मौलिक अधिकार भारतीय संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 12 से 35) में वर्णित हैं। इन्हें ‘भारत का मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है क्योंकि ये नागरिकों को राज्य की मनमानी के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं। मौलिक अधिकार व्यक्ति के सर्वांगीण विकास, स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन की संवैधानिक गारंटी हैं।

Table of Contents
मौलिक अधिकार: एक संक्षिप्त परिचय
- स्रोत: अमेरिकी संविधान (Bill of Rights) से प्रेरित।
- न्यायोचित (Justiciable): इनके उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट (Art 32) या हाई कोर्ट (Art 226) जाया जा सकता है।
- वर्तमान स्थिति: मूल संविधान में 7 अधिकार थे, लेकिन 44वें संशोधन (1978) द्वारा ‘संपत्ति के अधिकार’ को हटाकर अब केवल 6 मौलिक अधिकार बचे हैं।
- स्थायित्व: ये स्थायी नहीं हैं; संसद इनमें संशोधन कर सकती है, लेकिन ‘मूल ढांचे’ को बदले बिना।
मौलिक अधिकार और प्रावधान: अनुच्छेद 12-13
| अनुच्छेद | विषय | महत्व |
|---|---|---|
| 12 | ‘राज्य’ की परिभाषा | केंद्र, राज्य, स्थानीय निकाय शामिल |
| 13 | असंगत कानून शून्य | न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति |
अनुच्छेद 12 और 13 भारतीय संविधान के भाग 3 (मौलिक अधिकार) के आधार स्तंभ हैं। ये यह निर्धारित करते हैं कि मौलिक अधिकार किनके खिलाफ लागू होंगे और कौन से कानून इनके उल्लंघन पर रद्द कर दिए जाएंगे।
अनुच्छेद 12: ‘राज्य’ की परिभाषा (Definition of State)
मौलिक अधिकार मुख्य रूप से राज्य की मनमानी शक्ति के खिलाफ नागरिकों को सुरक्षा देते हैं। इसलिए, यह स्पष्ट होना जरूरी है कि ‘राज्य’ में कौन-कौन शामिल है। अनुच्छेद 12 के अनुसार, ‘राज्य’ में निम्नलिखित अंग शामिल हैं:
- भारत सरकार और संसद: केंद्र सरकार के सभी विभाग और लोकसभा-राज्यसभा।
- राज्य सरकारें और विधानमंडल: सभी राज्यों की सरकारें और उनकी विधानसभाएँ/विधान परिषदें।
- स्थानीय निकाय: नगरपालिकाएँ, पंचायतें, जिला बोर्ड, सुधार न्यास (Improvement Trusts) आदि।
- अन्य वैधानिक या गैर-वैधानिक संस्थाएं: वैसी संस्थाएं जो राज्य के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करती हैं या सरकारी नियंत्रण में हैं, जैसे LIC, ONGC, SAIL, GAIL, आदि।
नोट: निजी एजेंसियां भी ‘राज्य’ के दायरे में आ सकती हैं यदि वे राज्य की किसी संस्था के रूप में कार्य कर रही हों।
अनुच्छेद 13: मौलिक अधिकारों से असंगत कानून (Laws Inconsistent with FRs)
यह अनुच्छेद न्यायपालिका को ‘न्यायिक पुनरावलोकन’ (Judicial Review) की शक्ति प्रदान करता है। इसकी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
- संविधान पूर्व कानून (Pre-constitutional Laws): संविधान लागू होने से पहले के जो कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, वे उस सीमा तक ‘शून्य’ (Void) हो जाएंगे।
- संविधानोत्तर कानून (Post-constitutional Laws): राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों को छीनता या कम करता हो। यदि ऐसा कानून बनता है, तो वह उल्लंघन की सीमा तक अवैध होगा।
- कानून की व्यापक परिभाषा: यहाँ ‘कानून’ का अर्थ केवल संसद द्वारा पारित एक्ट नहीं है, बल्कि इसमें अध्यादेश (Ordinances), आदेश, उपनियम, नियम, अधिसूचना और रूढ़ियाँ भी शामिल हैं।
- संविधान संशोधन: 24वें संविधान संशोधन के बाद यह स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 13 की कोई बात अनुच्छेद 368 के तहत किए गए संशोधन पर लागू नहीं होगी, लेकिन ‘केशवानंद भारती केस’ के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि संशोधन ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) का उल्लंघन करता है, तो उसे चुनौती दी जा सकती है।
समानता का अधिकार: अनुच्छेद 14 से 18
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 14 | विधि के समक्ष समता |
| 15 | भेदभाव का निषेध |
| 16 | रोजगार में अवसर की समानता |
| 17 | अस्पृश्यता का अंत |
| 18 | उपाधियों का अंत |
समानता का अधिकार (Right to Equality) भारतीय संविधान के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है। यह अनुच्छेद 14 से 18 तक विस्तृत है और समाज में विशेषाधिकारों को समाप्त कर एक समान धरातल तैयार करने का प्रयास करता है।
अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता (Equality Before Law)
यह अनुच्छेद दो महत्वपूर्ण अवधारणाओं को जोड़ता है:
- विधि के समक्ष समता: यह ब्रिटिश मूल की ‘नकारात्मक’ अवधारणा है, जिसका अर्थ है कि कानून के सामने कोई भी बड़ा नहीं है (चाहे वह अमीर हो या गरीब)।
- विधियों का समान संरक्षण: यह अमेरिकी संविधान से ली गई ‘सकारात्मक’ अवधारणा है, जिसका अर्थ है कि समान परिस्थितियों वाले लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा।
अनुच्छेद 15: भेदभाव का निषेध (Prohibition of Discrimination)
राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
- विशेष प्रावधान: राज्य को महिलाओं, बच्चों और सामाजिक/शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (SC/ST/OBC) के लिए विशेष रियायतें देने की शक्ति प्राप्त है।
अनुच्छेद 16: लोक नियोजन में अवसर की समता (Equality in Public Employment)
सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के लिए सभी नागरिकों को समान अवसर मिलेंगे।
- अपवाद: पिछड़ा वर्ग आरक्षण (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS – 103वां संशोधन) इसी अनुच्छेद के तहत आते हैं।
अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता का अंत (Abolition of Untouchability)
यह अनुच्छेद ‘छुआछूत’ की प्रथा को पूरी तरह समाप्त करता है और इसे किसी भी रूप में लागू करना एक दंडनीय अपराध बनाता है।
विशेष: यह एक ‘पूर्ण अधिकार’ (Absolute Right) है, जिसका कोई अपवाद नहीं है।
अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत (Abolition of Titles)
ब्रिटिश काल की उपाधियाँ (जैसे- राय बहादुर, महाराजा) समानता के विरुद्ध थीं, इसलिए उन्हें समाप्त कर दिया गया।
- छूट: सेना (General, Colonel) और विद्या (Doctor, Professor) संबंधी सम्मान दिए जा सकते हैं।
- पद्म पुरस्कार: भारत रत्न, पद्म विभूषण आदि ‘उपाधियाँ’ नहीं बल्कि ‘सम्मान’ हैं, इसलिए इन्हें नाम के आगे या पीछे नहीं लगाया जा सकता।
प्रो-टिप (For Aspirants):
अनुच्छेद 14 का अपवाद अनुच्छेद 361 है, जो भारत के राष्ट्रपति और राज्यों के राज्यपालों को कुछ विशेष छूट और संरक्षण प्रदान करता है। इसे ‘विधि के शासन’ का अपवाद माना जाता है।
स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 19 से 21
समानता के बाद संविधान हमें ‘स्वतंत्रता’ की गारंटी देता है। इसे भारतीय लोकतंत्र की “रीढ़ की हड्डी” माना जाता है।
| अनुच्छेद | स्वतंत्रता |
|---|---|
| 19(1)(a) | वाक् एवं अभिव्यक्ति |
| 19(1)(b) | शांतिपूर्ण सभा |
| 19(1)(c) | संघ बनाना |
| 19(1)(d) | संचरण |
| 19(1)(e) | निवास |
| 19(1)(g) | व्यापार/व्यवसाय |
अनुच्छेद 19: छह लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं का संरक्षण
- मूल संविधान में 7 स्वतंत्रताएँ थीं, लेकिन वर्तमान में 6 हैं (संपत्ति की स्वतंत्रता को 44वें संशोधन द्वारा हटा दिया गया)।
| अनुच्छेद | स्वतंत्रता का प्रकार | मुख्य विवरण |
| 19(1)(a) | वाक् एवं अभिव्यक्ति | बोलने, लिखने और प्रेस की स्वतंत्रता। इसमें RTI और चुप रहने का अधिकार भी शामिल है। |
| 19(1)(b) | शांतिपूर्ण सभा | बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने की आजादी। |
| 19(1)(c) | संघ/संगठन बनाना | राजनीतिक दल, संगठन या सहकारी समितियां (97वां संशोधन) बनाने का अधिकार। |
| 19(1)(d) | संचरण (Movement) | पूरे भारत के किसी भी हिस्से में स्वतंत्र रूप से घूमने की आजादी। |
| 19(1)(e) | निवास (Residence) | भारत के किसी भी क्षेत्र में रहने और बसने की स्वतंत्रता। |
| 19(1)(g) | व्यापार एवं व्यवसाय | अपनी पसंद का कोई भी पेशा, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार। |
इन स्वतंत्रताओं पर ‘उचित प्रतिबंध’ (Reasonable Restrictions)
- ध्यान दें: ये अधिकार असीमित (Absolute) नहीं हैं। देश की एकता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में राज्य इन पर निम्नलिखित आधारों पर “उचित प्रतिबंध” लगा सकता है। :
- भारत की संप्रभुता और अखंडता।
- राज्य की सुरक्षा।
- विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध।
- सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order)।
- शालीनता या नैतिकता (Decency/Morality)।
- न्यायालय की अवमानना।
- मानहानि (Defamation)।
- अनुच्छेद 19 और आपातकाल: – जब अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल) युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर लागू होता है, तो अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबित (Automatically Suspended) हो जाता है। लेकिन यदि आपातकाल ‘सशस्त्र विद्रोह’ के आधार पर लगा हो, तो यह निलंबित नहीं होता।
- “हड़ताल करना (Right to Strike)” मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि एक कानूनी अधिकार है। यह अक्सर ‘कन्फ्यूजन’ पैदा करने वाला प्रश्न होता है।
अनुच्छेद 20–22
अनुच्छेद 20 और 21 भारतीय संविधान के सबसे शक्तिशाली अधिकार हैं क्योंकि इन्हें राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) के दौरान भी राष्ट्रपति द्वारा निलंबित (Suspend) नहीं किया जा सकता है।
| अनुच्छेद | विषय | मुख्य बिंदु |
| 19 | 6 स्वतंत्रताएँ | प्रेस की आजादी शामिल है |
| 20 | दोषसिद्धि से बचाव | एक अपराध, एक सजा |
| 21 | जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता | सबसे व्यापक अधिकार |
| 21-A | शिक्षा का अधिकार (मुफ्त शिक्षा) | 86वाँ संविधान संशोधन |
| 22 | गिरफ्तारी से सुरक्षा | 24 घंटे में मजिस्ट्रेट पेशी |
अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
यह अनुच्छेद नागरिकों और विदेशियों दोनों को मनमानी सजा से बचाता है। इसमें 3 मुख्य सिद्धांत हैं:
- कार्योत्तर विधि (Ex-post-facto Law): किसी व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं माना जाएगा जब तक उसने उस समय लागू किसी कानून का उल्लंघन न किया हो।
- दोहरी क्षति नहीं (No Double Jeopardy): एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार सजा नहीं दी जा सकती।
- स्व-अभिशंसन नहीं (No Self-incrimination): किसी भी व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता (जीवन का अधिकार)
यह संविधान का सबसे गतिशील अनुच्छेद है। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी व्याख्या बहुत व्यापक की है।
- मेनका गांधी केस (1978): कोर्ट ने कहा कि जीवन का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि “मानवीय गरिमा के साथ जीना” है।
- इसके अंतर्गत शामिल अन्य अधिकार: निजता का अधिकार (Privacy), विदेश जाने का अधिकार, आश्रय का अधिकार स्वच्छ हवा, स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, और त्वरित सुनवाई का अधिकार।
अनुच्छेद 21-A: शिक्षा का अधिकार (RTE)
- 86वाँ संशोधन (2002): इसके द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया।
विशेष टिप (Pro-Note):
परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि कौन से अधिकार आपातकाल में भी खत्म नहीं होते? याद रखें, अनुच्छेद 20 और 21 को 44वें संशोधन के बाद कभी भी निलंबित नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
यह उन लोगों को सुरक्षा देता है जिन्हें गिरफ्तार किया गया है:
- गिरफ्तारी का कारण जानने का हक।
- पसंद के वकील से सलाह लेने का हक।
- 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने का हक (यात्रा के समय को छोड़कर)।
निवारक निरोध (Preventive Detention): यदि किसी व्यक्ति से भविष्य में अपराध होने का खतरा हो, तो उसे बिना मुकदमा चलाए 3 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है।
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मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 12 से 22 और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निर्णय
आधारभूत ढांचा: अनुच्छेद 12 और 13
- अनुच्छेद 12 (‘राज्य’ की परिभाषा) अजय हासिया बनाम खालिद मुजीब (1981)‘राज्य’ के दायरे का विस्तार हुआ; सरकारी नियंत्रण वाली संस्थाएँ भी इसके अंतर्गत आईं।
- अनुच्छेद 13 (न्यायिक पुनरावलोकन )केशवानंद भारती केस (1973)’मूल ढांचे’ (Basic Structure) का सिद्धांत दिया गया; संसद अधिकारों को छीन नहीं सकती।
समानता का अधिकार: अनुच्छेद 14 से 18
समाज में व्याप्त भेदभाव को समाप्त करने के लिए ये अनुच्छेद सबसे शक्तिशाली हथियार हैं।
- अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता): ई.पी. रोयप्पा केस (1974) में कहा गया कि समानता और मनमानापन एक-दूसरे के दुश्मन हैं। मेनका गांधी केस (1978) ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 आपस में जुड़े हुए हैं।
- अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध): चंपकम दोराईराजन केस (1951) के बाद ही प्रथम संविधान संशोधन की आवश्यकता पड़ी।
- अनुच्छेद 16 (अवसर की समता): इन्दिरा साहनी केस (1992) जिसे ‘मंडल केस’ भी कहते हैं, इसमें आरक्षण की 50% सीमा तय की गई।
- अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत): कर्नाटक राज्य बनाम अप्पा बालू इंगले (1995) में इसे मानवता के विरुद्ध अपराध माना गया।
- अनुच्छेद 18 (उपाधियों का अंत): बालाजी राघवन केस (1996) में स्पष्ट हुआ कि पद्म पुरस्कार ‘सम्मान’ हैं, उपाधि नहीं।
स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 19 से 22
यह खंड नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण करता है।
अनुच्छेद 19: छह लोकतांत्रिक स्वतंत्रताएं
- रोमेश थापर केस (1950): प्रेस की स्वतंत्रता को वाक् एवं अभिव्यक्ति का हिस्सा माना।
- श्रेया सिंघल केस (2015): आईटी एक्ट की धारा 66A को रद्द कर इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी सुरक्षित की गई।
अनुच्छेद 20: दोषसिद्धि के विरुद्ध संरक्षण
- नंदिनी सत्पथी केस (1978): पुलिस किसी भी अभियुक्त को खुद के खिलाफ बोलने (Self-incrimination) के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता
- ए.के. गोपालन (1950): संकीर्ण व्याख्या।
- मेनका गांधी (1978): व्यापक व्याख्या; गरिमापूर्ण जीवन और विदेश जाने का अधिकार।
- के.एस. पुट्टास्वामी (2017): निजता का अधिकार (Right to Privacy) मौलिक अधिकार बना।
- ओल्गा टेलिस (1985): आजीविका कमाने का अधिकार भी इसी में शामिल है।
अनुच्छेद 21-A और 22
- अनुच्छेद 21-A (शिक्षा): मोहिनी जैन केस (1992) ने शिक्षा को ‘जीवन के अधिकार’ का अभिन्न अंग माना।
- अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी से संरक्षण): ADM जबलपुर केस (1976) ने आपातकाल में अधिकारों के निलंबन पर चर्चा की, जिसे बाद में सुधारा गया।
रिवीजन चार्ट (Quick Reference)
| कीवर्ड | अनुच्छेद | मुख्य वाद |
| मूल ढांचा | 13 | केशवानंद भारती |
| क्रीमी लेयर | 16 | इन्दिरा साहनी |
| निजता | 21 | पुट्टास्वामी |
| प्रेस की आजादी | 19 | रोमेश थापर |
| शिक्षा | 21-A | मोहिनी जैन |
महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Notes)
- मौलिक अधिकारों का वर्णन संविधान के भाग 3 में किया गया है।
- ये अधिकार अनुच्छेद 12 से 35 तक विस्तृत हैं।
- मौलिक अधिकारों का विचार अमेरिकी संविधान (Bill of Rights) से लिया गया है।
- भाग 3 को ‘भारत का मैग्नाकार्टा’ की संज्ञा दी गई है।
- मूल संविधान में कुल 7 मौलिक अधिकार थे।
- 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा ‘संपत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकारों से हटा दिया गया।
- वर्तमान में भारतीय नागरिकों को कुल 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं।
- मौलिक अधिकार न्यायोचित (Justiciable) हैं, यानी इनके उल्लंघन पर अदालत जाया जा सकता है।
- उच्चतम न्यायालय (SC) मौलिक अधिकारों का रक्षक और गारंटी देने वाला है।
- मौलिक अधिकार स्थायी नहीं हैं; संसद इनमें संशोधन कर सकती है।
- राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर सभी अधिकार निलंबित किए जा सकते हैं।
- अनुच्छेद 12: ‘राज्य’ शब्द की परिभाषा देता है।
- राज्य में केंद्र सरकार, संसद, राज्य सरकारें, विधानमंडल और सभी स्थानीय निकाय शामिल हैं।
- एलआईसी (LIC), ओएनजीसी (ONGC) जैसी वैधानिक संस्थाएं भी ‘राज्य’ की श्रेणी में आती हैं।
- अनुच्छेद 13: घोषणा करता है कि मौलिक अधिकारों से असंगत कानून शून्य (Void) होंगे।
- यह अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को ‘न्यायिक पुनरावलोकन’ (Judicial Review) की शक्ति देता है।
- सुप्रीम कोर्ट (Art 32) और हाई कोर्ट (Art 226) किसी भी असंवैधानिक कानून को रद्द कर सकते हैं।
- संविधान संशोधन को भी अनुच्छेद 13 के तहत चुनौती दी जा सकती है यदि वह मूल ढांचे का उल्लंघन करे।
- मौलिक अधिकार राजनीतिक लोकतंत्र के आदर्श को बढ़ावा देते हैं।
- ये अधिकार व्यक्ति को राज्य की कठोर सत्ता के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- कुछ मौलिक अधिकार केवल नागरिकों को प्राप्त हैं (15, 16, 19, 29, 30)।
- कुछ अधिकार नागरिकों और विदेशियों (शत्रु देश को छोड़कर) दोनों को प्राप्त हैं।
- मौलिक अधिकार असीमित नहीं हैं; राज्य इन पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगा सकता है।
- इन अधिकारों का निलंबन केवल राष्ट्रपति द्वारा किया जा सकता है।
- मौलिक अधिकारों का मुख्य उद्देश्य ‘कानून का शासन’ स्थापित करना है।
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता और विधियों का समान संरक्षण।
- ‘विधि के समक्ष समता’ का विचार ब्रिटेन से लिया गया है (नकारात्मक अवधारणा)।
- विधि का शासन (Rule of Law) संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।
- राष्ट्रपति और राज्यपाल को अनुच्छेद 361 के तहत अनुच्छेद 14 से छूट प्राप्त है।
- अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
- यह अनुच्छेद केवल नागरिकों को प्राप्त है।
- राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति है।
- सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC/SC/ST) के लिए आरक्षण का आधार यही अनुच्छेद है।
- अनुच्छेद 16: लोक नियोजन (सरकारी नौकरी) के विषय में अवसर की समता।
- पिछड़ा वर्ग आरक्षण और EWS आरक्षण (103वां संशोधन) इसी अनुच्छेद के अंतर्गत आते हैं।
- राज्य नियुक्तियों में किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करेगा।
- अनुच्छेद 17: ‘अस्पृश्यता’ (Untouchability) का अंत।
- अस्पृश्यता को किसी भी रूप में लागू करना एक दंडनीय अपराध है।
- यह अधिकार पूर्ण (Absolute) है, इसका कोई अपवाद नहीं है।
- अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत (Abolition of Titles)।
- राज्य सेना या विद्या संबंधी सम्मान के अलावा कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
- भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।
- ‘भारत रत्न’ और ‘पद्म पुरस्कार’ उपाधियाँ नहीं बल्कि सम्मान हैं (बालाजी राघवन केस)।
- अनुच्छेद 19: 6 लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा करता है।
- 19(1)(a): वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (प्रेस की स्वतंत्रता इसी में शामिल है)।
- 19(1)(b): शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन की स्वतंत्रता।
- 19(1)(c): संगम, संघ या सहकारी समितियाँ बनाने की स्वतंत्रता।
- 19(1)(d): भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र निर्बाध संचरण (घूमने) की स्वतंत्रता।
- 19(1)(e): भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता।
- 19(1)(g): कोई भी वृत्ति, व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता।
- सूचना का अधिकार (RTI) अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत एक मूल अधिकार माना गया है।
- हड़ताल करने का अधिकार (Right to Strike) मौलिक अधिकार नहीं है।
- अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण।
- यह अनुच्छेद नागरिकों और विदेशियों दोनों को सुरक्षा देता है।
- ‘कार्योत्तर विधि’ (Ex-post-facto law) से संरक्षण: कानून बनने से पहले के कृत्यों पर सजा नहीं।
- ‘दोहरी क्षति’ (Double Jeopardy) से संरक्षण: एक अपराध के लिए दो बार सजा नहीं।
- ‘स्व-अभिशंसन’ (Self-incrimination) से संरक्षण: खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
- अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।
- “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” के बिना किसी को जीवन से वंचित नहीं किया जा सकता।
- मेनका गांधी केस (1978) में अनुच्छेद 21 की व्यापक व्याख्या की गई।
- विदेश जाने का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा है।
- निजता का अधिकार (Right to Privacy) अब एक मूल अधिकार है (पुट्टास्वामी केस)।
- स्वच्छ पर्यावरण और आश्रय का अधिकार भी अनुच्छेद 21 में शामिल है।
- अनुच्छेद 21-A: शिक्षा का अधिकार (Right to Education)।
- इसे 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया।
- 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना राज्य का कर्तव्य है।
- अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और निरोध (Detention) से संरक्षण।
- गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है।
- पसंद के वकील से परामर्श करने का अधिकार अनुच्छेद 22 में है।
- निवारक निरोध (Preventive Detention) के तहत किसी को बिना ट्रायल के 3 महीने तक रखा जा सकता है।
- मौलिक अधिकार केवल दावों के रूप में नहीं, बल्कि राज्य पर सीमाओं के रूप में कार्य करते हैं।
- अनुच्छेद 15(6) और 16(6) को 2019 में जोड़ा गया (EWS आरक्षण)।
- राष्ट्रीय ध्वज फहराना अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकार है।
- चुप रहने का अधिकार (Right to Silence) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
- ‘प्रस्तावना’ मौलिक अधिकारों की व्याख्या का आधार है।
- अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होने पर उसे अनुच्छेद 13 के तहत चुनौती दी जा सकती है।
- ‘राज्य’ की परिभाषा में प्राइवेट एजेंसियां भी आ सकती हैं यदि वे राज्य के अंग के रूप में कार्य करें।
- अनुच्छेद 17 के तहत दंड देने की शक्ति संसद के पास है।
- अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955 का नाम बदलकर ‘सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम’ किया गया।
- अनुच्छेद 18 शैक्षणिक डिग्रियों (जैसे- PhD) पर रोक नहीं लगाता।
- अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रता केवल ‘नागरिकों’ को प्राप्त है।
- संचरण की स्वतंत्रता पर ‘जनजातीय क्षेत्रों’ के हित में रोक लगाई जा सकती है।
- संपत्ति का अधिकार अब अनुच्छेद 300-A के तहत एक ‘कानूनी अधिकार’ है।
- अनुच्छेद 20 और 21 आपातकाल में भी नहीं छीने जा सकते (44वां संशोधन)।
- हथकड़ी लगाना मानवाधिकारों और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
- त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) का अधिकार अनुच्छेद 21 में शामिल है।
- भोजन का अधिकार (Right to Food) भी अनुच्छेद 21 का हिस्सा माना गया है।
- इंटरनेट का उपयोग करना अब अनुच्छेद 19 और 21 के तहत एक बुनियादी हक है।
- अनुच्छेद 21-A के लिए ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ 2009 में पारित हुआ।
- निवारक निरोध का उपयोग केवल असाधारण स्थितियों में ही किया जाना चाहिए।
- मौलिक अधिकार ‘पूर्ण’ (Absolute) नहीं बल्कि ‘प्रतिबंधित’ (Qualified) हैं।
- मौलिक अधिकार व्यक्ति और समाज के हितों के बीच संतुलन बनाते हैं।
- डॉ. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान की ‘हृदय और आत्मा’ कहा (इसे हम Part 2 में पढ़ेंगे)।
- मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर सीधे उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार अनुच्छेद 32 देता है।
- भारतीय संविधान में ‘मूल अधिकारों’ का अध्याय सबसे विस्तृत है।
- सशस्त्र बलों के लिए मौलिक अधिकारों को संसद सीमित कर सकती है (अनुच्छेद 33)।
- मार्शल लॉ लागू होने पर मौलिक अधिकार प्रतिबंधित हो जाते हैं (अनुच्छेद 34)।
- मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति केवल संसद को है (अनुच्छेद 35)।
PYQ (Previous Year Questions)
प्रश्न 1 अनुच्छेद 14 किससे संबंधित है?(UPSC)
उत्तर: विधि के समक्ष समता
प्रश्न 2 ‘अस्पृश्यता’ का अंत किस अनुच्छेद में है?(SSC)
उत्तर: अनुच्छेद 17
प्रश्न 3 निजता का अधिकार किस अनुच्छेद के अंतर्गत आता है?(UPPSC)
उत्तर: अनुच्छेद 21
प्रश्न 4 अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ किसे प्राप्त हैं?(UPSC)
उत्तर: केवल नागरिकों को
प्रश्न 5 44वें संशोधन द्वारा किस अधिकार को मौलिक अधिकारों से हटाया गया?(State PCS)
उत्तर: संपत्ति का अधिकार
❓ FAQ
प्रश्न 1: मौलिक अधिकार कितने हैं?
वर्तमान में 6।
प्रश्न 2: मौलिक अधिकारों का संरक्षक कौन है?
उच्चतम न्यायालय।
प्रश्न 3: क्या मौलिक अधिकार पूर्ण हैं?
नहीं, ये उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं।
प्रश्न 4: शिक्षा का अधिकार किस संशोधन से जोड़ा गया?
86वाँ संशोधन (2002)।
प्रश्न 5: क्या आपातकाल में सभी मौलिक अधिकार निलंबित हो जाते हैं?
नहीं, अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं होते।
