भारतीय संघीय ढांचे में राज्यों के बीच समन्वय बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। अंतर-राज्य संबंध मुख्यतः जल विवाद (Art. 262), अंतर-राज्य परिषद (Art. 263), पूर्ण विश्वास और साख (Art. 261), तथा व्यापार की स्वतंत्रता (Art. 301–307) से जुड़े हैं। यह अध्याय सहकारी संघवाद को मजबूत करने वाले संवैधानिक व सांविधिक तंत्रों को स्पष्ट करता है।

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अंतर-राज्य संबंध (Inter-State Relations): एक परिचय
भारतीय संविधान ने केंद्र और राज्यों के संबंधों के साथ-साथ राज्यों के आपसी संबंधों के लिए भी विशेष प्रावधान किए हैं। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विवादों को सुलझाना और ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देना है।
संविधान के तहत अंतर-राज्य संबंधों के चार मुख्य स्तंभ हैं:
अंतर-राज्यीय जल विवाद (Inter-State Water Disputes) – अनुच्छेद 262
भारत में नदियाँ राज्यों की सीमाओं में बँधी नहीं हैं। जब एक नदी कई राज्यों से होकर गुजरती है, तो उसके जल के बँटवारे को लेकर विवाद होना स्वाभाविक है। अनुच्छेद 262 संसद को यह शक्ति देता है कि वह इन विवादों के समाधान के लिए विशेष कानून और न्यायाधिकरण (Tribunal) बना सके।
अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) – अनुच्छेद 263
यह एक ऐसा साझा मंच है जहाँ केंद्र और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री एक साथ बैठकर साझा हितों के विषयों पर चर्चा करते हैं। इसका उद्देश्य नीति निर्माण में राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
पूर्ण विश्वास और साख (Full Faith and Credit) – अनुच्छेद 261
यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि एक राज्य के सार्वजनिक अधिनियम, रिकॉर्ड और न्यायिक फैसले पूरे भारत में मान्य हों। यह देश में विधिक एकरूपता (Legal Uniformity) बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
अंतर-राज्यीय व्यापार और वाणिज्य – अनुच्छेद 301-307
संविधान का भाग 13 यह सुनिश्चित करता है कि भारत की सीमाओं के भीतर व्यापार और वाणिज्य निर्बाध (Free) हो। राज्य अपने हितों के लिए दूसरे राज्यों के व्यापार पर अनुचित प्रतिबंध नहीं लगा सकते।
💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):
जहाँ अनुच्छेद 262 जल विवादों के लिए न्यायालय के हस्तक्षेप को रोकता है, वहीं अनुच्छेद 263 विवादों को बातचीत से सुलझाने का मार्ग प्रशस्त करता है। इसके अलावा, क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils) भले ही संवैधानिक न हों, लेकिन वे राज्यों के बीच आर्थिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाने का सबसे प्रभावी ‘सांविधिक’ (Statutory) मंच हैं।”
अंतर-राज्यीय जल विवाद (Inter-State Water Disputes) अनुच्छेद 262
संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल से संबंधित विवादों के न्यायनिर्णयन (Adjudication) के लिए विशेष व्यवस्था करता है।
संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)
इस अनुच्छेद के तहत दो मुख्य शक्तियाँ दी गई हैं:
- संसद की शक्ति: संसद कानून बनाकर अंतर-राज्यीय नदी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंध में किसी भी विवाद के निपटारे का प्रावधान कर सकती है।
- न्यायालयों पर रोक: संसद यह भी प्रावधान कर सकती है कि ऐसे किसी भी विवाद में न तो उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) और न ही कोई अन्य न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करेगा।
संसदीय अधिनियम (Parliamentary Acts)
अनुच्छेद 262 का उपयोग करते हुए संसद ने दो महत्वपूर्ण कानून बनाए हैं:
- नदी बोर्ड अधिनियम (1956): इसका उद्देश्य अंतर-राज्यीय नदियों के विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा ‘नदी बोर्डों’ की स्थापना करना है (राज्यों की सलाह पर)।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956): यह केंद्र सरकार को एक न्यायाधिकरण (Tribunal) गठित करने की शक्ति देता है। यदि कोई राज्य सरकार केंद्र से अनुरोध करती है कि जल विवाद को बातचीत से नहीं सुलझाया जा सकता, तो केंद्र ट्रिब्यूनल बनाता है।
न्यायाधिकरण (Tribunal) की विशेषताएँ
- ट्रिब्यूनल का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता है।
- चूंकि संसद ने न्यायालय के हस्तक्षेप को रोका है, इसलिए ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ साधारणतः अपील नहीं की जा सकती (हालांकि अनुच्छेद 136 के तहत ‘विशेष अनुमति याचिका’ के माध्यम से SC हस्तक्षेप कर सकता है)।
प्रमुख जल विवाद न्यायाधिकरण (Major Water Dispute Tribunals)
| न्यायाधिकरण (Tribunal) | संबंधित राज्य | स्थापना वर्ष |
| कावेरी जल विवाद | तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी | 1990 |
| कृष्णा जल विवाद (I & II) | महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना | 1969, 2004 |
| नर्मदा जल विवाद | राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र | 1969 |
| रावी और व्यास विवाद | पंजाब, हरियाणा और राजस्थान | 1986 |
| वंशधारा जल विवाद | ओडिशा और आंध्र प्रदेश | 2010 |
| महादयी जल विवाद | गोवा, कर्नाटक और महाराष्ट्र | 2010 |
💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):
संशोधन बिल 2019 : सरकार अब एक ‘एकल ट्रिब्यूनल’ (Single Standalone Tribunal) बनाने की दिशा में काम कर रही है ताकि अलग-अलग ट्रिब्यूनल बनाने में होने वाली देरी को खत्म किया जा सके और विवादों का समाधान समय सीमा के भीतर हो सके।
पूर्ण विश्वास और साख (Full Faith and Credit) अनुच्छेद 261
चूंकि भारत एक संघीय देश है और राज्यों के अपने नागरिक अधिकार क्षेत्र होते हैं, इसलिए यह अनुच्छेद विधिक एकरूपता (Legal Uniformity) सुनिश्चित करता है।
- सार्वजनिक अधिनियम और रिकॉर्ड: पूरे भारत में संघ और प्रत्येक राज्य के सार्वजनिक अधिनियमों (Public Acts), रिकॉर्डों और न्यायिक कार्यवाहियों को ‘पूर्ण विश्वास और साख’ दी जाएगी।
- उदाहरण: यदि उत्तर प्रदेश में कोई जन्म प्रमाण पत्र जारी हुआ है, तो उसे केरल में भी वैध दस्तावेज़ माना जाएगा।
- न्यायिक शक्ति: किसी राज्य के दीवानी (Civil) न्यायालय द्वारा दिए गए अंतिम निर्णय या आदेश पूरे भारत में कहीं भी निष्पादित (Execute) किए जा सकते हैं।
- अपवाद: यह प्रावधान केवल दीवानी (Civil) मामलों पर लागू होता है, आपराधिक (Criminal) मामलों पर नहीं। (क्योंकि दंड प्रक्रिया प्रत्येक राज्य की अपनी पुलिस और कानून व्यवस्था पर निर्भर करती है)।
अंतर-राज्यीय व्यापार और वाणिज्य अनुच्छेद 301-307
संविधान का भाग 13 भारत के भीतर व्यापारिक बाधाओं को दूर कर इसे एक ‘एकल आर्थिक इकाई’ बनाने का प्रयास करता है।
- अनुच्छेद 301 (व्यापार की स्वतंत्रता): यह घोषणा करता है कि पूरे भारत में व्यापार, वाणिज्य और समागम (Intercourse) निर्बाध (Free) होगा। इसका उद्देश्य राज्यों के बीच व्यापारिक दीवारों को गिराना है।
- संसद की शक्ति (अनुच्छेद 302): संसद सार्वजनिक हित में व्यापार की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है (जैसे- अकाल के समय अनाज के परिवहन को सीमित करना)।
- राज्यों के बीच भेदभाव पर रोक (अनुच्छेद 303): संसद या राज्य विधानमंडल किसी एक राज्य को दूसरे राज्य के मुकाबले व्यापारिक प्राथमिकता नहीं दे सकते।
- राज्यों की शक्ति (अनुच्छेद 304): कोई राज्य दूसरे राज्यों से आने वाले माल पर वैसा ही कर (Tax) लगा सकता है जैसा वह अपने राज्य में बने माल पर लगाता है, ताकि स्थानीय व्यापार को नुकसान न हो।
💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):
अनुच्छेद 301 :भारत को एक ‘कॉमन मार्केट’ बनाता है। हालांकि, राज्यों को कर लगाने का अधिकार है, लेकिन वे इसका उपयोग ‘भेदभाव’ करने के लिए नहीं कर सकते। वर्तमान में GST ने अनुच्छेद 301 की इस भावना को और अधिक मजबूत किया है।”
अनुच्छेद 261 बनाम 301
| प्रावधान | अनुच्छेद | मुख्य उद्देश्य |
| पूर्ण विश्वास और साख | 261 | न्यायिक और कानूनी दस्तावेजों की अखिल भारतीय मान्यता। |
| व्यापार की स्वतंत्रता | 301 | भारत को एक ‘मुक्त आर्थिक क्षेत्र’ बनाना। |
| प्रतिबंध लगाने की शक्ति | 302 | सार्वजनिक हित में संसद द्वारा नियंत्रण। |
क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)
क्षेत्रीय परिषदें भारत में संवैधानिक निकाय नहीं हैं। इनका गठन संसद के एक अधिनियम, यानी ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956’ के माध्यम से किया गया है। इसलिए, इन्हें सांविधिक (Statutory) निकाय कहा जाता है।
उद्देश्य और प्रकृति
- इनका मुख्य उद्देश्य राज्यों के बीच ‘भावनात्मक एकीकरण’ को बढ़ाना और अंतर-राज्यीय विवादों को बातचीत से सुलझाना है।
- ये केवल सलाहकारी (Advisory) निकाय हैं; इनके सुझाव सरकारों पर बाध्यकारी नहीं होते।
संरचना (Composition)
- अध्यक्ष (Chairman): भारत के केंद्रीय गृह मंत्री सभी पाँचों क्षेत्रीय परिषदों के साझा अध्यक्ष होते हैं।
- उपाध्यक्ष: क्षेत्र के राज्यों के मुख्यमंत्री रोटेशन के आधार पर एक वर्ष के लिए उपाध्यक्ष बनते हैं।
- सदस्य: क्षेत्र के प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्री और दो अन्य मंत्री, तथा क्षेत्र के केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक।
भारत की 5 क्षेत्रीय परिषदें और उनके मुख्यालय
यह तालिका छात्रों को ‘मैच द फॉलोइंग’ (Match the following) प्रश्नों के लिए रट लेनी चाहिए:
| परिषद (Zonal Council) | शामिल राज्य/UTs | मुख्यालय (HQ) |
| उत्तरी (Northern) | हरियाणा, हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़, J&K, लद्दाख | नई दिल्ली |
| मध्य (Central) | उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश | प्रयागराज |
| पूर्वी (Eastern) | बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा | कोलकाता |
| पश्चिमी (Western) | गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, दमन-दीव और दादरा-नगर हवेली | मुंबई |
| दक्षिणी (Southern) | आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, पुडुचेरी | चेन्नई |
पूर्वोत्तर परिषद (North-Eastern Council – NEC)
पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक अलग अधिनियम—‘पूर्वोत्तर परिषद अधिनियम, 1971’ के तहत एक विशेष परिषद बनाई गई है।
- इसमें 8 राज्य शामिल हैं: अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम।
- इसका कार्य पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए एकीकृत क्षेत्रीय योजनाएँ बनाना और सुरक्षा संबंधी समन्वय करना है।
💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):
“अक्सर एग्जाम में पूछा जाता है कि क्या प्रधानमंत्री क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष होते हैं? जवाब है— नहीं, अध्यक्ष हमेशा गृह मंत्री होते हैं। प्रधानमंत्री केवल अंतर-राज्य परिषद (Art 263) के अध्यक्ष होते हैं।”
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
अंतर-राज्यीय जल विवाद (अनुच्छेद 262)
- अंतर-राज्यीय जल विवादों का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 262 में किया गया है।
- अनुच्छेद 262 संसद को जल विवादों के निपटारे के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है।
- संसद ने इसके तहत नदी बोर्ड अधिनियम (1956) और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) बनाए।
- जल विवादों के मामले में संसद उच्चतम न्यायालय (SC) के अधिकार क्षेत्र को रोक सकती है।
- जल विवादों के समाधान के लिए केंद्र सरकार न्यायाधिकरण (Tribunal) का गठन करती है।
- ट्रिब्यूनल का निर्णय अंतिम और संबंधित राज्यों के लिए बाध्यकारी होता है।
- कावेरी जल विवाद मुख्य रूप से तमिलनाडु और कर्नाटक (साथ ही केरल व पुडुचेरी) के बीच है।
- कृष्णा जल विवाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के बीच है।
- नर्मदा जल विवाद में गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान शामिल हैं।
- रावी-व्यास विवाद पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से संबंधित है।
- जल विवाद ट्रिब्यूनल के गठन का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है।
अंतर-राज्य परिषद (अनुच्छेद 263)
- अंतर-राज्य परिषद एक संवैधानिक निकाय है जिसका उल्लेख अनुच्छेद 263 में है।
- परिषद की स्थापना करने की शक्ति राष्ट्रपति के पास है।
- सरकारी आयोग (1983) ने स्थायी अंतर-राज्य परिषद के गठन की सिफारिश की थी।
- पहली बार अंतर-राज्य परिषद का गठन 1990 में किया गया था।
- प्रधानमंत्री अंतर-राज्य परिषद के पदेन अध्यक्ष होते हैं।
- सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इस परिषद के सदस्य होते हैं।
- केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासक/मुख्यमंत्री भी इसके सदस्य होते हैं।
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित 6 केंद्रीय कैबिनेट मंत्री इसके सदस्य होते हैं।
- परिषद की बैठक वर्ष में कम से कम तीन बार होनी चाहिए।
- अंतर-राज्य परिषद की प्रकृति केवल सलाहकारी (Advisory) होती है।
- परिषद की एक स्थायी समिति होती है जिसका अध्यक्ष केंद्रीय गृह मंत्री होता है।
पूर्ण विश्वास और साख (अनुच्छेद 261)
- अनुच्छेद 261 के तहत एक राज्य के सार्वजनिक रिकॉर्ड को दूसरे राज्य में मान्यता दी जाती है।
- इसे ‘पूर्ण विश्वास और साख’ (Full Faith and Credit) का सिद्धांत कहा जाता है।
- यह प्रावधान केवल दीवानी (Civil) मामलों पर लागू होता है, फौजदारी (Criminal) पर नहीं।
- एक राज्य के सिविल कोर्ट के फैसले पूरे भारत में कहीं भी लागू किए जा सकते हैं।
अंतर-राज्यीय व्यापार (अनुच्छेद 301-307)
- अंतर-राज्यीय व्यापार और वाणिज्य का वर्णन संविधान के भाग 13 में है।
- अनुच्छेद 301 के अनुसार पूरे भारत में व्यापार और वाणिज्य निर्बाध (Free) होगा।
- संसद सार्वजनिक हित में व्यापार की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगा सकती है (अनुच्छेद 302)।
- राज्यों के बीच व्यापारिक भेदभाव को रोकने की शक्ति संसद के पास है।
- कोई राज्य दूसरे राज्य से आने वाले माल पर भेदभावपूर्ण कर (Tax) नहीं लगा सकता।
क्षेत्रीय परिषदें (Zonal Councils)
- क्षेत्रीय परिषदें संवैधानिक निकाय नहीं हैं, ये सांविधिक (Statutory) निकाय हैं।
- इनका गठन राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
- भारत में कुल 5 क्षेत्रीय परिषदें (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, मध्य) हैं।
- केंद्रीय गृह मंत्री सभी पाँचों क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष होते हैं।
- संबंधित क्षेत्र के राज्यों के मुख्यमंत्री रोटेशन से उपाध्यक्ष बनते हैं।
- क्षेत्रीय परिषदों का उद्देश्य राज्यों के बीच आर्थिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है।
- उत्तरी क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय नई दिल्ली में है।
- मध्य क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय प्रयागराज में है।
- पूर्वी क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय कोलकाता में है।
- पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय मुंबई में है।
- दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद का मुख्यालय चेन्नई में है।
- पूर्वोत्तर परिषद (NEC) का गठन एक अलग अधिनियम (1971) द्वारा किया गया था।
- पूर्वोत्तर परिषद में कुल 8 राज्य (सिक्किम सहित) शामिल हैं।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- नीति आयोग भी सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने वाला एक गैर-संवैधानिक मंच है।
- अंतर-राज्य संबंधों का मुख्य लक्ष्य सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) है।
- क्षेत्रीय परिषदों की बैठकें केवल सलाहकारी होती हैं।
- अनुच्छेद 263 के तहत परिषद का मुख्य कार्य राज्यों के साझा हितों की जांच करना है।
- एस.आर. बोम्मई केस संघवाद और अंतर-राज्य संतुलन के लिए मील का पत्थर है।
- राज्यों के बीच सीमा विवादों को अक्सर सुप्रीम कोर्ट के मूल अधिकार क्षेत्र (Art 131) के तहत सुलझाया जाता है।
PYQ (UPSC/PCS Pattern)
Q1. अनुच्छेद 262 किससे संबंधित है?
(a) व्यापार (b) जल विवाद (c) परिषद (d) अनुदान
✅ उत्तर: (b)
Q2. अंतर-राज्य परिषद का गठन किस अनुच्छेद के तहत होता है?
(a) 261 (b) 262 (c) 263 (d) 301
✅ उत्तर: (c)
Q3. क्षेत्रीय परिषदें किस अधिनियम से स्थापित हुईं?
(a) 1935 अधिनियम
(b) राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956
(c) जल विवाद अधिनियम
(d) संविधान संशोधन
✅ उत्तर: (b)
❓ FAQ
Q1. क्या जल विवाद मामलों में सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र समाप्त किया जा सकता है?
हाँ, अनुच्छेद 262 के तहत संसद ऐसा प्रावधान कर सकती है।
Q2. अंतर-राज्य परिषद का उद्देश्य क्या है?
राज्यों के बीच सहयोग और नीति समन्वय।
Q3. क्या क्षेत्रीय परिषद संवैधानिक निकाय है?
नहीं, यह सांविधिक निकाय है।
Q4. व्यापार की स्वतंत्रता किस भाग में वर्णित है?
भाग 13 (अनुच्छेद 301–307)।
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