“भारतीय संविधान के भाग V के अंतर्गत अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद के गठन, संरचना, अवधि, अधिकारियों, प्रक्रियाओं और शक्तियों का वर्णन किया गया है। भारत ने ‘वेस्टमिंस्टर मॉडल’ यानी ब्रिटेन की तर्ज पर संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया है। संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है, जिसका मुख्य कार्य देश के लिए कानून बनाना है। संविधान के अनुसार, भारतीय संसद के तीन प्रमुख अंग हैं— राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा।”
I. संसद का गठन और राज्यसभा की संरचना
- भारतीय संविधान के भाग 5 में संसद का वर्णन है।
- संसद से संबंधित अनुच्छेद 79 से 122 तक हैं।
- अनुच्छेद 79: भारत की एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी।
- भारत ने सरकार का संसदीय मॉडल अपनाया है, जिसे ‘वेस्टमिंस्टर मॉडल’ भी कहते हैं।
- संसद के तीन अंग हैं: राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा।
- राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है।
- राज्यसभा को ‘उच्च सदन’, ‘द्वितीय सदन’ या ‘बड़ों की सभा’ कहा जाता है।
- लोकसभा को ‘निम्न सदन’, ‘प्रथम सदन’ या ‘लोकप्रिय सदन’ कहा जाता है।
- राज्यसभा की अधिकतम संख्या: 250 निर्धारित है (अनुच्छेद 80)।
- वर्तमान में राज्यसभा में 245 सदस्य हैं।
- राज्यसभा में 229 सदस्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- राज्यसभा में 4 सदस्य केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।
- मनोनयन का आधार: साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा में विशेष ज्ञान।
- राज्यसभा में राज्यों की सीटों का आवंटन चौथी अनुसूची में दिया गया है।
- राज्यसभा सदस्यों का चुनाव राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा होता है।
- निर्वाचन प्रणाली: आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत पद्धति।
- राज्यसभा में सीटों का बंटवारा राज्यों की जनसंख्या के आधार पर होता है।
- अमेरिका में ‘सीनेट’ (उच्च सदन) में सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व (2 सीटें) प्राप्त है।
- उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में सर्वाधिक 31 सदस्य आते हैं।
- वर्तमान में केवल 3 केंद्र शासित प्रदेशों (दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर) का राज्यसभा में प्रतिनिधित्व है।
- अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की जनसंख्या कम होने के कारण उनका अलग प्रतिनिधित्व नहीं है।
- राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसे कभी भंग नहीं किया जा सकता (अनुच्छेद 83)।
- राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष निर्धारित है।
- इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
- सेवानिवृत्त सदस्य कितनी भी बार पुननिर्वाचित हो सकते हैं।
- राज्यसभा का सभापति उपराष्ट्रपति होता है।
- राज्यसभा अपने सदस्यों में से एक उप-सभापति चुनती है।
- राज्यसभा राज्यों के हितों का केंद्र में संरक्षण करती है।
- अनुच्छेद 249 के तहत राज्यसभा संसद को राज्य सूची पर कानून बनाने की शक्ति दे सकती है।
- अनुच्छेद 312 के तहत राज्यसभा नई अखिल भारतीय सेवा बनाने का प्रस्ताव ला सकती है।
- धन विधेयक (Money Bill) के मामले में राज्यसभा के पास सीमित शक्तियां हैं।
- राज्यसभा धन विधेयक को केवल 14 दिनों तक रोक सकती है।
- राज्यसभा धन विधेयक में संशोधन का केवल सुझाव दे सकती है, उसे लागू नहीं कर सकती।
- संविधान संशोधन विधेयक के मामले में राज्यसभा की शक्ति लोकसभा के बराबर है।
II. लोकसभा की संरचना और निर्वाचन
- लोकसभा की अधिकतम संख्या: 550 निर्धारित है (अनुच्छेद 81)।
- पहले यह 552 थी, लेकिन 104वें संशोधन (2019) द्वारा 2 आंग्ल-भारतीय सीटों को खत्म कर दिया गया।
- वर्तमान में लोकसभा की प्रभावी संख्या 543 है।
- लोकसभा सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं।
- निर्वाचन प्रणाली: प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र (Territorial Constituencies) पद्धति।
- मतदान का आधार: वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise)।
- 61वें संशोधन (1988) द्वारा मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की गई।
- लोकसभा चुनाव में ‘सबसे आगे रहने वाले की जीत’ (First-Past-The-Post) प्रणाली अपनाई जाती है।
- लोकसभा में सीटों का आवंटन राज्यों की जनसंख्या के आधार पर होता है।
- 84वें संशोधन (2001) ने लोकसभा सीटों की संख्या 2026 तक स्थिर कर दी है।
- सीटों के आवंटन के लिए वर्तमान में 1971 की जनगणना को आधार माना गया है।
- निर्वाचन क्षेत्रों के सीमा निर्धारण के लिए 2001 की जनगणना का उपयोग किया जाता है।
- परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करता है।
- लोकसभा में SC और ST के लिए सीटें आरक्षित हैं (अनुच्छेद 330)।
- वर्तमान में लोकसभा में SC के लिए 84 और ST के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं।
- आरक्षण केवल सीटों का है, चुनाव ‘संयुक्त निर्वाचक मंडल’ द्वारा ही होता है।
- लोकसभा का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
- राष्ट्रपति किसी भी समय लोकसभा को भंग कर सकता है।
- राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान लोकसभा का कार्यकाल एक बार में 1 वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है।
- आपातकाल खत्म होने के बाद यह वृद्धि 6 महीने से अधिक नहीं हो सकती।
- लोकसभा के सदस्य अपने बीच से एक अध्यक्ष (Speaker) और उपाध्यक्ष चुनते हैं।
- लोकसभा अध्यक्ष को केवल लोकसभा के प्रभावी बहुमत द्वारा हटाया जा सकता है।
- लोकसभा ‘मंत्रिपरिषद’ पर नियंत्रण रखने वाला सबसे शक्तिशाली सदन है।
- अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही लाया जा सकता है।
- धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पेश किया जा सकता है।
- संयुक्त बैठक (Joint Sitting) में लोकसभा की संख्या बल के कारण उसका पलड़ा भारी रहता है।
- लोकसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेते हैं।
- प्रोटेम स्पीकर नवनिर्वाचित सदस्यों को शपथ दिलाता है।
- लोकसभा अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को सौंपता है।
- लोकसभा के भंग होने पर भी अध्यक्ष अपना पद नहीं छोड़ता (अगली बैठक तक)।
- संसद का सत्र बुलाने की शक्ति राष्ट्रपति के पास है।
- संसद के दो सत्रों के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।
- एक वर्ष में संसद के कम से कम 2 सत्र होना अनिवार्य है।
- आमतौर पर भारत में तीन सत्र होते हैं: बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र।
- कोरम (गणपूर्ति): सदन की कार्यवाही चलाने के लिए कुल सदस्यों का 1/10 उपस्थित होना अनिवार्य है।
III. सदस्यों की योग्यता, अयोग्यता और शपथ
- संसद सदस्य (MP) की योग्यता: वह भारत का नागरिक हो (अनुच्छेद 84)।
- राज्यसभा के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए।
- लोकसभा के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष होनी चाहिए।
- उसे ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951’ के तहत अन्य शर्तें पूरी करनी चाहिए।
- निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक पंजीकृत मतदाता होना अनिवार्य है।
- अयोग्यता (अनुच्छेद 102): यदि वह केंद्र या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर हो।
- यदि वह विकृत चित्त (Unsound mind) या दिवालिया घोषित हो।
- यदि उसकी भारत की नागरिकता समाप्त हो गई हो।
- अनुच्छेद 102 के तहत अयोग्यता का निर्णय राष्ट्रपति, चुनाव आयोग की सलाह पर लेता है।
- दलबदल (10वीं अनुसूची): 52वें संशोधन (1985) द्वारा दलबदल के आधार पर अयोग्यता जोड़ी गई।
- दलबदल के आधार पर अयोग्यता का निर्णय सदन का अध्यक्ष/सभापति करता है।
- दोहरी सदस्यता: कोई व्यक्ति एक साथ संसद के दोनों सदनों का सदस्य नहीं हो सकता।
- यदि कोई व्यक्ति दोनों सदनों के लिए चुना जाता है, तो उसे 10 दिन में बताना होगा कि वह किस सदन में रहना चाहता है।
- यदि वह नहीं बताता, तो उसकी राज्यसभा की सीट खाली हो जाती है।
- यदि कोई वर्तमान सांसद दूसरे सदन के लिए चुना जाता है, तो उसकी पुरानी सीट खाली हो जाती है।
- यदि कोई व्यक्ति एक साथ दो सीटों से चुनाव जीतता है, तो उसे एक चुननी होगी वरना दोनों सीटें खाली हो जाएंगी।
- संसद सदस्य एक साथ राज्य विधानमंडल का सदस्य भी नहीं हो सकता।
- शपथ: प्रत्येक सदस्य को राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी होती है।
- शपथ लिए बिना कोई सदस्य सदन की कार्यवाही में भाग नहीं ले सकता और न ही उसे वेतन मिलता है।
- यदि कोई सदस्य बिना शपथ लिए सदन में बैठता है, तो उस पर ₹500 प्रतिदिन का जुर्माना लगता है।
- पद का रिक्त होना: यदि कोई सदस्य सदन की अनुमति के बिना 60 दिनों तक अनुपस्थित रहता है।
- सदन किसी सदस्य की सीट को रिक्त घोषित कर सकता है यदि वह अयोग्य पाया जाए।
- सांसद अपना इस्तीफा संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति को देते हैं।
- अध्यक्ष/सभापति इस्तीफा स्वीकार करने से इनकार कर सकते हैं यदि उन्हें लगे कि यह स्वैच्छिक नहीं है।
- सांसदों के वेतन और भत्ते संसद द्वारा कानून बनाकर तय किए जाते हैं।
- सांसदों को ‘पेंशन’ का अधिकार संविधान में नहीं था, इसे संसद ने कानून बनाकर लागू किया।
- अनुच्छेद 105: सांसदों को प्राप्त विशेषाधिकार (Privileges) का वर्णन करता है।
- सदन में कही गई किसी भी बात के लिए सांसद के खिलाफ कोर्ट में कार्यवाही नहीं की जा सकती।
- सत्र के दौरान और सत्र से 40 दिन पहले/बाद में सांसद को दीवानी मामलों में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।
क्या आप इन नोट्स को ऑफलाइन पढ़ना चाहते हैं?
📄 डाउनलोड करें (Click here)(“ऐसे ही और शानदार PDF नोट्स के लिए हमारे टेलीग्राम चैनल से अभी जुड़ें!”)