संविधान की प्रस्तावना को ‘संविधान का परिचय’ या ‘संविधान की आत्मा’ कहा जाता है। यह उन महान आदर्शों और उद्देश्यों को दर्शाती है जिन्हें हमारे संविधान निर्माताओं ने हासिल करने का सपना देखा था। एम. लक्ष्मीकांत पुस्तक पर आधारित 100+ मास्टर वन-लाइनर्स नीचे दिए गए हैं:
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ऑडियो सारांश:भारतीय संविधान की प्रस्तावना
M. LAXMIKANTH 8TH EDITIONक्या आपके पास समय कम है? इस अध्याय के सभी महत्वपूर्ण बिंदुओं को केवल 3-4 मिनट के ऑडियो सारांश में समझें। यह रिवीजन के लिए सबसे उत्तम है।
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I. प्रस्तावना का परिचय और पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान की प्रस्तावना ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ (Objectives Resolution) पर आधारित है।
- इस उद्देश्य प्रस्ताव को 13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा पेश किया गया था।
- प्रस्तावना का विचार सबसे पहले अमेरिकी संविधान से लिया गया था।
- प्रस्तावना की भाषा और शैली ऑस्ट्रेलिया के संविधान से प्रभावित है।
- एन.ए. पालकीवाला ने प्रस्तावना को संविधान का ‘परिचय पत्र’ (Identity Card) कहा है।
- प्रस्तावना में अब तक केवल एक बार (42वें संशोधन, 1976) बदलाव किया गया है।
- 42वें संशोधन द्वारा इसमें तीन नए शब्द जोड़े गए: समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता।
- प्रस्तावना की शुरुआत “हम भारत के लोग” शब्दों से होती है।
- यह शब्द स्पष्ट करते हैं कि भारत की शक्ति का अंतिम स्रोत भारत की जनता है।
- प्रस्तावना भारत को एक ‘संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न’ राष्ट्र घोषित करती है।
- ‘संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न’ का अर्थ है कि भारत अपने आंतरिक और बाहरी मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र है।
- भारत न तो किसी अन्य देश का डोमिनियन है और न ही किसी पर निर्भर है।
- समाजवादी (Socialist): भारत में ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ है, न कि ‘साम्यवादी समाजवाद’।
- भारतीय समाजवाद मार्क्सवाद और गांधीवाद का मिला-जुला रूप है, जिसमें गांधीवाद का झुकाव अधिक है।
- धर्मनिरपेक्ष (Secular): इसका अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और वह सभी धर्मों का समान सम्मान करता है।
- भारत में ‘सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता’ (Positive Secularism) की अवधारणा अपनाई गई है।
- लोकतांत्रिक (Democratic): इसका अर्थ है कि सर्वोच्च शक्ति जनता के हाथों में है।
- भारत में अप्रत्यक्ष लोकतंत्र (प्रतिनिधि लोकतंत्र) है, जहाँ लोग अपने प्रतिनिधियों को चुनते हैं।
- गणराज्य (Republic): इसका अर्थ है कि भारत का राष्ट्रप्रमुख (राष्ट्रपति) निर्वाचित होगा।
- भारत में राष्ट्रप्रमुख का पद वंशानुगत (जैसे ब्रिटेन में) नहीं है।
- प्रस्तावना नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुरक्षित करने का लक्ष्य रखती है।
- ‘न्याय’ के इन तीन रूपों को 1917 की रूसी क्रांति से लिया गया है।
- प्रस्तावना में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता दी गई है।
- ‘स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व’ के आदर्शों को फ्रांसीसी क्रांति से लिया गया है।
- प्रस्तावना में ‘समता’ का अर्थ है समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेष विशेषाधिकारों की अनुपस्थिति।
II. प्रस्तावना के मुख्य शब्द और अर्थ
- प्रस्तावना के अनुसार संविधान को अपनाने की तिथि 26 नवंबर, 1949 है।
- आर्थिक न्याय का अर्थ है कि अमीर और गरीब के बीच की खाई को कम किया जाए।
- राजनीतिक न्याय का अर्थ है कि हर नागरिक को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों।
- बंधुत्व (Fraternity) का अर्थ है भाईचारे की भावना, जो देश की एकता सुनिश्चित करती है।
- संविधान की प्रस्तावना में ‘व्यक्ति की गरिमा’ को सर्वोच्च माना गया है।
- ‘अखंडता’ शब्द सुनिश्चित करता है कि भारत का कोई भी हिस्सा अलग नहीं हो सकता।
- प्रस्तावना संविधान के उद्देश्यों का संक्षिप्त विवरण प्रदान करती है।
- यह बताती है कि भारत एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है।
- प्रस्तावना में ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ है लोगों की गतिविधियों पर किसी भी अनुचित प्रतिबंध का अभाव।
- हालाँकि, स्वतंत्रता असीमित नहीं है; इसे संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही इस्तेमाल किया जा सकता है।
- ‘प्रतिष्ठा और अवसर की समता’ हर भारतीय नागरिक को प्राप्त है।
- प्रस्तावना न्यायालय में प्रवर्तनीय (Enforceable) नहीं है।
- इसका अर्थ है कि इसके प्रावधानों को लागू करवाने के लिए अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्ति का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर प्रतिबंध लगाती है।
- यह स्पष्ट करती है कि शासन का अंतिम लक्ष्य ‘कल्याणकारी राज्य’ की स्थापना है।
- प्रस्तावना संविधान की व्याख्या में ‘प्रकाश स्तंभ’ (Key to open the mind of makers) का कार्य करती है।
- जब संविधान की भाषा संदिग्ध हो, तब प्रस्तावना की मदद ली जाती है।
- प्रस्तावना को संविधान के लागू होने के सबसे अंत में स्वीकार किया गया था।
- ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ को सर्वसम्मति से 22 जनवरी 1947 को अपनाया गया था।
- संविधान की प्रस्तावना “अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित” करने की बात करती है।
- अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा था— “प्रस्तावना हमारे दीर्घकालिक सपनों का विचार है।”
- के.एम. मुंशी ने प्रस्तावना को भारत की ‘राजनीतिक कुंडली’ (Horoscope) कहा था।
- पंडित ठाकुर दास भार्गव ने इसे ‘संविधान का सबसे कीमती हिस्सा’ और ‘संविधान की आत्मा’ कहा।
- अर्नेस्ट बार्कर ने प्रस्तावना को संविधान का ‘Key Note’ कहा था।
- प्रस्तावना संविधान का दर्शन (Philosophy) प्रस्तुत करती है।
III. सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण केस और विवाद
- बेरुबारी यूनियन मामला (1960): इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है।”
- इस मामले में कोर्ट ने माना कि प्रस्तावना केवल मार्गदर्शक है, संविधान का हिस्सा नहीं।
- केशवानंद भारती मामला (1973): यह सबसे ऐतिहासिक फैसला था।
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले को पलटते हुए कहा कि “प्रस्तावना संविधान का अभिन्न भाग है।”
- कोर्ट ने यह भी कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत प्रस्तावना में संशोधन कर सकती है।
- लेकिन संसद प्रस्तावना के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) को नहीं बदल सकती।
- एल.आई.सी. ऑफ इंडिया मामला (1995): इसमें पुनः कहा गया कि प्रस्तावना संविधान का आंतरिक हिस्सा है।
- प्रस्तावना संविधान के आदर्शों और सिद्धांतों की आधारशिला है।
- 42वें संशोधन (1976) के बाद प्रस्तावना और भी विस्तृत हो गई।
- ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों ने भारत की वैचारिक दिशा स्पष्ट कर दी।
- सुप्रीम कोर्ट के अनुसार प्रस्तावना ‘न्याय योग्य’ नहीं है, लेकिन व्याख्या में सहायक है।
- प्रस्तावना यह सुनिश्चित करती है कि भारत की शासन प्रणाली जन-केंद्रित हो।
- यह भारत के लोकतांत्रिक स्वरूप की घोषणा करती है।
- प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ शब्द लोकप्रिय संप्रभुता (Popular Sovereignty) को दर्शाते हैं।
- यह स्पष्ट करती है कि ब्रिटिश सम्राट की सत्ता अब भारत में समाप्त हो गई है।
- प्रस्तावना में ‘अवसर की समानता’ का अर्थ है कि सभी को आगे बढ़ने के समान मौके मिलेंगे।
- न्यायपालिका प्रस्तावना के आधार पर किसी कानून की संवैधानिक वैधता की जांच कर सकती है।
- प्रस्तावना यह बताती है कि संविधान का अधिकार स्रोत (Source of Authority) कौन है।
- यह सरकार के स्वरूप की प्रकृति का वर्णन करती है।
- प्रस्तावना संविधान के लागू होने की तिथि को भी प्रमाणित करती है।
- प्रस्तावना में वर्णित ‘समाजवाद’ गरीबी, अज्ञानता और बीमारी को समाप्त करने का लक्ष्य रखता है।
- भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिम की नकारात्मक धर्मनिरपेक्षता से अलग है।
- प्रस्तावना में न्याय का आदर्श सामाजिक समानता सुनिश्चित करता है।
- राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए वयस्क मताधिकार और चुनाव अनिवार्य हैं।
- प्रस्तावना में ‘स्वतंत्रता’ के बिना ‘समता’ और ‘बंधुत्व’ बेमानी हैं।
- डॉ. अंबेडकर के अनुसार ‘समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व’ एक त्रिमूर्ति (Trinity) के समान हैं।
- इनमें से एक को भी अलग करने से लोकतंत्र का उद्देश्य विफल हो जाएगा।
- प्रस्तावना में ‘व्यक्ति की गरिमा’ मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक सिद्धांतों के माध्यम से सुनिश्चित की गई है।
- ‘अखंडता’ शब्द का उद्देश्य अलगाववादी प्रवृत्तियों को रोकना है।
- प्रस्तावना का मूल तत्व है— “एक राष्ट्र, एक लोग।”
- यह भारत को एक ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) बनाने का संकल्प है।
- संविधान की प्रस्तावना में कुल 85 शब्द थे (मूल संविधान में)।
- 42वें संशोधन के बाद शब्दों की संख्या बढ़ गई।
- प्रस्तावना को सुंदर ढंग से सजाने का कार्य नंदलाल बोस के शिष्यों ने किया था।
- सुलेखक राम मनोहर सिन्हा ने प्रस्तावना के पन्नों को हाथ से डिजाइन किया था।
- प्रस्तावना यह याद दिलाती है कि भारत किसी भी सैन्य ब्लॉक का हिस्सा नहीं है (संप्रभुता)।
- प्रस्तावना में ‘सामाजिक न्याय’ का अर्थ है कि किसी के साथ धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव न हो।
- ‘आर्थिक न्याय’ धन के समान वितरण की दिशा में एक संकेत है।
- प्रस्तावना में ‘विश्वास और उपासना’ की स्वतंत्रता धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करती है।
- प्रस्तावना संविधान की ‘कुंजी’ (Key) है।
- यह प्रस्तावना ही है जो भारत को ‘गणराज्य’ के रूप में स्थापित करती है।
- संविधान के अनुच्छेद 368 का उपयोग प्रस्तावना को और बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है।
- प्रस्तावना में संशोधन ‘नकारात्मक’ नहीं होना चाहिए।
- केशवानंद भारती केस के बाद प्रस्तावना को संविधान का ‘हृदय’ भी कहा जाने लगा।
- प्रस्तावना बताती है कि भारत का संविधान किसी बाहरी शक्ति द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं भारतीयों द्वारा बनाया गया है।
- प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द यह सुनिश्चित करता है कि राज्य सभी धर्मों के साथ समान दूरी बनाए रखेगा।
- यह शब्द भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है।
- प्रस्तावना में वर्णित ‘प्रस्तावना’ वास्तव में पूरे संविधान का निचोड़ (Summary) है।
- एम. लक्ष्मीकांत के अनुसार, प्रस्तावना भारतीय राजनीति के सर्वोच्च लक्ष्यों को परिभाषित करती है।
- प्रस्तावना को पढ़ना हर नागरिक के लिए अनिवार्य है ताकि वह संविधान के सार को समझ सके।
तुलना तालिका: प्रस्तावना के प्रमुख शब्द और उनके अर्थ
| शब्द (Key Word) | मुख्य अर्थ (Meaning) | स्रोत / महत्व |
| संप्रभु (Sovereign) | आंतरिक और बाहरी रूप से स्वतंत्र | भारत का अपना सर्वोच्च नियंत्रण |
| समाजवादी | लोकतांत्रिक समाजवाद (मिश्रित अर्थव्यवस्था) | 42वां संशोधन (1976) |
| धर्मनिरपेक्ष | सभी धर्मों का समान सम्मान | 42वां संशोधन (1976) |
| लोकतांत्रिक | जनता का शासन (प्रतिनिधि लोकतंत्र) | जनता की शक्ति |
| गणराज्य | निर्वाचित राष्ट्रप्रमुख (राष्ट्रपति) | भारत का प्रमुख वंशानुगत नहीं |
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