स्वराज पार्टी और साइमन कमीशन (1923–1930)

असहयोग आंदोलन की वापसी (1922) के बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन के दौर में प्रवेश करता है।
एक ओर जहाँ कांग्रेस का एक वर्ग रचनात्मक कार्यक्रम पर टिके रहने के पक्ष में था, वहीं दूसरा वर्ग संवैधानिक राजनीति के भीतर रहकर संघर्ष करना चाहता था। इसी बहस से स्वराज पार्टी का जन्म हुआ।
इसी कालखंड में ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन (1927) भेजा—जिसका देशव्यापी विरोध आंदोलन को नई धार देता है।

📌 यह चरण बताता है कि भारतीय आंदोलन लचीला, रणनीतिक और जनोन्मुख था।


स्वराज पार्टी (Swaraj Party)

स्थापना और पृष्ठभूमि

  • स्थापना: 1923
  • प्रमुख नेता: चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू
  • कारण: असहयोग की वापसी के बाद काउंसिल-एंट्री बनाम काउंसिल-बॉयकॉट की बहस

उद्देश्य

  • विधायिकाओं में प्रवेश कर सरकारी कामकाज में अवरोध
  • भारतीय मांगों को मंच देना
  • सरकार की असंवेदनशील नीतियों को उजागर करना

📌 नारा: “काउंसिल में जाकर लड़ो।”


स्वराज पार्टी की रणनीति (Council-Entry Strategy)

प्रमुख बिंदु

  • चुनावों में भागीदारी
  • बजट, विधेयकों और प्रस्तावों पर कठोर आलोचना
  • जनहित विरोधी कदमों का प्रक्रियात्मक अवरोध

उपलब्धियाँ

  • केन्द्रीय व प्रांतीय विधानसभाओं में मजबूत उपस्थिति
  • प्रशासनिक खामियों का सार्वजनिक अनावरण
  • संवैधानिक राजनीति की विश्वसनीयता बनाए रखना

सीमाएँ

  • सीमित संवैधानिक शक्तियाँ
  • सरकारी बहुमत के कारण निर्णय पलटना कठिन
  • कांग्रेस के भीतर रणनीतिक मतभेद

📌 फिर भी, स्वराज पार्टी ने संघर्ष की लौ बुझने नहीं दी


साइमन कमीशन (1927)

गठन

  • घोषणा: 1927
  • उद्देश्य: 1919 के सुधारों की समीक्षा
  • संरचना: केवल ब्रिटिश सदस्य (एक भी भारतीय नहीं)

📌 यही तथ्य इसे अस्वीकार्य बनाता है।


साइमन कमीशन का विरोध

कारण

  • भारतीय प्रतिनिधित्व का अभाव
  • स्वशासन की आकांक्षाओं की अवहेलना
  • औपनिवेशिक अहंकार का प्रतीक

आंदोलन

  • नारा: “Simon Go Back”
  • देशव्यापी हड़तालें, जुलूस, बहिष्कार
  • कांग्रेस, स्वराज पार्टी और अन्य दलों की संयुक्त प्रतिक्रिया

ऐतिहासिक घटना

  • लाहौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान
    लाला लाजपत राय पर लाठीचार्ज
  • बाद में उनका निधन—राष्ट्रीय आक्रोश

📌 यह घटना आंदोलन को नैतिक ऊँचाई देती है।


भारतीय प्रतिक्रिया: वैकल्पिक संविधान की मांग

नेहरू रिपोर्ट (1928)

  • अध्यक्ष: मोतीलाल नेहरू
  • मांगें:
    • डोमिनियन स्टेटस
    • मौलिक अधिकार
    • संघीय ढाँचा

📌 ब्रिटिश अस्वीकृति ने संघर्ष को और तेज किया।


स्वराज पार्टी और साइमन कमीशन: संयुक्त प्रभाव

आंदोलन की दिशा

  • संवैधानिक राजनीति + जनआंदोलन का समन्वय
  • कांग्रेस के भीतर रणनीतिक एकता की पुनर्स्थापना

परिणाम

  • पूर्ण स्वराज की ओर वैचारिक छलांग (1929)
  • गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा की तैयारी

📌 यह चरण संक्रमण-काल का द्योतक है।


ऐतिहासिक महत्व

राष्ट्रीय आंदोलन के लिए

  • संवैधानिक मंच का प्रभावी उपयोग
  • औपनिवेशिक सुधारों की सीमाएँ उजागर
  • जन-भावनाओं का राष्ट्रीयकरण

ब्रिटिश नीति पर प्रभाव

  • सुधारों की वैधता पर प्रश्न
  • भविष्य की संवैधानिक पहलों की पृष्ठभूमि

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

✔ स्वराज पार्टी – 1923
✔ प्रमुख नेता – चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू
✔ साइमन कमीशन – 1927
✔ नारा – Simon Go Back
✔ नेहरू रिपोर्ट – 1928


निष्कर्ष (Conclusion)

स्वराज पार्टी और साइमन कमीशन का दौर यह सिद्ध करता है कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक-आयामी नहीं था।
जहाँ स्वराज पार्टी ने संवैधानिक ढाँचे के भीतर संघर्ष को जीवित रखा, वहीं साइमन कमीशन के बहिष्कार ने राष्ट्रीय एकजुटता को प्रखर किया।
इन्हीं अनुभवों से आगे चलकर पूर्ण स्वराज और सविनय अवज्ञा आंदोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ।

“रणनीति बदली, लक्ष्य नहीं—यही भारतीय आंदोलन की शक्ति थी।”


FAQs (Frequently Asked Questions)

Q1. स्वराज पार्टी क्यों बनी?

असहयोग की वापसी के बाद विधायिकाओं में प्रवेश कर संघर्ष जारी रखने हेतु।

Q2. स्वराज पार्टी की मुख्य रणनीति क्या थी?

काउंसिल-एंट्री और सरकारी कामकाज में अवरोध।

Q3. साइमन कमीशन का विरोध क्यों हुआ?

क्योंकि इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था।

Q4. ‘Simon Go Back’ आंदोलन का महत्व क्या था?

इसने राष्ट्रीय एकता और औपनिवेशिक विरोध को तेज किया।

Q5. इस चरण का दीर्घकालिक प्रभाव क्या पड़ा?

पूर्ण स्वराज की मांग और सविनय अवज्ञा आंदोलन की तैयारी।

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