंग्रेज़ों को अपनी सैन्य रणनीति में बड़े परिवर्तन करने पड़े।
हैदर अली की मृत्यु (1782)
युद्ध के दौरान 1782 ई. में हैदर अली का निधन हो गया। उनकी मृत्यु बीमारी के कारण हुई।
हालाँकि उनके निधन के बाद भी युद्ध समाप्त नहीं हुआ। उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने युद्ध का नेतृत्व संभाला और अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा।
टीपू सुल्तान का नेतृत्व
टीपू सुल्तान ने अपने पिता की नीति को आगे बढ़ाया और अंग्रेज़ों के विरुद्ध पूरी शक्ति से युद्ध किया। उन्होंने—
- सेना का पुनर्गठन किया।
- आधुनिक हथियारों का प्रयोग जारी रखा।
- फ्रांस से सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया।
- दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों की प्रगति को रोकने का प्रयास किया।
टीपू सुल्तान की सैन्य प्रतिभा और साहस के कारण अंग्रेज़ों को निर्णायक विजय प्राप्त नहीं हो सकी।
मैंगलोर की संधि (Treaty of Mangalore), 1784
लगातार चार वर्षों तक चले संघर्ष के बाद दोनों पक्ष थक चुके थे। अंततः 11 मार्च 1784 को मैंगलोर की संधि हुई, जिसने द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत किया।
संधि की प्रमुख शर्तें
- दोनों पक्ष एक-दूसरे के विजित प्रदेश वापस करेंगे।
- सभी युद्धबंदियों को मुक्त किया जाएगा।
- दोनों राज्यों के बीच शांति स्थापित की जाएगी।
- भविष्य में एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
मैंगलोर की संधि का महत्व
मैंगलोर की संधि भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
- यह अंग्रेज़ों और किसी भारतीय शासक के बीच समान स्तर (Equal Terms) पर हुई अंतिम प्रमुख संधियों में से एक थी।
- इससे यह स्पष्ट हुआ कि मैसूर अभी भी अंग्रेज़ों के सामने एक शक्तिशाली राज्य था।
- टीपू सुल्तान की राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ी।
- अंग्रेज़ों ने भविष्य में मैसूर को पूर्णतः समाप्त करने की रणनीति बनानी शुरू कर दी।
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के परिणाम
अंग्रेज़ों के लिए
- दक्षिण भारत में तत्काल निर्णायक सफलता नहीं मिली।
- मैसूर की सैन्य शक्ति का सही आकलन हुआ।
- भविष्य में अधिक संगठित सैन्य अभियान की योजना बनाई गई।
मैसूर के लिए
- टीपू सुल्तान की प्रतिष्ठा बढ़ी।
- राज्य की स्वतंत्रता बनी रही।
- अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने का आत्मविश्वास मिला।
भारतीय इतिहास पर प्रभाव
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध ने सिद्ध कर दिया कि यदि भारतीय शक्तियाँ संगठित और आधुनिक सैन्य तकनीक से लैस हों, तो वे अंग्रेज़ों को गंभीर चुनौती दे सकती हैं। यही कारण है कि अंग्रेज़ों ने बाद के वर्षों में सहायक संधि (Subsidiary Alliance) जैसी नीतियों के माध्यम से भारतीय राज्यों को राजनीतिक रूप से कमजोर करना प्रारंभ किया।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| युद्ध | द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध |
| अवधि | 1780–1784 |
| मैसूर का शासक | हैदर अली, बाद में टीपू सुल्तान |
| प्रसिद्ध युद्ध | पोलिलूर का युद्ध (1780) |
| महत्वपूर्ण संधि | मैंगलोर की संधि (1784) |
| विशेष तथ्य | अंग्रेज़ों और भारतीय शासक के बीच समान शर्तों पर हुई अंतिम प्रमुख संधियों में से एक |
याद रखने की ट्रिक (Exam Trick)
“मद्रास में शुरुआत, पोलिलूर में जीत, मैंगलोर में समाप्ति”
- मद्रास की संधि (1769) → प्रथम युद्ध का अंत
- पोलिलूर (1780) → द्वितीय युद्ध की सबसे बड़ी विजय
- मैंगलोर की संधि (1784) → द्वितीय युद्ध का अंत
यह क्रम UPSC, SSC, Railway और State PCS परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाता है।
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790–1792)
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद हुई मैंगलोर की संधि (1784) ने कुछ समय के लिए अंग्रेज़ों और मैसूर के बीच शांति स्थापित कर दी थी। लेकिन यह शांति अधिक समय तक नहीं टिक सकी। टीपू सुल्तान अपनी सैन्य शक्ति को लगातार बढ़ा रहे थे और दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों के प्रभाव को चुनौती दे रहे थे। दूसरी ओर, अंग्रेज़ भी यह समझ चुके थे कि जब तक मैसूर एक शक्तिशाली राज्य बना रहेगा, तब तक दक्षिण भारत में उनका पूर्ण प्रभुत्व स्थापित नहीं हो सकता।
इसी अवधि में भारत के नए गवर्नर-जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस (Lord Cornwallis) ने मैसूर के विरुद्ध व्यापक सैन्य अभियान की योजना बनाई। उन्होंने केवल अंग्रेज़ी सेना पर निर्भर रहने के बजाय हैदराबाद के निज़ाम तथा मराठों को भी अपने साथ मिला लिया। इस प्रकार पहली बार टीपू सुल्तान को तीन शक्तियों के संयुक्त मोर्चे का सामना करना पड़ा।
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के प्रमुख कारण
1. त्रावणकोर (Travancore) पर आक्रमण
तत्कालीन समय में त्रावणकोर अंग्रेज़ों का मित्र राज्य था। 1789 ई. में टीपू सुल्तान ने त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया।
अंग्रेज़ों ने इसे मैंगलोर की संधि का उल्लंघन तथा अपने हितों पर सीधा आक्रमण माना। यही इस युद्ध का तत्काल कारण बना।
2. टीपू सुल्तान की बढ़ती शक्ति
टीपू सुल्तान अपनी सेना का आधुनिकीकरण कर रहे थे। उन्होंने नए हथियार, आधुनिक तोपखाना तथा रॉकेट तकनीक का विकास किया। इससे अंग्रेज़ों को भय था कि भविष्य में मैसूर और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा।
3. फ्रांस से संबंध
टीपू सुल्तान फ्रांस के साथ मित्रता बनाए हुए थे। उस समय फ्रांस और ब्रिटेन यूरोप में कट्टर प्रतिद्वंद्वी थे। इसलिए अंग्रेज़ किसी भी स्थिति में नहीं चाहते थे कि फ्रांसीसी प्रभाव दक्षिण भारत में बढ़े।
4. अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति
ईस्ट इंडिया कंपनी का उद्देश्य केवल व्यापार नहीं रह गया था। अब वह पूरे भारत में अपना राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना चाहती थी। मैसूर इस लक्ष्य की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक था।
युद्ध में शामिल पक्ष
अंग्रेज़ों के पक्ष में
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी
- हैदराबाद का निज़ाम
- मराठा संघ
मैसूर के पक्ष में
- टीपू सुल्तान
- मैसूर की सेना
लॉर्ड कॉर्नवालिस की भूमिका
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने स्वयं सेना का नेतृत्व किया।
उन्होंने एक सुनियोजित रणनीति अपनाई—
- मैसूर को चारों ओर से घेरना।
- मराठों और निज़ाम की सहायता प्राप्त करना।
- टीपू सुल्तान को अलग-थलग करना।
- राजधानी श्रीरंगपट्टनम की ओर बढ़ना।
कॉर्नवालिस की इस संयुक्त सैन्य रणनीति के कारण धीरे-धीरे अंग्रेज़ों को बढ़त मिलने लगी।
युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
युद्ध के प्रारंभिक चरण में टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों का कड़ा मुकाबला किया। लेकिन अंग्रेज़ों की संयुक्त सेना संख्या और संसाधनों में अधिक शक्तिशाली थी।
1791 ई. में अंग्रेज़ों ने बेंगलुरु (Bangalore) पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उनकी सेना सीधे श्रीरंगपट्टनम की ओर बढ़ी।
लगातार संघर्ष और चारों ओर से घिर जाने के कारण टीपू सुल्तान की स्थिति कमजोर होती गई। अंततः उन्हें संधि करने के लिए विवश होना पड़ा।
श्रीरंगपट्टनम की संधि (Treaty of Seringapatam), 1792
1792 ई. में तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत श्रीरंगपट्टनम की संधि से हुआ।
यह संधि टीपू सुल्तान के लिए अत्यंत कठोर सिद्ध हुई।
संधि की प्रमुख शर्तें
1. आधा राज्य अंग्रेज़ों को देना पड़ा
टीपू सुल्तान को अपने राज्य का लगभग आधा भाग अंग्रेज़ों, मराठों और निज़ाम के बीच बाँटना पड़ा।
2. भारी युद्ध क्षतिपूर्ति
टीपू सुल्तान को लगभग 3 करोड़ रुपये (समकालीन मूल्य के अनुसार) युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में देने पड़े।
3. दो पुत्रों को बंधक बनाना
जब तक पूरी क्षतिपूर्ति का भुगतान नहीं हुआ, तब तक टीपू सुल्तान के दो पुत्रों को अंग्रेज़ों के पास बंधक (Hostage) के रूप में रखा गया।
यह घटना भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक मानी जाती है।
4. अंग्रेज़ों की शक्ति में वृद्धि
इस संधि के बाद दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों का प्रभाव पहले की तुलना में बहुत अधिक बढ़ गया।
श्रीरंगपट्टनम की संधि का महत्व
यह संधि केवल युद्ध समाप्त करने का समझौता नहीं थी, बल्कि दक्षिण भारत की राजनीतिक स्थिति को बदलने वाली घटना थी।
इसके प्रमुख प्रभाव—
- मैसूर की शक्ति काफी कमजोर हो गई।
- टीपू सुल्तान की सैन्य क्षमता पर गंभीर प्रभाव पड़ा।
- अंग्रेज़ों को दक्षिण भारत में विशाल भू-भाग प्राप्त हुआ।
- मराठों और निज़ाम को भी कुछ क्षेत्र मिले।
- अंग्रेज़ों का आत्मविश्वास अत्यधिक बढ़ गया।
- मैसूर अब पहले जैसी बड़ी शक्ति नहीं रहा।
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के परिणाम
मैसूर पर प्रभाव
- राज्य का लगभग आधा भाग खो दिया।
- आर्थिक स्थिति कमजोर हुई।
- राजनीतिक प्रभाव घट गया।
- सेना की शक्ति कम हो गई।
अंग्रेज़ों पर प्रभाव
- दक्षिण भारत में प्रभुत्व मजबूत हुआ।
- अंग्रेज़ों की प्रतिष्ठा बढ़ी।
- भविष्य में मैसूर को पूरी तरह समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
भारतीय इतिहास पर प्रभाव
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद अंग्रेज़ों का विश्वास और अधिक मजबूत हो गया कि यदि भारतीय राज्यों को अलग-थलग कर दिया जाए, तो उन्हें आसानी से पराजित किया जा सकता है। यही रणनीति आगे चलकर चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध तथा आंग्ल-मराठा युद्धों में अपनाई गई।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| युद्ध | तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध |
| अवधि | 1790–1792 |
| मैसूर का शासक | टीपू सुल्तान |
| अंग्रेज़ों का नेतृत्व | लॉर्ड कॉर्नवालिस |
| प्रमुख संधि | श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792) |
| सबसे महत्वपूर्ण शर्त | टीपू सुल्तान ने अपने दो पुत्रों को बंधक दिया |
| परिणाम | मैसूर ने लगभग आधा राज्य खो दिया |
याद रखने की ट्रिक (Exam Trick)
“कॉर्नवालिस आया – बेंगलुरु जीता – श्रीरंगपट्टनम पहुँचा – आधा राज्य लिया।”
या संक्षेप में—
कॉर्नवालिस → बेंगलुरु → श्रीरंगपट्टनम → आधा राज्य
यह क्रम UPSC, SSC, Railway, NDA और State PCS परीक्षाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध – एक नज़र में
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| प्रारंभ | 1790 ई. |
| कारण | त्रावणकोर पर टीपू का आक्रमण |
| अंग्रेज़ों के सहयोगी | मराठा + निज़ाम |
| गवर्नर-जनरल | लॉर्ड कॉर्नवालिस |
| अंत | श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792) |
| सबसे बड़ा परिणाम | मैसूर की शक्ति में भारी कमी |
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)
तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790–1792) और श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792) के बाद मैसूर राज्य की शक्ति पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुकी थी। राज्य का लगभग आधा भाग अंग्रेज़ों, मराठों और हैदराबाद के निज़ाम को देना पड़ा था तथा भारी युद्ध क्षतिपूर्ति भी देनी पड़ी थी। इसके बावजूद टीपू सुल्तान ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी सेना का पुनर्गठन किया, प्रशासन को सुदृढ़ बनाया और अंग्रेज़ों के बढ़ते प्रभाव का विरोध जारी रखा।
उधर, 1798 ई. में लॉर्ड वेलेजली (Lord Wellesley) भारत के गवर्नर-जनरल बने। वे ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के कट्टर समर्थक थे। उनका मानना था कि यदि भारत में अंग्रेज़ों को स्थायी राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना है, तो सबसे पहले मैसूर जैसी स्वतंत्र और शक्तिशाली रियासतों को समाप्त करना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से उन्होंने सहायक संधि (Subsidiary Alliance) की नीति को तेजी से लागू करना शुरू किया।
टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए फ्रांस, अफ़ग़ानिस्तान तथा उस्मानी (तुर्की) साम्राज्य से संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया। उस समय यूरोप में नेपोलियन बोनापार्ट का प्रभाव बढ़ रहा था और अंग्रेज़ों को आशंका थी कि यदि टीपू को फ्रांसीसी सहायता मिल गई, तो दक्षिण भारत में उनकी स्थिति कमजोर हो सकती है। इसलिए अंग्रेज़ों ने युद्ध की तैयारी तेज़ कर दी।
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के प्रमुख कारण
1. लॉर्ड वेलेजली की विस्तारवादी नीति
लॉर्ड वेलेजली भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का तेजी से विस्तार करना चाहते थे। उनके अनुसार मैसूर अंग्रेज़ों के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा था।
2. सहायक संधि (Subsidiary Alliance)
वेलेजली भारतीय राज्यों को सहायक संधि स्वीकार करने के लिए बाध्य कर रहे थे। इस नीति के अंतर्गत भारतीय राज्यों को अंग्रेज़ी सेना रखना, उसका खर्च उठाना तथा विदेशी संबंधों पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण स्वीकार करना पड़ता था।
टीपू सुल्तान ने इस नीति को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया।
3. फ्रांस से टीपू के संबंध
टीपू सुल्तान ने फ्रांस से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। अंग्रेज़ों ने इसे अपने साम्राज्य के लिए गंभीर खतरे के रूप में देखा।
4. मैसूर को समाप्त करने की ब्रिटिश योजना
अब अंग्रेज़ केवल युद्ध जीतना नहीं चाहते थे, बल्कि मैसूर की स्वतंत्र शक्ति का पूर्ण अंत करना चाहते थे।
युद्ध में शामिल पक्ष
अंग्रेज़ों के पक्ष में
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी
- हैदराबाद का निज़ाम
ध्यान दें: इस युद्ध में मराठों ने प्रत्यक्ष रूप से निर्णायक सैन्य भूमिका नहीं निभाई, जबकि निज़ाम अंग्रेज़ों का प्रमुख सहयोगी था।
मैसूर के पक्ष में
- टीपू सुल्तान
- मैसूर की सेना
युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
1799 ई. में अंग्रेज़ों ने कई दिशाओं से मैसूर पर आक्रमण किया।
अंग्रेज़ी सेना ने क्रमशः मैसूर के महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार करते हुए राजधानी श्रीरंगपट्टनम (Srirangapatna) को घेर लिया।
टीपू सुल्तान ने अंतिम समय तक आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया। उन्होंने स्वयं युद्ध का नेतृत्व किया और राजधानी की रक्षा के लिए अंतिम क्षण तक संघर्ष किया।
श्रीरंगपट्टनम का युद्ध (1799)
4 मई 1799 को अंग्रेज़ी सेना ने श्रीरंगपट्टनम के किले पर अंतिम आक्रमण किया।
भीषण युद्ध के दौरान टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त हुए।
उनकी मृत्यु किले के द्वार के निकट युद्ध करते हुए हुई। उन्होंने अंत तक आत्मसमर्पण नहीं किया।
उनसे जुड़ा प्रसिद्ध कथन है—
“शेर की एक दिन की जिंदगी गीदड़ की सौ साल की जिंदगी से बेहतर होती है।”
हालाँकि इस कथन की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर इतिहासकारों में मतभेद हैं, फिर भी यह टीपू सुल्तान के साहस का लोकप्रिय प्रतीक माना जाता है।
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध का परिणाम
टीपू सुल्तान की मृत्यु के साथ ही मैसूर की स्वतंत्र शक्ति का अंत हो गया।
इसके बाद अंग्रेज़ों ने मैसूर राज्य का पुनर्गठन किया।
प्रमुख परिणाम
1. वोडेयार वंश की पुनर्स्थापना
अंग्रेज़ों ने मैसूर में पुनः वोडेयार वंश को शासन सौंप दिया, लेकिन वास्तविक नियंत्रण अंग्रेज़ों के हाथ में रहा।
2. सहायक संधि लागू
मैसूर को अंग्रेज़ों की सहायक संधि स्वीकार करनी पड़ी।
अब राज्य की विदेश नीति और सुरक्षा पर अंग्रेज़ों का प्रभाव स्थापित हो गया।
3. अंग्रेज़ों का क्षेत्रीय विस्तार
मैसूर का एक बड़ा भाग अंग्रेज़ों तथा उनके सहयोगी हैदराबाद के निज़ाम के बीच बाँट दिया गया।
4. दक्षिण भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व
इस युद्ध के बाद दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी समाप्त हो गया।
अब अंग्रेज़ों का ध्यान पश्चिम भारत के मराठा साम्राज्य की ओर गया।
चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध का महत्व
इस युद्ध का भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
- दक्षिण भारत में अंग्रेज़ों का प्रभुत्व स्थापित हुआ।
- टीपू सुल्तान के रूप में अंग्रेज़ों का सबसे शक्तिशाली विरोधी समाप्त हुआ।
- सहायक संधि नीति को व्यापक सफलता मिली।
- ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का मार्ग लगभग साफ हो गया।
- आगे चलकर अंग्रेज़ों ने मराठों के विरुद्ध निर्णायक अभियान शुरू किए।
चारों आंग्ल-मैसूर युद्ध – एक साथ
| युद्ध | वर्ष | मैसूर का शासक | प्रमुख संधि / परिणाम |
|---|---|---|---|
| प्रथम | 1767–1769 | हैदर अली | मद्रास की संधि (1769) |
| द्वितीय | 1780–1784 | हैदर अली, टीपू सुल्तान | मैंगलोर की संधि (1784) |
| तृतीय | 1790–1792 | टीपू सुल्तान | श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792) |
| चतुर्थ | 1799 | टीपू सुल्तान | टीपू की मृत्यु, मैसूर पर अंग्रेज़ी प्रभुत्व |
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| कुल आंग्ल-मैसूर युद्ध | 4 |
| प्रथम युद्ध का शासक | हैदर अली |
| अंतिम युद्ध का शासक | टीपू सुल्तान |
| टीपू सुल्तान की मृत्यु | 4 मई 1799, श्रीरंगपट्टनम |
| अंतिम गवर्नर-जनरल | लॉर्ड वेलेजली |
| युद्ध का सबसे बड़ा परिणाम | दक्षिण भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व |
याद रखने की ट्रिक (Exam Trick)
चारों युद्ध और संधियाँ याद रखने की आसान ट्रिक—
“मद्रास → मैंगलोर → श्रीरंगपट्टनम → श्रीरंगपट्टनम का पतन”
या
1769 → 1784 → 1792 → 1799
- 1769 → मद्रास की संधि
- 1784 → मैंगलोर की संधि
- 1792 → श्रीरंगपट्टनम की संधि
- 1799 → टीपू सुल्तान की वीरगति
आंग्ल-मैसूर युद्धों का समग्र प्रभाव
चारों युद्धों ने भारत के राजनीतिक इतिहास की दिशा बदल दी।
- अंग्रेज़ों ने दक्षिण भारत में अपना स्थायी प्रभुत्व स्थापित किया।
- भारतीय शक्तियों की एकता की कमी का लाभ अंग्रेज़ों को मिला।
- सहायक संधि जैसी नीतियाँ सफल हुईं।
- ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का अगला लक्ष्य मराठा साम्राज्य बना।
यहीं से भारतीय इतिहास का अगला महत्वपूर्ण अध्याय आंग्ल-मराठा युद्ध प्रारंभ होता है, जिसने अंततः पूरे भारत में ब्रिटिश सत्ता को सर्वोच्च बना दिया।
I. आंग्ल-मैसूर युद्ध (मैसूर का उत्थान और पतन)
- मैसूर राज्य की स्थापना 18वीं सदी में किसने की थी? – हैदर अली (1761)।
- हैदर अली मैसूर का शासक बनने से पहले क्या था? – डिंडीगुल का फौजदार।
- हैदर अली ने आधुनिक शस्त्रागार (Arsenal) कहाँ स्थापित किया था? – डिंडीगुल (फ्रांसीसियों की मदद से)।
- प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध की अवधि क्या थी? – 1767-1769 ई.।
- प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध किस संधि के साथ समाप्त हुआ? – मद्रास की संधि (1769)।
- प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध में किसकी जीत हुई थी? – हैदर अली की।
- द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-1784) का मुख्य कारण क्या था? – अंग्रेजों द्वारा माहे (Mahé) पर अधिकार करना।
- द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के समय गवर्नर जनरल कौन था? – वॉरन हेस्टिंग्स।
- पोर्टोनोवो का युद्ध (1781) किनके बीच हुआ? – हैदर अली और सर आयर कूट।
- हैदर अली की मृत्यु किस युद्ध के दौरान हुई? – द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1782)।
- द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध किस संधि से समाप्त हुआ? – मंगलौर की संधि (1784)।
- मंगलौर की संधि पर अंग्रेजों की ओर से किसने हस्ताक्षर किए थे? – लॉर्ड मैकार्टनी।
- टीपू सुल्तान मैसूर की गद्दी पर कब बैठा? – 1782 ई.।
- टीपू सुल्तान ने कौन सी उपाधि धारण की थी? – पादशाह (1787)।
- टीपू सुल्तान ने श्रीरंगपट्टनम में किस क्लब की स्थापना की थी? – जैकोबिन क्लब।
- टीपू सुल्तान ने स्वतंत्रता का वृक्ष (Tree of Liberty) कहाँ लगाया था? – श्रीरंगपट्टनम।
- तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792) के समय गवर्नर जनरल कौन था? – लॉर्ड कॉर्नवालिस।
- तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध किस संधि से समाप्त हुआ? – श्रीरंगपट्टनम की संधि (1792)।
- श्रीरंगपट्टनम की संधि के तहत टीपू को अपना कितना राज्य अंग्रेजों को देना पड़ा? – आधा राज्य।
- टीपू को हर्जाने के तौर पर अंग्रेजों को कितने रुपये देने पड़े? – 3 करोड़ रुपये।
- चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध किस वर्ष हुआ? – 1799 ई.।
- चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध के समय गवर्नर जनरल कौन था? – लॉर्ड वेलेजली।
- टीपू सुल्तान किस युद्ध में लड़ते हुए मारा गया? – चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध।
- टीपू की मृत्यु के बाद मैसूर की गद्दी पर किसे बिठाया गया? – वाडियार वंश के बालक कृष्णराज को।
- मैसूर ने अंग्रेजों की ‘सहायक संधि’ (Subsidiary Alliance) कब स्वीकार की? – 1799 ई.।
II. आंग्ल-मराठा युद्ध (मराठा संघ का संघर्ष)
- प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध की अवधि क्या थी? – 1775-1782 ई.।
- प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का तात्कालिक कारण क्या था? – राघोबा (रघुनाथ राव) की पेशवा बनने की महत्वाकांक्षा।
- सूरत की संधि (1775) किनके बीच हुई थी? – रघुनाथ राव और बॉम्बे काउंसिल।
- पुरंदर की संधि (1776) किनके बीच हुई? – कलकत्ता काउंसिल और नाना फड़नवीस।
- प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध किस संधि से समाप्त हुआ? – सालाबाई की संधि (1782)।
- सालाबाई की संधि किसके प्रयासों से हुई थी? – महादजी सिंधिया।
- प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध के समय गवर्नर जनरल कौन था? – वॉरन हेस्टिंग्स।
- सालाबाई की संधि के बाद अंग्रेजों और मराठों के बीच कितने वर्षों तक शांति रही? – 20 वर्ष।
- द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-1805) का मुख्य कारण क्या था? – बेसिन की संधि (1802)।
- बेसिन की संधि किनके बीच हुई थी? – पेशवा बाजीराव द्वितीय और अंग्रेजों के बीच।
- बेसिन की संधि किस प्रकार की संधि थी? – सहायक संधि (Subsidiary Alliance)।
- द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के समय गवर्नर जनरल कौन था? – लॉर्ड वेलेजली।
- देवगाँव की संधि (1803) किनके बीच हुई? – भोंसले और अंग्रेज।
- सुरजी-अर्जुनगाँव की संधि (1803) किनके बीच हुई? – सिंधिया और अंग्रेज।
- राजपुर घाट की संधि (1805) किनके बीच हुई? – होल्कर और अंग्रेज।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध की अवधि क्या थी? – 1817-1818 ई.।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध का मुख्य कारण क्या था? – पिंडारियों का दमन और मराठों का अंतिम प्रयास।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के समय गवर्नर जनरल कौन था? – लॉर्ड हेस्टिंग्स।
- किर्की का युद्ध (Battle of Khadki) में किसने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण किया? – पेशवा बाजीराव द्वितीय।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद पेशवा के पद को क्या किया गया? – समाप्त कर दिया गया।
- बाजीराव द्वितीय को पेंशन देकर कहाँ भेज दिया गया? – बिठूर (कानपुर के पास)।
- मराठा संघ का वह कौन सा सरदार था जो सबसे अंत में अंग्रेजों से हारा? – होल्कर।
- पूना की संधि (1817) किसके साथ हुई थी? – पेशवा बाजीराव द्वितीय।
- मंदसौर की संधि (1818) किसके साथ हुई? – होल्कर।
- मराठा साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण क्या था? – आपसी कलह और आधुनिक सैन्य शक्ति का अभाव।
III. महत्वपूर्ण नीतियां और विविध तथ्य
- ‘मैसूर का शेर’ किसे कहा जाता है? – टीपू सुल्तान।
- टीपू सुल्तान की राजधानी क्या थी? – श्रीरंगपट्टनम।
- ‘नाना फड़नवीस’ को क्या कहा जाता था? – मराठों का मैकियावेली।
- वेलेजली की ‘सहायक संधि’ स्वीकार करने वाला पहला मराठा सरदार कौन था? – पेशवा बाजीराव द्वितीय।
- टीपू सुल्तान ने किन देशों से मदद मांगने के लिए अपने दूत भेजे थे? – फ्रांस, तुर्की, अफगानिस्तान और मॉरीशस।
- अंग्रेजों ने मैसूर विजय के बाद ‘कनारा, कोयंबटूर और श्रीरंगपट्टनम’ को अपने पास रखा।
- लॉर्ड डलहौजी ने सतारा को किस आधार पर हड़पा था? – व्यपगत का सिद्धांत (1848)।
- अंतिम पेशवा कौन था? – बाजीराव द्वितीय।
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने सतारा की गद्दी पर किसे बिठाया? – प्रताप सिंह (शिवाजी के वंशज)।
- ‘नागपुर की संधि’ (1816) किसके साथ हुई थी? – अप्पा साहब भोंसले।
