मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 23–35) | धार्मिक स्वतंत्रता, रिट्स व संवैधानिक उपचार | Complete Notes (UPSC/SSC)

मौलिक अधिकारों के इस भाग में अनुच्छेद 23 से 35 तक के प्रावधान शामिल हैं, जो नागरिकों को शोषण, धार्मिक भेदभाव और राज्य की मनमानी के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं। यह भाग भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को सुदृढ़ करता है और संवैधानिक उपचार की गारंटी देता है।

“यदि आपने ‘मौलिक अधिकार: भाग-1 (अनुच्छेद 12 से 22)’ अभी तक नहीं पढ़ा है, तो उसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।”

मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 23–35)

Table of Contents

शोषण के विरुद्ध और धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 23-28)

भारतीय संविधान न केवल राज्य की शक्तियों को नियंत्रित करता है, बल्कि यह निजी व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले शोषण के विरुद्ध भी सुरक्षा प्रदान करता है।

1. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)

यह अधिकार समाज के दबे-कुचले वर्गों और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करता है।

  • अनुच्छेद 23 (मानव तस्करी और बेगार का निषेध):
    • यह मानव (पुरुष, महिला, बच्चे) की खरीद-बिक्री (तस्करी), ‘बेगार’ (बिना वेतन के काम) और ‘जबरन श्रम’ के अन्य रूपों को प्रतिबंधित करता है।
    • यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों (विदेशियों) दोनों को प्राप्त है।
    • अपवाद: राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों (जैसे राष्ट्रीय रक्षा या सामाजिक सेवा) के लिए अनिवार्य सेवा लागू कर सकता है, लेकिन इसमें धर्म, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं होगा।
  • अनुच्छेद 24 (बाल श्रम का निषेध):
    • 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या किसी भी अन्य खतरनाक गतिविधियों (Hazardous activities) में काम करने पर प्रतिबंध लगाता है।
    • बाल श्रम निषेध अधिनियम 1986 इस अधिकार को कानूनी शक्ति प्रदान करता है।

2. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जहाँ राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है।

  • अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता):
    • प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंतःकरण के अनुसार किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने और उसका प्रचार करने का समान हक है।
    • विशेष तथ्य: सिखों को ‘कृपाण’ धारण करने की अनुमति इसी अनुच्छेद के तहत मिली है। यहाँ ‘हिंदू’ शब्द में बौद्ध, जैन और सिख भी शामिल हैं।
  • अनुच्छेद 26 (सामूहिक स्वतंत्रता):
    • प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन, संस्थाएं स्थापित करने और संपत्ति (जंगम व स्थावर) अर्जित करने का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 27 (धार्मिक कर से मुक्ति):
    • राज्य किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म के प्रचार या रखरखाव के लिए टैक्स (कर) देने के लिए बाध्य नहीं करेगा। (नोट: राज्य ‘शुल्क’ या फीस लगा सकता है, लेकिन ‘टैक्स’ नहीं)।
  • अनुच्छेद 28 (धार्मिक शिक्षा का निषेध):
    • राज्य निधि से पूरी तरह संचालित शैक्षणिक संस्थानों में कोई भी धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
धार्मिक स्वतंत्रता (Art 25-28) अनुच्छेद 25 व्यक्तिगत हक: मानना, आचरण, और प्रचार करना। अनुच्छेद 26 सामूहिक हक: धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन। अनुच्छेद 27 कर से मुक्ति: धर्म प्रचार हेतु टैक्स नहीं देना होगा। अनुच्छेद 28 शिक्षा में रोक: सरकारी स्कूल में धार्मिक शिक्षा मना। Created for pdfnotes.in | By Vikas Singh
अनुच्छेदविषय
25व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता
26धार्मिक संस्थाओं का प्रबंधन
27धार्मिक कर का निषेध
28धार्मिक शिक्षा का निषेध

💡’एग्जाम पॉइंटर’ :

अनुच्छेद 25 व्यक्ति की निजी आस्था की बात करता है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं या संप्रदायों की सामूहिक शक्ति की बात करता है। इसके अलावा, धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है; राज्य ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य’ के आधार पर इन पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है।

संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

भारतीय संविधान अल्पसंख्यकों के भाषाई और धार्मिक हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान करता है ताकि वे बहुसंख्यक समाज के बीच अपनी विशिष्टता न खोएं।

1. अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण

यह अनुच्छेद नागरिकों के ‘समूह’ के अधिकारों की बात करता है:

  • संरक्षण का अधिकार: भारत के किसी भी हिस्से में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग (Section of Citizens) को, जिसकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे संरक्षित करने का पूरा अधिकार होगा।
  • भेदभाव पर रोक: राज्य द्वारा संचालित या सहायता प्राप्त किसी भी शिक्षण संस्थान में प्रवेश के समय किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • व्यापकता: सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, अनुच्छेद 29 केवल ‘अल्पसंख्यकों’ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ‘नागरिकों का वर्ग’ शब्द के कारण बहुसंख्यक भी शामिल हो सकते हैं (यदि उनकी कोई विशिष्ट भाषा या लिपि है)।

2. अनुच्छेद 30: शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार

यह अनुच्छेद विशेष रूप से अल्पसंख्यकों को सशक्त बनाता है:

  • संस्थानों की स्थापना: सभी अल्पसंख्यकों (चाहे वे धर्म पर आधारित हों या भाषा पर) को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार होगा।
  • संपत्ति का अनिवार्य अर्जन: यदि राज्य किसी अल्पसंख्यक संस्थान की संपत्ति का अधिग्रहण करता है, तो उसे ऐसी मुआवजा राशि देनी होगी जिससे उनका अधिकार बाधित न हो (44वां संशोधन, 1978)।
  • राज्य की सहायता: सहायता देते समय राज्य किसी भी शिक्षण संस्थान के साथ इस आधार पर भेदभाव नहीं करेगा कि वह किसी अल्पसंख्यक समुदाय के प्रबंधन में है।

तुलना: अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30

आधारअनुच्छेद 29अनुच्छेद 30
दायरानागरिकों के सभी वर्ग (अल्पसंख्यक + बहुसंख्यक)केवल धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक
मुख्य फोकसभाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षणशिक्षण संस्थानों का प्रबंधन
प्रकृतियह ‘समूह’ के संरक्षण की बात करता हैयह ‘संस्थान’ चलाने की शक्ति देता है
संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार अनुच्छेद 29 संरक्षण: भाषा, लिपि और संस्कृति का। यह ‘नागरिकों के वर्ग’ (सभी) के लिए है। अनुच्छेद 30 अधिकार: शिक्षण संस्थान चलाने का। केवल धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों हेतु। Prepared for pdfnotes.in | By Vikas Singh Faculty of GS

💡’एग्जाम पॉइंटर’ :

“भारतीय संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ (Minority) शब्द को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है।” उच्चतम न्यायालय के अनुसार, अल्पसंख्यकों का निर्धारण राष्ट्रीय स्तर के बजाय राज्य स्तर पर उनकी जनसंख्या के आधार पर किया जाना चाहिए। इसके अलावा, अल्पसंख्यक संस्थानों को राज्य के ‘प्रशासनिक मानकों’ और ‘शैक्षणिक गुणवत्ता’ के नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

मौलिक अधिकार (संवैधानिक उपचार)

संवैधानिक उपचारों का अधिकार: अनुच्छेद 32 (Constitutional Remedies)

मौलिक अधिकार तब तक अर्थहीन हैं जब तक उन्हें लागू करने के लिए कोई प्रभावी मशीनरी न हो। अनुच्छेद 32 नागरिकों को यह अधिकार देता है कि यदि उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो वे सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) जा सकते हैं।

1. प्रमुख विशेषताएं

  • यह स्वयं में एक मौलिक अधिकार है।
  • इसे आपातकाल (अनुच्छेद 359) के अलावा किसी भी स्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता।
  • उच्चतम न्यायालय को मौलिक अधिकारों का “रक्षक और गारंटी देने वाला” बनाया गया है।

2. सर्वोच्च न्यायालय की 5 रिट (Writs)

अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट पांच प्रकार के विशेष आदेश (रिट) जारी कर सकता है:

Art 32 1. बंदी प्रत्यक्षीकरण 2. परमादेश 3. प्रतिषेध 4. उत्प्रेषण 5. अधिकार पृच्छा
  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus):शाब्दिक अर्थ: “व्यक्ति को सशरीर हमारे सामने पेश करो।”
    • उद्देश्य: यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया है, तो कोर्ट उसे छोड़ने का आदेश दे सकता है। यह सार्वजनिक और निजी दोनों व्यक्तियों के खिलाफ जारी हो सकता है।
  2. परमादेश (Mandamus):शाब्दिक अर्थ: “हम आदेश देते हैं।”
    • उद्देश्य: यह किसी सार्वजनिक अधिकारी, निचली अदालत या सरकार को उनके कानूनी कर्तव्यों का पालन करने के लिए जारी किया जाता है। (यह निजी व्यक्ति या राष्ट्रपति के खिलाफ जारी नहीं हो सकता)।
  3. प्रतिषेध (Prohibition):शाब्दिक अर्थ: “मना करना।”
    • उद्देश्य: उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत को उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकने के लिए। यह केवल ‘न्यायिक’ कार्यों के लिए है।
  4. उत्प्रेषण (Certiorari):शाब्दिक अर्थ: “पूर्णतः सूचित होना।”
    • उद्देश्य: किसी लंबित मामले को निचली अदालत से ऊपर की अदालत में स्थानांतरित करने या निचली अदालत के फैसले को रद्द करने के लिए।
  5. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto):शाब्दिक अर्थ: “किस अधिकार से?”
    • उद्देश्य: यदि कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद (Public Office) को अवैध रूप से धारण करता है, तो कोर्ट उसकी वैधता की जांच करता है।
रिटअर्थ
Habeas Corpusअवैध हिरासत से मुक्ति
Mandamusकर्तव्य पालन का आदेश
Prohibitionनिचली अदालत को रोकना
Certiorariमामला उच्च अदालत में स्थानांतरित
Quo Warrantoपद धारण की वैधता जांच

💡’एग्जाम पॉइंटर’ :

अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के बीच अंतर:

उच्च न्यायालय (Art 226): मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य कानूनी अधिकारों के लिए भी रिट जारी कर सकता है। अतः, रिट जारी करने की शक्ति के मामले में उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) सुप्रीम कोर्ट से व्यापक है।

सर्वोच्च न्यायालय (Art 32): केवल मौलिक अधिकारों के हनन पर रिट जारी कर सकता है।

अन्य प्रावधान और सीमाएं (अनुच्छेद 33-35)

जहाँ अनुच्छेद 12-32 अधिकारों की गारंटी देते हैं, वहीं अनुच्छेद 33-35 यह सुनिश्चित करते हैं कि राष्ट्र की सुरक्षा और अखंडता से समझौता न हो।

1. अनुच्छेद 33: सशस्त्र बल और मौलिक अधिकार

यह अनुच्छेद संसद को शक्ति देता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों, पुलिस बलों, खुफिया एजेंसियों और संचार प्रणालियों में कार्यरत व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों को सीमित या प्रतिबंधित कर सके।

  • उद्देश्य: अनुशासन बनाए रखना और कर्तव्यों का उचित निर्वहन सुनिश्चित करना।
  • विशेष शक्ति: इसके तहत बनाए गए कानूनों को किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
  • अधिकार: यह शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य विधानमंडलों के पास नहीं।

2. अनुच्छेद 34: मार्शल लॉ (सैन्य शासन) और मौलिक अधिकार

जब भारत के किसी भी क्षेत्र में ‘मार्शल लॉ’ लागू हो, तो यह अनुच्छेद मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाता है।

  • क्षतिपूर्ति: संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह मार्शल लॉ के दौरान किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा किए गए कार्यों को वैध (Indemnify) घोषित कर सके।
  • महत्वपूर्ण अंतर: मार्शल लॉ ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ (National Emergency) से अलग है। मार्शल लॉ केवल मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है, जबकि आपातकाल केंद्र-राज्य संबंधों को भी बदल देता है।

3. अनुच्छेद 35: संसद की विशेष विधायी शक्ति

यह अनुच्छेद सुनिश्चित करता है कि मौलिक अधिकारों की प्रकृति पूरे देश में एक समान रहे।

  • केवल संसद की शक्ति: कुछ मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य विधानमंडलों के पास नहीं।
  • उदाहरण:
    • अस्पृश्यता के लिए दंड निर्धारित करना (अनुच्छेद 17)।
    • बाल श्रम और मानव तस्करी के लिए दंड (अनुच्छेद 23)।
    • सशस्त्र बलों के अधिकार सीमित करना (अनुच्छेद 33)।
    • निवास की शर्त निर्धारित करना (अनुच्छेद 16)।

💡’एग्जाम पॉइंटर’ :

“अनुच्छेद 35 के तहत संसद उन अधिकारों के लिए भी दंड निर्धारित कर सकती है जो संविधान लागू होने से पहले के कानूनों में दंडनीय नहीं थे।” यह भारतीय लोकतंत्र में संसद की ‘संवैधानिक सर्वोच्चता’ को दर्शाता है।

तालिका: अनुच्छेद 33, 34 और 35

अनुच्छेदमुख्य विषयशक्ति किसके पास?
अनुच्छेद 33सेना/पुलिस के अधिकारों पर अंकुशकेवल संसद
अनुच्छेद 34सैन्य शासन (Martial Law) के दौरान रोककेवल संसद
अनुच्छेद 35अधिकारों को लागू करने हेतु कानून बनानाकेवल संसद
संसद की विशेष विधायी शक्तियां Art 33 सेना/पुलिस पर नियंत्रण Art 34 मार्शल लॉ में सुरक्षा Art 35 कानून बनाने की शक्ति

महत्वपूर्ण न्यायिक वाद और विवाद (Significant Judicial Cases)

मौलिक अधिकारों और संसद की संविधान संशोधन शक्ति के बीच संतुलन बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं।

1. ए.के. गोपालन मामला (1950)

  • मुद्दा: व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21)।
  • निर्णय: कोर्ट ने अनुच्छेद 21 की ‘संकीर्ण व्याख्या’ की और कहा कि यह केवल कार्यकारी कार्रवाई के विरुद्ध सुरक्षा देता है, विधायी (कानून) के विरुद्ध नहीं।

2. गोलकनाथ मामला (1967)

  • मुद्दा: क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है?
  • निर्णय: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकार ‘अलौकिक’ (Transcendental) हैं। संसद इन्हें न तो सीमित कर सकती है और न ही छीन सकती है।

3. केशवानंद भारती मामला (1973) – सबसे ऐतिहासिक

  • मुद्दा: 24वें संशोधन की वैधता और संसद की शक्ति।
  • निर्णय: 13 जजों की बेंच ने ‘गोलकनाथ’ के फैसले को पलट दिया।
  • मूल ढांचा (Basic Structure): कोर्ट ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह संविधान के ‘मूल ढांचे’ को नष्ट नहीं कर सकती।

4. मेनका गांधी मामला (1978)

  • मुद्दा: विदेश जाने का अधिकार (अनुच्छेद 21)।
  • निर्णय: कोर्ट ने अनुच्छेद 21 की ‘व्यापक व्याख्या’ की। अब राज्य किसी व्यक्ति को जीवन और स्वतंत्रता से केवल तभी वंचित कर सकता है जब प्रक्रिया “उचित, न्यायसंगत और तर्कसंगत” (Fair, Just and Reasonable) हो।

5. मिनर्वा मिल्स मामला (1980)

  • मुद्दा: मौलिक अधिकार बनाम नीति-निर्देशक तत्व (DPSP)।
  • निर्णय: कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान मौलिक अधिकारों और DPSP के बीच संतुलन की नींव पर टिका है। एक को दूसरे पर वरीयता देना संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुँचाना है।

टेबल: न्यायिक यात्रा

गोपालन (1950) संकीर्ण व्याख्या गोलकनाथ (1967) अधिकार ‘अलौकिक’ केशवानंद (1973) “मूल ढांचा” मेनका गांधी (1978) व्यापक व्याख्या मिनर्वा मिल्स (1980) संतुलन अनिवार्यJudicial Evolution of Fundamental Rights | pdfnotes.in
वर्षकेस (Case)मुख्य सिद्धांत / निर्णय
1950ए.के. गोपालनअनुच्छेद 21 की संकीर्ण व्याख्या।
1967गोलकनाथमौलिक अधिकार संशोधित नहीं किए जा सकते।
1973केशवानंद भारती‘मूल ढांचे’ का सिद्धांत जन्म लिया।
1978मेनका गांधीअनुच्छेद 21 की व्यापक और मानवीय व्याख्या।
1980मिनर्वा मिल्समूल अधिकार और DPSP के बीच संतुलन।

💡’एग्जाम पॉइंटर’ :

“मूल ढांचा” (Basic Structure) शब्द संविधान में कहीं नहीं लिखा है; यह पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट की देन है। आज न्यायिक समीक्षा (Judicial Review), स्वतंत्र चुनाव, और संसदीय प्रणाली—ये सभी ‘मूल ढांचे’ का हिस्सा बन चुके हैं जिन्हें संसद भी नहीं बदल सकती।

मौलिक अधिकार : 30 अति-महत्वपूर्ण वन-लाइनर्स

  1. स्वरूप: मौलिक अधिकार नकारात्मक (राज्य पर रोक) और सकारात्मक (व्यक्ति को अधिकार) दोनों हैं।
  2. अनुच्छेद 23: मानव तस्करी और ‘बेगार’ (जबरन श्रम) को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है।
  3. अनुच्छेद 24: 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों या खतरनाक कामों में लगाने पर रोक लगाता है।
  4. अनुच्छेद 25: प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंतःकरण के अनुसार धर्म मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है।
  5. सिखों का अधिकार: अनुच्छेद 25 के तहत ही सिखों को ‘कृपाण’ धारण करने और लेकर चलने का अधिकार प्राप्त है।
  6. अनुच्छेद 25 की व्याख्या: यहाँ ‘हिंदू’ शब्द में जैन, बौद्ध और सिख भी शामिल माने जाते हैं।
  7. अनुच्छेद 26: धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन और संपत्ति अर्जित करने का अधिकार देता है।
  8. अनुच्छेद 27: राज्य किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म के प्रचार के लिए ‘टैक्स’ (कर) देने को मजबूर नहीं करेगा।
  9. टैक्स vs शुल्क: अनुच्छेद 27 केवल ‘टैक्स’ रोकता है, सुविधा के बदले ‘शुल्क’ (Fee) लगाया जा सकता है।
  10. अनुच्छेद 28: सरकारी निधि से चलने वाले शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा देना प्रतिबंधित है।
  11. अनुच्छेद 29: नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बचाने का अधिकार देता है।
  12. अनुच्छेद 30: अल्पसंख्यकों (धार्मिक व भाषाई) को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान चलाने का अधिकार देता है।
  13. अल्पसंख्यक की परिभाषा: भारतीय संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है।
  14. अनुच्छेद 32: इसे डॉ. अंबेडकर ने “संविधान की आत्मा और हृदय” कहा था।
  15. सुप्रीम कोर्ट की शक्ति: अनुच्छेद 32 के तहत व्यक्ति अधिकारों के हनन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।
  16. रिट्स (Writs): मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट 5 प्रकार की रिट जारी करता है।
  17. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत से तुरंत रिहा करने का आदेश।
  18. परमादेश (Mandamus): सार्वजनिक अधिकारी को उसके कानूनी कर्तव्य निभाने के लिए दिया गया आदेश।
  19. प्रतिषेध (Prohibition): ऊपरी अदालत द्वारा निचली अदालत को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने से रोकना।
  20. उत्प्रेषण (Certiorari): निचली अदालत के निर्णय को रद्द करना या मामला ऊपर की अदालत में मंगाना।
  21. अधिकार पृच्छा (Quo-Warranto): किसी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक पद को अवैध रूप से धारण करने की वैधता की जांच।
  22. अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय (High Court) को भी रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।
  23. अनुच्छेद 33: संसद को सशस्त्र बलों और पुलिस के मौलिक अधिकारों को सीमित करने की शक्ति देता है।
  24. अनुच्छेद 34: मार्शल लॉ (सैन्य शासन) लागू होने पर मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध का प्रावधान।
  25. अनुच्छेद 35: मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने हेतु कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है।
  26. दंड का प्रावधान: अस्पृश्यता या बाल श्रम के लिए सजा निर्धारित करने का कानून केवल संसद बना सकती है।
  27. गोलकनाथ मामला (1967): सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद मौलिक अधिकारों को छीन या सीमित नहीं कर सकती।
  28. 24वां संशोधन (1971): इसके द्वारा संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति मिली।
  29. केशवानंद भारती (1973): इसमें ‘मूल ढांचा’ (Basic Structure) का ऐतिहासिक सिद्धांत दिया गया।
  30. आपातकाल और अधिकार: आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर अन्य अधिकार निलंबित हो सकते हैं।

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प्रश्न 1 अनुच्छेद 32 को संविधान की आत्मा किसने कहा?(UPSC)

उत्तर: डॉ. बी.आर. अंबेडकर


प्रश्न 2 बंधुआ मजदूरी का निषेध किस अनुच्छेद में है?(SSC)

उत्तर: अनुच्छेद 23


प्रश्न 3 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नियोजन पर रोक किस अनुच्छेद में है?(UPPSC)

उत्तर: अनुच्छेद 24


प्रश्न 4 Quo-Warranto रिट किससे संबंधित है?(UPSC)

उत्तर: सार्वजनिक पद की वैधता


प्रश्न 5 हाई कोर्ट किस अनुच्छेद के तहत रिट जारी करता है?(State PCS)

उत्तर: अनुच्छेद 226


FAQ

प्रश्न 1: कितनी प्रकार की रिट्स हैं?

पाँच।

प्रश्न 2: क्या अनुच्छेद 32 आपातकाल में निलंबित हो सकता है?

हाँ।

प्रश्न 3: धार्मिक स्वतंत्रता पूर्ण है?

नहीं, यह सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।

प्रश्न 4: क्या संसद सशस्त्र बलों के अधिकार सीमित कर सकती है?

हाँ, अनुच्छेद 33 के तहत।

प्रश्न 5: क्या अल्पसंख्यक शब्द परिभाषित है?

नहीं।

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Vikas Singh

लेखक: विकास सिंह

विकास सिंह 15+ वर्षों के शिक्षण अनुभव वाले General Studies (GS) शिक्षक हैं। उन्होंने GS Faculty के रूप में कार्य किया है तथा दो बार UPSC Mains परीक्षा में सम्मिलित हो चुके हैं। वे भारतीय राजव्यवस्था, इतिहास, भूगोल और सामान्य विज्ञान के विशेषज्ञ हैं। वर्तमान में वे वाराणसी में अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं और अपने YouTube चैनल Study2Study के माध्यम से शिक्षा जगत में योगदान दे रहे हैं।