परिचय
18वीं शताब्दी के मध्य तक भारत में मुगल साम्राज्य का प्रभाव तेजी से कमजोर हो चुका था। विभिन्न प्रांतों के नवाब और शासक लगभग स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे थे। इसी समय अंग्रेज़ी और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियाँ भारत में व्यापार के साथ-साथ राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रही थीं।
बंगाल उस समय भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था। यहाँ की उपजाऊ भूमि, विकसित उद्योग, समृद्ध व्यापार और विशाल राजस्व ने अंग्रेज़ों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। प्रारम्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी केवल व्यापार करना चाहती थी, परन्तु धीरे-धीरे उसने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। इसी संघर्ष ने आगे चलकर प्लासी (1757) और बक्सर (1764) जैसे दो ऐतिहासिक युद्धों को जन्म दिया।
इन दोनों युद्धों ने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी। प्लासी के युद्ध ने अंग्रेज़ों को राजनीतिक शक्ति दिलाई, जबकि बक्सर के युद्ध ने उन्हें भारत में वास्तविक प्रशासनिक और आर्थिक अधिकार प्रदान किए। इसलिए इतिहासकार इन दोनों युद्धों को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव मानते हैं।
प्लासी एवं बक्सर युद्ध (1757–1765)
Quick Revision Timeline
⚔️ प्लासी का युद्ध
- स्थान : प्लासी
- पक्ष : सिराजुद्दौला
- विरोधी : अंग्रेज (रॉबर्ट क्लाइव)
- विशेष : मीर जाफर का विश्वासघात
- परिणाम : अंग्रेजों की विजय
⚔️ बक्सर का युद्ध
- स्थान : बक्सर
- मीर क़ासिम
- शुजाउद्दौला
- शाह आलम द्वितीय
- विजेता : अंग्रेज (हेक्टर मुनरो)
📜 इलाहाबाद की संधि
- दीवानी अधिकार
- बंगाल, बिहार, उड़ीसा
- राजस्व अधिकार
- ब्रिटिश शासन मजबूत
Table of Contents
बंगाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि
बंगाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि
18वीं शताब्दी के मध्य में बंगाल भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था। मुगल साम्राज्य के पतन, नवाबों की स्वायत्तता और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती महत्वाकांक्षा ने प्लासी के युद्ध की भूमिका तैयार की।
अलीवर्दी ख़ाँ का शासन
अलीवर्दी ख़ाँ (1740–1756) एक कुशल एवं सक्षम शासक थे। उनके शासनकाल में बंगाल समृद्ध रहा तथा अंग्रेज़ों को राजनीतिक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं थी।
सिराजुद्दौला का नवाब बनना
1756 में सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। उन्होंने अंग्रेज़ों की किलेबंदी, व्यापारिक विशेषाधिकारों के दुरुपयोग और राजनीतिक हस्तक्षेप का विरोध किया।
फोर्ट विलियम की किलेबंदी
अंग्रेज़ों ने नवाब की अनुमति के बिना कलकत्ता स्थित फोर्ट विलियम की किलेबंदी प्रारम्भ कर दी, जिससे दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ गया।
दस्तक का दुरुपयोग
ईस्ट इंडिया कंपनी ने कर-मुक्त व्यापार (दस्तक) का दुरुपयोग किया, जिससे बंगाल सरकार को भारी राजस्व हानि हुई।
दरबारी षड्यंत्र
मीर जाफर, जगत सेठ तथा अन्य दरबारियों ने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर सिराजुद्दौला के विरुद्ध गुप्त षड्यंत्र रचा।
संघर्ष की शुरुआत
व्यापारिक विवाद, राजनीतिक हस्तक्षेप और आपसी अविश्वास ने अंततः 23 जून 1757 को प्लासी के युद्ध का मार्ग प्रशस्त किया।
बंगाल उस समय भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था। इसी आर्थिक समृद्धि के कारण अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी सबसे पहले बंगाल पर अपना राजनीतिक नियंत्रण स्थापित करना चाहती थी।
18वीं शताब्दी के आरम्भ में बंगाल भारत का सबसे समृद्ध सूबा था। यहाँ के नवाब प्रशासनिक रूप से शक्तिशाली थे और मुगल साम्राज्य की कमजोरी के बावजूद उन्होंने अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखी।
अलीवर्दी ख़ाँ (1740–1756) बंगाल के एक योग्य और कुशल नवाब थे। उन्होंने मराठा आक्रमणों का सामना किया तथा अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों को केवल व्यापार तक सीमित रखने का प्रयास किया। उनके शासनकाल में यूरोपीय कंपनियों को राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं थी।
1756 में अलीवर्दी ख़ाँ की मृत्यु के बाद उनके नाती सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। सिराजुद्दौला एक साहसी और स्वाभिमानी शासक थे, लेकिन उन्हें दरबार के कई प्रभावशाली अधिकारियों का समर्थन प्राप्त नहीं था। मीर जाफर, राय दुर्लभ और जगत सेठ जैसे प्रभावशाली लोग उनके विरोधी बन चुके थे।
इसी समय अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने नवाब की अनुमति के बिना कलकत्ता में किलेबंदी शुरू कर दी। कंपनी अपने व्यापारिक विशेषाधिकारों का दुरुपयोग कर रही थी और करों से बचने के लिए ‘दस्तक’ का अनुचित उपयोग कर रही थी। इससे बंगाल सरकार को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा था।
सिराजुद्दौला ने अंग्रेज़ों को किलेबंदी रोकने और नियमों का पालन करने का आदेश दिया, लेकिन कंपनी ने इसे स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप नवाब और अंग्रेज़ों के बीच तनाव बढ़ता गया और अंततः यह संघर्ष प्लासी के युद्ध में बदल गया।
प्लासी का युद्ध (23 जून 1757)
प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को बंगाल के प्लासी (पालाशी) नामक स्थान पर लड़ा गया। यह युद्ध बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के बीच हुआ, जिसका नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव कर रहे थे।
यद्यपि यह युद्ध कुछ ही घंटों में समाप्त हो गया, लेकिन इसके परिणाम अत्यंत दूरगामी सिद्ध हुए। इस युद्ध ने भारत में अंग्रेज़ों के राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत कर दी और ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक संस्था से राजनीतिक शक्ति में बदल गई।
इतिहासकारों के अनुसार प्लासी का युद्ध केवल सैनिक शक्ति से नहीं, बल्कि षड्यंत्र, विश्वासघात और कूटनीति के कारण जीता गया था। मीर जाफर तथा अन्य दरबारी अधिकारियों ने युद्ध के दौरान सिराजुद्दौला का साथ नहीं दिया, जिससे अंग्रेज़ों की विजय सुनिश्चित हो गई।
प्लासी के युद्ध के प्रमुख कारण
प्लासी के युद्ध के प्रमुख कारण
1757 ई. में प्लासी का युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि राजनीतिक षड्यंत्र, आर्थिक हितों और ब्रिटिश विस्तारवाद का परिणाम था।
व्यापारिक विशेषाधिकारों का दुरुपयोग
अंग्रेज़ों ने दस्तक (Duty Free Pass) का दुरुपयोग कर बंगाल सरकार को भारी राजस्व हानि पहुँचाई।
कलकत्ता की किलेबंदी
अंग्रेज़ों ने नवाब की अनुमति के बिना फोर्ट विलियम की किलेबंदी प्रारम्भ कर दी।
सिराजुद्दौला का विरोध
नवाब अंग्रेज़ों के बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप और शक्ति विस्तार से असंतुष्ट थे।
मीर जाफर का षड्यंत्र
रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर सहित कई दरबारियों से गुप्त समझौता किया।
कलकत्ता पर अधिकार
सिराजुद्दौला द्वारा कलकत्ता पर कब्ज़ा करने से दोनों पक्षों के संबंध और बिगड़ गए।
ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीति
ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के साथ-साथ भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना चाहती थी।
प्लासी के युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
23 जून 1757 को बंगाल के प्लासी (पालाशी) नामक स्थान पर नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। नवाब की सेना संख्या में अंग्रेज़ों की तुलना में कहीं अधिक थी, फिर भी अंग्रेज़ों ने निर्णायक विजय प्राप्त की।
इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण कारण मीर जाफर का विश्वासघात था। युद्ध शुरू होने के बाद मीर जाफर, राय दुर्लभ और यार लुत्फ़ ख़ाँ जैसे प्रमुख सेनानायकों ने अपनी सेना को निष्क्रिय रखा। परिणामस्वरूप सिराजुद्दौला की सेना अकेली पड़ गई।
दूसरी ओर, रॉबर्ट क्लाइव ने पहले से ही षड्यंत्र के माध्यम से नवाब के कई सहयोगियों को अपने पक्ष में कर लिया था। युद्ध के दौरान हुई वर्षा में नवाब की सेना का बारूद भीग गया, जबकि अंग्रेज़ों ने अपने गोला-बारूद को सुरक्षित रखा। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने निर्णायक आक्रमण किया।
युद्ध के बाद सिराजुद्दौला युद्धक्षेत्र छोड़कर भाग गए, लेकिन बाद में उन्हें पकड़कर मीर जाफर के पुत्र मीरन के आदेश पर उनकी हत्या कर दी गई।
प्लासी के युद्ध के परिणाम
1. बंगाल में अंग्रेज़ों का राजनीतिक प्रभुत्व
प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज़ों का बंगाल की राजनीति पर प्रभाव स्थापित हो गया। अब कंपनी केवल व्यापारी संस्था नहीं रही, बल्कि राजनीतिक निर्णयों को भी प्रभावित करने लगी।
2. मीर जाफर बंगाल के नवाब बने
अंग्रेज़ों ने अपने समर्थक मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया। वे नाममात्र के शासक थे, जबकि वास्तविक शक्ति अंग्रेज़ों के हाथ में थी।
3. अंग्रेज़ों को अपार धन प्राप्त हुआ
मीर जाफर ने अंग्रेज़ों को भारी धनराशि, उपहार और व्यापारिक सुविधाएँ प्रदान कीं। इससे ईस्ट इंडिया कंपनी की आर्थिक स्थिति अत्यंत मजबूत हो गई।
4. व्यापारिक अधिकारों का विस्तार
कंपनी को बंगाल में अधिक व्यापारिक सुविधाएँ और विशेषाधिकार प्राप्त हुए। इससे भारतीय व्यापारियों की स्थिति कमजोर होने लगी।
5. ब्रिटिश साम्राज्य की नींव
इतिहासकारों के अनुसार प्लासी का युद्ध भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की वास्तविक शुरुआत था। इस विजय के बाद अंग्रेज़ों ने अन्य भारतीय राज्यों में भी अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया।
प्लासी के युद्ध के परिणाम
1757 का प्लासी युद्ध भारत में ब्रिटिश शासन की शुरुआत का महत्वपूर्ण मोड़ था।
🏛 राजनीतिक परिणाम
सिराजुद्दौला की हार के बाद मीर जाफर बंगाल के नवाब बनाए गए। वास्तविक सत्ता अंग्रेज़ों के हाथ में चली गई।
💰 आर्थिक लाभ
ईस्ट इंडिया कंपनी को अपार धन, व्यापारिक सुविधाएँ तथा 24 परगना की जागीर प्राप्त हुई।
👑 ब्रिटिश साम्राज्य की नींव
कंपनी एक व्यापारिक संस्था से राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गई।
⚔ फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त
बंगाल में फ्रांसीसी शक्ति कमजोर हुई तथा अंग्रेज़ों की सर्वोच्चता स्थापित हुई।
🪖 सैन्य शक्ति में वृद्धि
बंगाल की संपत्ति के कारण अंग्रेज़ों की सेना और भी शक्तिशाली बन गई।
📜 बक्सर युद्ध का मार्ग
प्लासी की विजय ने आगे चलकर 1764 के बक्सर युद्ध तथा ब्रिटिश शासन का मार्ग प्रशस्त किया।
Exam Fact
अधिकांश इतिहासकार प्लासी (1757) को ब्रिटिश साम्राज्य की शुरुआत तथा बक्सर (1764) को उसकी वास्तविक स्थापना मानते हैं।
प्लासी के युद्ध का महत्व
प्लासी के युद्ध का महत्व
23 जून 1757 का प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है। इस युद्ध ने भारत में ब्रिटिश राजनीतिक, आर्थिक एवं सैन्य प्रभुत्व की नींव रखी।
राजनीतिक प्रभुत्व
प्लासी की विजय के बाद बंगाल की वास्तविक सत्ता अंग्रेज़ों के हाथों में आ गई। मीर जाफ़र केवल नाममात्र के नवाब रह गए।
आर्थिक शक्ति
बंगाल की अपार संपत्ति और व्यापारिक सुविधाओं से ईस्ट इंडिया कंपनी आर्थिक रूप से अत्यंत शक्तिशाली बन गई।
ब्रिटिश साम्राज्य की नींव
यह युद्ध भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की दिशा में पहला निर्णायक कदम सिद्ध हुआ।
सैन्य प्रतिष्ठा
रॉबर्ट क्लाइव की प्रतिष्ठा बढ़ी और अंग्रेज़ी सेना का मनोबल पूरे भारत में मजबूत हुआ।
यूरोपीय प्रतिस्पर्धा का अंत
बंगाल में फ्रांसीसी प्रभाव लगभग समाप्त हो गया और अंग्रेज़ों की सर्वोच्चता स्थापित हुई।
बक्सर युद्ध का आधार
प्लासी की विजय ने 1764 के बक्सर युद्ध तथा आगे चलकर दीवानी अधिकार प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त किया।
Exam Point
प्लासी (1757) ने अंग्रेज़ों को राजनीतिक शक्ति प्रदान की, जबकि बक्सर (1764) ने उन्हें वैधानिक एवं आर्थिक अधिकार दिलाए। इसी कारण अधिकांश इतिहासकार बक्सर के युद्ध को प्लासी से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।
प्लासी का युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ माना जाता है।
- अंग्रेज़ पहली बार भारतीय राजनीति के निर्णायक खिलाड़ी बने।
- बंगाल की अपार संपत्ति पर कंपनी का प्रभाव स्थापित हुआ।
- कंपनी की आर्थिक शक्ति बढ़ी, जिससे आगे के सैन्य अभियानों को वित्तीय सहायता मिली।
- भारत में अंग्रेज़ी विस्तार का मार्ग खुल गया।
- भारतीय शासकों के बीच आपसी फूट का लाभ अंग्रेज़ों ने सफलतापूर्वक उठाया।
मीर जाफर का शासन
प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाया। उन्हें अंग्रेज़ों की सहायता से सत्ता तो मिल गई, लेकिन वे स्वतंत्र रूप से शासन नहीं कर सके।
अंग्रेज़ लगातार उनसे धन, उपहार और नई-नई सुविधाओं की माँग करते रहे। इन माँगों को पूरा करने के कारण बंगाल की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी।
कुछ समय बाद अंग्रेज़ों को लगा कि मीर जाफर उनकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए उन्होंने उन्हें पद से हटाने का निर्णय लिया।
मीर क़ासिम का उदय
1760 में अंग्रेज़ों ने मीर क़ासिम को बंगाल का नवाब बनाया। प्रारम्भ में उन्होंने अंग्रेज़ों के साथ सहयोग किया, लेकिन शीघ्र ही वे एक स्वतंत्र और शक्तिशाली शासक के रूप में उभरने लगे।
मीर क़ासिम ने प्रशासनिक और सैन्य सुधार किए। उन्होंने राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित किया तथा आधुनिक सेना का गठन किया।
उन्होंने व्यापार में समानता स्थापित करने के उद्देश्य से सभी व्यापारियों के लिए आंतरिक कर समाप्त कर दिए। इससे अंग्रेज़ों के विशेष व्यापारिक अधिकारों का महत्व कम हो गया।
अंग्रेज़ इस नीति से असंतुष्ट हो गए क्योंकि उनकी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति उनके कर-मुक्त व्यापारिक अधिकार थे। दोनों पक्षों के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया।
मीर क़ासिम और अंग्रेज़ों के बीच संघर्ष
जब अंग्रेज़ों ने मीर क़ासिम पर दबाव बढ़ाया, तब उन्होंने इसका विरोध किया। दोनों पक्षों के बीच कई छोटे-छोटे संघर्ष हुए।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि मीर क़ासिम ने बंगाल छोड़ दिया और अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक शक्तिशाली गठबंधन बनाया।
यही गठबंधन आगे चलकर बक्सर के युद्ध (1764) का कारण बना, जिसने भारत में अंग्रेज़ी शासन को और अधिक मजबूत कर दिया।
बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764)
प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेज़ों का प्रभाव बंगाल में तेजी से बढ़ने लगा, लेकिन उनकी स्थिति अभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी। मीर क़ासिम अंग्रेज़ों की बढ़ती हुई शक्ति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने बंगाल को एक शक्तिशाली और स्वतंत्र राज्य बनाने का प्रयास किया। इसी संघर्ष ने आगे चलकर बक्सर के युद्ध को जन्म दिया।
22 अक्टूबर 1764 को बिहार के बक्सर नामक स्थान पर अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी और भारतीय शासकों के संयुक्त गठबंधन के बीच एक निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व मेजर हेक्टर मुनरो (Major Hector Munro) ने किया।
भारतीय पक्ष में तीन प्रमुख शक्तियाँ शामिल थीं—
- मीर क़ासिम (पूर्व नवाब, बंगाल)
- शुजाउद्दौला (नवाब, अवध)
- शाह आलम द्वितीय (मुगल सम्राट)
यद्यपि भारतीय पक्ष की संयुक्त सेना संख्या में अंग्रेज़ों से अधिक थी, फिर भी संगठन, नेतृत्व और सैन्य अनुशासन की कमी के कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
बक्सर के युद्ध के प्रमुख कारण
बक्सर के युद्ध के प्रमुख कारण
1764 ई. का बक्सर का युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि अंग्रेज़ों की विस्तारवादी नीति, मीर क़ासिम के सुधारों तथा भारतीय शासकों के संयुक्त विरोध का परिणाम था।
मीर क़ासिम के प्रशासनिक सुधार
मीर क़ासिम ने सेना का आधुनिकीकरण किया, राजधानी को मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित किया तथा अंग्रेज़ों के प्रभाव को सीमित करने का प्रयास किया।
दस्तक का दुरुपयोग
अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी कर-मुक्त व्यापार (दस्तक) का दुरुपयोग कर रही थी, जिससे बंगाल सरकार को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा था।
सभी व्यापारियों को समान अधिकार
मीर क़ासिम ने सभी व्यापारियों से आंतरिक कर समाप्त कर दिए। इससे अंग्रेज़ों के विशेष व्यापारिक अधिकार समाप्त हो गए।
अंग्रेज़ों का राजनीतिक हस्तक्षेप
ईस्ट इंडिया कंपनी लगातार बंगाल के प्रशासन एवं नवाब के निर्णयों में हस्तक्षेप कर रही थी।
भारतीय शासकों का गठबंधन
मीर क़ासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया।
ब्रिटिश विस्तारवादी नीति
ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहती थी। उसका उद्देश्य भारत में स्थायी राजनीतिक एवं आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करना था।
Exam Fact
बक्सर का युद्ध (1764) मीर क़ासिम, शुजाउद्दौला तथा शाह आलम द्वितीय के संयुक्त मोर्चे और अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच लड़ा गया था।
बक्सर के युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
बक्सर के युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
22 अक्टूबर 1764 को बक्सर के मैदान में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी और भारतीय शासकों के संयुक्त गठबंधन के बीच निर्णायक युद्ध हुआ।
भारतीय गठबंधन का गठन
मीर क़ासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया।
बक्सर में युद्ध
22 अक्टूबर 1764 को बिहार के बक्सर में दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ।
हेक्टर मुनरो का नेतृत्व
अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व मेजर हेक्टर मुनरो ने किया। उनकी अनुशासित सेना ने प्रभावी रणनीति अपनाई।
भारतीय पक्ष की कमजोरी
संयुक्त सेना में समन्वय एवं नेतृत्व का अभाव था, जिससे युद्ध के दौरान रणनीतिक कमजोरी सामने आई।
अंग्रेज़ों की विजय
युद्ध में अंग्रेज़ों ने निर्णायक विजय प्राप्त की। मीर क़ासिम पराजित हुए तथा शुजाउद्दौला और शाह आलम द्वितीय को पीछे हटना पड़ा।
नए युग की शुरुआत
इस विजय के बाद अंग्रेज़ों का उत्तर भारत में प्रभाव बढ़ा, जिसने आगे चलकर इलाहाबाद की संधि (1765) का मार्ग प्रशस्त किया।
📌 Quick Revision
22 अक्टूबर 1764 → बक्सर → मीर क़ासिम + शुजाउद्दौला + शाह आलम द्वितीय VS ईस्ट इंडिया कंपनी (हेक्टर मुनरो) → अंग्रेज़ों की विजय
22 अक्टूबर 1764 को बक्सर के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच भीषण युद्ध हुआ। अंग्रेज़ी सेना संख्या में कम होने के बावजूद अत्यधिक अनुशासित और प्रशिक्षित थी।
भारतीय गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि तीनों शासकों के बीच पूर्ण समन्वय नहीं था। युद्ध के दौरान संयुक्त रणनीति का अभाव स्पष्ट दिखाई दिया।
मेजर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में अंग्रेज़ों ने प्रभावी सैन्य रणनीति अपनाई और भारतीय सेना को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया।
इस पराजय के बाद मीर क़ासिम राजनीतिक रूप से लगभग समाप्त हो गए। शुजाउद्दौला को भागना पड़ा और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय अंग्रेज़ों की शरण में आ गए।
बक्सर के युद्ध के परिणाम
बक्सर के युद्ध के परिणाम
1764 ई. के बक्सर युद्ध में अंग्रेज़ों की विजय ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक, प्रशासनिक तथा आर्थिक प्रभुत्व को स्थायी रूप से स्थापित कर दिया।
राजनीतिक सर्वोच्चता
बक्सर की विजय के बाद उत्तर भारत में अंग्रेज़ों की राजनीतिक शक्ति निर्विवाद हो गई। मुगल सम्राट और अवध के नवाब अंग्रेज़ों पर निर्भर हो गए।
इलाहाबाद की संधि
1765 ई. में इलाहाबाद की संधि हुई, जिसके माध्यम से अंग्रेज़ों ने मुगल सम्राट और अवध के नवाब पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
दीवानी अधिकार
बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त होने से ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की सबसे शक्तिशाली आर्थिक शक्ति बन गई।
द्वैध शासन की शुरुआत
बंगाल में कंपनी ने द्वैध शासन (Dual Government) की व्यवस्था लागू की, जिससे वास्तविक प्रशासन अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आ गया।
सैन्य प्रभुत्व
अंग्रेज़ी सेना की शक्ति पूरे उत्तर भारत में स्थापित हो गई और भारतीय राज्यों का प्रतिरोध लगातार कमजोर पड़ने लगा।
ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार
बक्सर का युद्ध भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की वास्तविक स्थापना का आधार बना, जिसके बाद कंपनी एक व्यापारिक संस्था नहीं बल्कि शासक शक्ति बन गई।
Exam Point
अधिकांश इतिहासकार बक्सर के युद्ध (1764) को प्लासी (1757) से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि इसी युद्ध के बाद अंग्रेज़ों को दीवानी अधिकार प्राप्त हुए और भारत में उनका वास्तविक शासन प्रारम्भ हुआ।
इलाहाबाद की संधि (1765)
बक्सर के युद्ध के बाद 1765 ई. में रॉबर्ट क्लाइव और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के बीच इलाहाबाद की संधि हुई। यह संधि भारत के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक मानी जाती है।
इस संधि के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे—
- मुगल सम्राट ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दी।
- कंपनी को इन प्रांतों से राजस्व (Revenue) वसूलने का अधिकार प्राप्त हुआ।
- मुगल सम्राट को प्रतिवर्ष पेंशन देने की व्यवस्था की गई।
- अवध के नवाब को अपना राज्य वापस मिला, लेकिन उन्हें अंग्रेज़ों को भारी क्षतिपूर्ति देनी पड़ी।
इलाहाबाद की संधि (1765)
बक्सर के युद्ध (1764) में अंग्रेज़ों की विजय के बाद 12 अगस्त 1765 को रॉबर्ट क्लाइव और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के बीच इलाहाबाद की संधि हुई। इस संधि ने भारत में अंग्रेज़ों के राजनीतिक एवं आर्थिक प्रभुत्व को वैधानिक मान्यता प्रदान की।
तिथि
12 अगस्त 1765
स्थान
इलाहाबाद
मुख्य पक्ष
रॉबर्ट क्लाइव एवं शाह आलम द्वितीय
दीवानी अधिकार
मुगल सम्राट ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी को प्रदान कर दी।
कोरा और इलाहाबाद
कोरा एवं इलाहाबाद के जिले मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को सौंप दिए गए।
अवध की सुरक्षा
अवध के नवाब शुजाउद्दौला को उनका राज्य वापस मिला, लेकिन उन्हें भारी क्षतिपूर्ति देनी पड़ी।
वार्षिक पेंशन
ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल सम्राट को प्रति वर्ष 26 लाख रुपये देने का वचन दिया।
Exam Point
इलाहाबाद की संधि (1765) के माध्यम से अंग्रेज़ों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई। यही घटना भारत में ब्रिटिश आर्थिक एवं प्रशासनिक शासन की वास्तविक शुरुआत मानी जाती है।
दीवानी अधिकार क्या थे?
दीवानी अधिकार का अर्थ था किसी क्षेत्र से राजस्व एवं भूमि कर वसूलने का अधिकार।
1765 में ये अधिकार प्राप्त होने के बाद अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी केवल व्यापारी संस्था नहीं रही, बल्कि वह एक राजस्व एकत्र करने वाली प्रशासनिक शक्ति बन गई। बंगाल की अपार आय ने कंपनी को आर्थिक रूप से इतना मजबूत बना दिया कि आगे के सभी सैन्य अभियानों और प्रशासनिक विस्तार का खर्च इसी आय से पूरा होने लगा।
दीवानी अधिकार क्या थे?
दीवानी अधिकार का अर्थ था किसी क्षेत्र से राजस्व (लगान) वसूल करना तथा दीवानी (सिविल) मामलों का प्रशासन चलाने का अधिकार। इलाहाबाद की संधि (1765) के बाद मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दी। इसके बाद कंपनी भारत की सबसे शक्तिशाली आर्थिक शक्ति बन गई।
दीवानी = राजस्व (लगान) + सिविल प्रशासन
निजामत = कानून-व्यवस्था + रक्षा + आपराधिक न्याय
बक्सर के युद्ध का महत्व
इतिहासकारों के अनुसार बक्सर का युद्ध प्लासी से भी अधिक महत्वपूर्ण था क्योंकि—
- इसने अंग्रेज़ों की सैन्य श्रेष्ठता को सिद्ध किया।
- कंपनी को वैधानिक रूप से शासन चलाने का आधार मिला।
- बंगाल, बिहार और उड़ीसा की आय अंग्रेज़ों के नियंत्रण में आ गई।
- मुगल सम्राट और अवध दोनों अंग्रेज़ों के प्रभाव में आ गए।
- भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की वास्तविक प्रशासनिक नींव स्थापित हुई।
Exam Fact
I. पृष्ठभूमि और बंगाल के नवाब
- बंगाल का पहला स्वतंत्र सूबेदार कौन था? – मुर्शिद कुली खान।
- किसने अपनी राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित की थी? – मुर्शिद कुली खान।
- ‘तकावी ऋण’ (खेती के लिए अग्रिम कर्ज) की शुरुआत किसने की? – मुर्शिद कुली खान।
- अलीवर्दी खान बंगाल का नवाब कब बना? – 1740 ई.।
- किसने कहा था कि “यूरोपीय लोग मधुमक्खियों के समान हैं, यदि इन्हें न छेड़ा जाए तो शहद देंगी”? – अलीवर्दी खान।
- अलीवर्दी खान का उत्तराधिकारी कौन बना? – सिराजुद्दौला (उसका नाती)।
- सिराजुद्दौला बंगाल की गद्दी पर कब बैठा? – 10 अप्रैल 1756।
- सिराजुद्दौला के विरोधियों में प्रमुख कौन थे? – घसीटी बेगम और पूर्णिया का नवाब शौकत जंग।
- मनिहारी का युद्ध (1756) किनके बीच हुआ था? – सिराजुद्दौला और शौकत जंग।
- सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर कब अधिकार किया? – 15 जून 1756।
- कलकत्ता का नाम बदलकर सिराजुद्दौला ने क्या रखा था? – अलीनगर।
- कलकत्ता को सिराजुद्दौला ने किसके प्रभार में छोड़ दिया था? – माणिकचंद।
- ‘कालकोठरी की घटना’ (Black Hole Tragedy) कब हुई थी? – 20 जून 1756।
- ब्लैक होल घटना के समय कितने अंग्रेज बंदी बनाए गए थे? – 146 (केवल 23 जीवित बचे)।
- ब्लैक होल घटना का आंखों देखा विवरण किसने दिया? – जे. जेड. हॉलवेल।
II. प्लासी का युद्ध (23 जून 1757)
- अलीनगर की संधि कब और किनके बीच हुई? – 9 फरवरी 1757 (सिराजुद्दौला और रॉबर्ट क्लाइव)।
- प्लासी का युद्ध किस नदी के किनारे लड़ा गया था? – भागीरथी नदी।
- प्लासी वर्तमान में किस राज्य के किस जिले में है? – पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में।
- प्लासी के युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व किसने किया? – रॉबर्ट क्लाइव।
- सिराजुद्दौला के साथ गद्दारी करने वाला मुख्य सेनापति कौन था? – मीर जाफर।
- सिराजुद्दौला के अन्य गद्दार सहयोगी कौन थे? – राय दुर्लभ और जगत सेठ।
- सिराजुद्दौला के प्रति वफादार रहने वाले सेनापति कौन थे? – मीर मदान और मोहन लाल।
- प्लासी के युद्ध के समय मुगल बादशाह कौन था? – आलमगीर द्वितीय।
- किस युद्ध ने बंगाल में ब्रिटिश शासन की नींव रखी? – प्लासी का युद्ध।
- सिराजुद्दौला की हत्या किसने की थी? – मीर जाफर के पुत्र मीरन ने।
- प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल का नवाब किसे बनाया गया? – मीर जाफर।
- मीर जाफर को अंग्रेजों ने क्या उपाधि दी थी? – कर्नैल क्लाइव का गधा।
- अंग्रेजों को बंगाल के किस जिले की जमींदारी मिली? – 24 परगना।
- मीर जाफर ने रॉबर्ट क्लाइव को व्यक्तिगत भेंट के रूप में कितनी राशि दी थी? – 2,34,000 पाउंड।
- अंग्रेजों ने मीर जाफर को हटाकर किसे नवाब बनाया? – मीर कासिम (1760)।
- इस सत्ता परिवर्तन (1760) को अंग्रेजों ने क्या नाम दिया? – 1760 की क्रांति।
III. मीर कासिम और संघर्ष की शुरुआत
- अलीवर्दी खान के बाद बंगाल का सबसे योग्य नवाब कौन था? – मीर कासिम।
- मीर कासिम ने अपनी राजधानी कहाँ स्थानांतरित की? – मुर्शिदाबाद से मुंगेर।
- मीर कासिम ने मुंगेर में किसका निर्माण कराया? – तोपों और तोड़ेदार बंदूकों की फैक्ट्री।
- मीर कासिम ने अपनी सेना को किस पद्धति पर संगठित किया? – यूरोपीय पद्धति।
- मीर कासिम और अंग्रेजों के बीच विवाद का मुख्य कारण क्या था? – दस्तक (Pass) का दुरुपयोग।
- मीर कासिम ने व्यापारिक असमानता दूर करने के लिए क्या कदम उठाया? – सभी आंतरिक व्यापारिक शुल्कों को हटा दिया।
- अंग्रेजों ने मीर कासिम को हटाकर दोबारा किसे नवाब बनाया? – मीर जाफर (1763)।
- कटवा, गिरिया और सूती का युद्ध (1763) किनके बीच हुआ? – अंग्रेज और मीर कासिम।
- हारने के बाद मीर कासिम शरण लेने कहाँ गया? – अवध (नवाब शुजाउद्दौला के पास)।
IV. बक्सर का युद्ध (22 अक्टूबर 1764)
- बक्सर के युद्ध में कौन सा त्रिगुट अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा? – मीर कासिम, शुजाउद्दौला (अवध), और शाह आलम द्वितीय (मुगल सम्राट)।
- बक्सर के युद्ध में ब्रिटिश सेना का नेतृत्व किसने किया? – हेक्टर मुनरो।
- बक्सर वर्तमान में कहाँ स्थित है? – बिहार में।
- बक्सर के युद्ध के समय बंगाल का नवाब कौन था? – मीर जाफर।
- किस युद्ध ने भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व को वास्तविक रूप से स्थापित किया? – बक्सर का युद्ध।
- बक्सर के युद्ध के बाद कौन सा मुगल सम्राट अंग्रेजों का कैदी बन गया? – शाह आलम द्वितीय।
- बक्सर के युद्ध में हार के बाद मीर कासिम कहाँ भाग गया? – दिल्ली (जहाँ 1777 में उसकी मृत्यु हुई)।
V. इलाहाबाद की संधियाँ और द्वैध शासन
- इलाहाबाद की पहली संधि कब हुई? – 12 अगस्त 1765।
- पहली संधि किनके बीच हुई थी? – क्लाइव और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय।
- इस संधि द्वारा अंग्रेजों को किन राज्यों की दीवानी मिली? – बंगाल, बिहार और उड़ीसा।
- शाह आलम द्वितीय को वार्षिक कितनी पेंशन दी गई? – 26 लाख रुपये।
- इलाहाबाद की दूसरी संधि कब हुई? – 16 अगस्त 1765।
- दूसरी संधि किनके बीच हुई थी? – क्लाइव और अवध के नवाब शुजाउद्दौला।
- नवाब ने हर्जाने के रूप में अंग्रेजों को कितने रुपये दिए? – 50 लाख रुपये।
- अंग्रेजों ने अवध से कौन से दो जिले छीनकर मुगल सम्राट को दिए? – कड़ा और इलाहाबाद।
- बंगाल में द्वैध शासन (Dual Government) की शुरुआत किसने की? – रॉबर्ट क्लाइव (1765)।
- द्वैध शासन का अर्थ क्या था? – दीवानी (राजस्व) अंग्रेजों के पास और निजामत (प्रशासन) नवाब के पास।
- क्लाइव ने बंगाल का उप-दीवान किसे नियुक्त किया? – मुहम्मद रज़ा खान।
- बिहार का उप-दीवान किसे बनाया गया? – राजा शिताब राय।
- उड़ीसा का उप-दीवान कौन था? – राय दुर्लभ।
- द्वैध शासन को किसने समाप्त किया? – वॉरन हेस्टिंग्स (1772)।
- किसने द्वैध शासन को ‘डाकुओं का राज्य’ कहा था? – के. एम. पणिक्कर।
- ब्रिटिश संसद द्वारा रॉबर्ट क्लाइव पर भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमा कब चला? – 1772 में।
- रॉबर्ट क्लाइव ने आत्महत्या कब की थी? – 1774 में।
- भारत में द्वैध शासन का जनक किसे माना जाता है? – लियोनिल कर्टिस (लेकिन बंगाल में क्लाइव ने लागू किया)।
VI. अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- 1765 से 1772 तक बंगाल के शासन को क्या कहा जाता है? – अराजकता का काल।
- मीर जाफर की मृत्यु के बाद बंगाल का नवाब कौन बना? – नजमउद्दौला।
- नजमउद्दौला ने अंग्रेजों के साथ कौन सी संधि की? – 1765 की संधि (निजामत अधिकार सौंप दिए)।
- बंगाल का अंतिम नवाब कौन था? – मुबारकउद्दौला।
- मुबारकउद्दौला को वॉरन हेस्टिंग्स ने क्या कहकर संबोधित किया था? – फैंटम (प्रेत/छाया मात्र नवाब)।
- अंग्रेजों ने दस्तक (Free Pass) का अधिकार सबसे पहले किससे पाया था? – फर्रुखसियर (1717)।
- मीर कासिम ने मुंगेर में किस प्रकार की सेना तैयार की थी? – आर्मेनियाई पद्धति की।
- प्लासी के युद्ध के बाद क्लाइव को क्या पुरस्कार मिला? – प्लासी का जागीरदार बनाया गया।
- बक्सर के युद्ध के समय दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठा था? – शाह आलम द्वितीय।
- किसने कहा था कि “प्लासी का युद्ध एक सौदा था, जिसमें बंगाल के सेठों और मीर जाफर ने नवाब को अंग्रेजों के हाथ बेच दिया”? – पी. एन. पणिक्कर।
- ‘तकावी’ और ‘अबीवाव’ क्या थे? – कृषि ऋण और अतिरिक्त कर।
- बंगाल में अकाल (1770) किस शासन के दौरान पड़ा? – द्वैध शासन के दौरान।
- किस एक्ट के द्वारा बंगाल के दीवानी अधिकारों को कानूनी रूप मिला? – रेगुलेटिंग एक्ट 1773।
- अंग्रेजों ने मुगल सम्राट को इलाहाबाद के किले में कब तक कैद रखा? – 1772 तक (जब तक मराठे उन्हें दिल्ली नहीं ले गए)।
- बंगाल के नवाबों का सही क्रम क्या है? – मुर्शिद कुली > सुजाउद्दीन > सरफराज > अलीवर्दी > सिराजुद्दौला > मीर जाफर > मीर कासिम > मीर जाफर (दोबारा)।
- मुर्शिद कुली खान को बंगाल का दीवान किसने बनाया था? – औरंगजेब (1700)।
- सिराजुद्दौला की हार का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण क्या था? – उसकी सेना का बड़ा हिस्सा युद्ध में शामिल ही नहीं हुआ।
- मीर कासिम ने अंग्रेजों को किन तीन जिलों की दीवानी दी थी? – बर्दवान, मिदनापुर और चटगांव।
- प्लासी के युद्ध में हार के बाद सिराजुद्दौला कहाँ भागा था? – मुर्शिदाबाद।
- बक्सर के युद्ध के दौरान अवध के नवाब का सेनापति कौन था? – बेनी बहादुर।
- किस ब्रिटिश अधिकारी ने बक्सर के युद्ध को “ब्रिटिश इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध” कहा? – सर जेम्स स्टीफन।
- इलाहाबाद की संधि के बाद बंगाल में प्रशासनिक कार्य कौन देखता था? – रज़ा खान।
- 1765 में द्वैध शासन लागू होने पर कंपनी की आय का मुख्य स्रोत क्या था? – भू-राजस्व।
- प्लासी के युद्ध के समय ब्रिटेन का प्रधानमंत्री कौन था? – ड्यूक ऑफ न्यूकैसल।
- बक्सर के युद्ध के समय कंपनी का गवर्नर कौन था? – वेन्सिटार्ट (Vansittart)।
- अलीनगर की संधि का मुख्य प्रावधान क्या था? – अंग्रेजों को सिक्के ढालने और किलेबंदी की अनुमति।
- मुर्शिद कुली खान को ‘दक्षिण का टोडरमल’ भी कहा जाता था क्योंकि उसने क्या किया था? – राजस्व सुधार।
- मीर कासिम ने मुंगेर में किस यूरोपीय सेनापति की सेवाएं ली थीं? – समरू (Reinhard Sumru)।
- ‘तख्ता पलट’ (1760) के दौरान मीर कासिम ने अंग्रेजों को कितने रुपये दिए थे? – 29 लाख रुपये।
- प्लासी के मैदान में अंग्रेजों की तरफ से कुल कितने सैनिक थे? – लगभग 3,200।
- सिराजुद्दौला की सेना में कुल कितने सैनिक थे? – लगभग 50,000।
- बक्सर के युद्ध में त्रिगुट सेना की हार का मुख्य कारण क्या था? – समन्वय की कमी और आधुनिक तोपखाने का अभाव।
- क्लाइव को ‘दोहरे प्रशासन’ का जनक क्यों कहा जाता है? – क्योंकि उसने उत्तरदायित्व रहित अधिकार की नीति अपनाई।
- बक्सर के युद्ध के बाद कंपनी का स्वरूप कैसा हो गया? – एक राजनीतिक शक्ति के रूप में।
- प्लासी और बक्सर के युद्धों ने किस यूरोपीय शक्ति को भारत का सर्वेसर्वा बना दिया? – ब्रिटिश (अंग्रेज)।
