भारत में सहकारी समितियाँ जमीनी स्तर पर आर्थिक और सामाजिक विकास का एक सशक्त माध्यम हैं। ‘सहकार’ का अर्थ है मिलकर काम करना। ये संस्थाएँ आपसी सहयोग और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित होती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, State PCS, SSC) के दृष्टिकोण से यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
संवैधानिक इतिहास और संशोधन
- 97वां संविधान संशोधन (2011): इस संशोधन के माध्यम से सहकारी समितियों को भारत में संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।
- मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत नागरिकों को सहकारी समितियाँ बनाने का अधिकार दिया गया है।
- DPSP (नीति निर्देशक तत्व): अनुच्छेद 43-B को जोड़ा गया, जो राज्य को सहकारी समितियों को प्रोत्साहित करने का निर्देश देता है।
- संविधान का भाग IX-B: यह नया भाग विशेष रूप से सहकारी समितियों के कामकाज, गठन और नियंत्रण के लिए समर्पित है।
महत्वपूर्ण One-Liners:
- अनुच्छेद सीमा: सहकारी समितियों का विवरण संविधान के अनुच्छेद 243-ZH से 243-ZT तक मिलता है।
- निदेशकों की संख्या: किसी भी सहकारी समिति के बोर्ड में अधिकतम निदेशकों (Directors) की संख्या 21 हो सकती है।
- आरक्षण का नियम: बोर्ड में कम से कम एक सीट SC/ST के लिए और दो सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होनी अनिवार्य हैं।
- पदाधिकारियों का कार्यकाल: निर्वाचित सदस्यों और बोर्ड का कार्यकाल चुनाव की तिथि से 5 वर्ष का होता है।
- सहकारी समिति का ऑडिट: राज्य विधानमंडल द्वारा तय नियमों के अनुसार, प्रत्येक समिति का वर्ष में कम से कम एक बार ऑडिट (अंकेक्षण) होना जरूरी है।
- निर्वाचन (Election): सहकारी समितियों के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण राज्य निर्वाचन आयोग या राज्य विधानमंडल द्वारा तय निकाय करता है।
- बोर्ड का निलंबन (Supersession): किसी भी सहकारी समिति के बोर्ड को 6 महीने से अधिक समय के लिए निलंबित नहीं किया जा सकता (बैंकिंग सहकारी समितियों के मामले में यह अवधि 1 वर्ष हो सकती है)।
- विशेषज्ञ सदस्य: बोर्ड में अधिकतम 2 विशेषज्ञ सदस्य (Co-opted Members) शामिल किए जा सकते हैं, जिन्हें मत देने का अधिकार नहीं होता।
- अपराध और दंड: राज्य विधानमंडल सहकारी समितियों के नियमों के उल्लंघन पर दंड और जुर्माने का प्रावधान कर सकता है।
- बहु-राज्य समितियाँ (Multi-State): इनका नियंत्रण केंद्र सरकार और संसद के नियमों के अधीन होता है।
सहकारी समितियों की संरचना और कार्य
सहकारी समितियाँ मुख्य रूप से कृषि, दुग्ध उत्पादन (जैसे: अमूल), ऋण वितरण और गृह निर्माण जैसे क्षेत्रों में काम करती हैं। इनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि अपने सदस्यों का कल्याण करना होता है।
- एक सदस्य – एक वोट: यहाँ पूंजी के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के आधार पर वोटिंग होती है।
- खुली सदस्यता: कोई भी व्यक्ति जो समान हितों को साझा करता है, वह इन समितियों का सदस्य बन सकता है।
- पंजीकरण: सहकारी समितियाँ ‘राज्य सूची’ का विषय हैं, लेकिन बहु-राज्य समितियाँ संघ सूची के अंतर्गत आती हैं।
तुलना तालिका (Quick Revision Table)
| बिंदु | विवरण |
| संविधान संशोधन | 97वां संशोधन अधिनियम, 2011 |
| संविधान का भाग | भाग IX-B |
| अनुच्छेद | 243-ZH से 243-ZT |
| अधिकतम निदेशक | 21 |
| महिला आरक्षण | 2 सीटें |
| कार्यकाल | 5 वर्ष |
| विषय सूची | राज्य सूची (प्रविष्टि 32) |
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