भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यपाल (Governor) राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है और वह केंद्र तथा राज्य के बीच संवैधानिक कड़ी (Link) के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल की स्थिति औपचारिक होते हुए भी कई अवसरों पर अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, विशेषकर तब जब राज्य में संवैधानिक संकट, राष्ट्रपति शासन, या सरकार गठन से संबंधित प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, लेकिन वह राज्य के कार्यपालिका प्रमुख नहीं होते। वास्तविक कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित होती है। इसके बावजूद संविधान ने राज्यपाल को कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय और न्यायिक क्षेत्रों में अनेक शक्तियाँ प्रदान की हैं, जिनमें कुछ विवेकाधीन शक्तियाँ (Discretionary Powers) भी शामिल हैं।
- UPSC, State PCS और SSC जैसी परीक्षाओं में राज्यपाल से जुड़े प्रश्न अक्सर
नियुक्ति बनाम निर्वाचित पद,
विवेकाधीन शक्तियाँ,
राज्यपाल और मुख्यमंत्री के संबंध,
तथा संवैधानिक विवादों के संदर्भ में पूछे जाते हैं। - इसलिए परीक्षा दृष्टि से यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च स्कोरिंग माना जाता है।
I. नियुक्ति, कार्यकाल और अर्हताएँ
- संविधान के भाग 6 में राज्य सरकार का वर्णन है (अनुच्छेद 153 से 167)।
- राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) होता है।
- वह केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करता है।
- अनुच्छेद 153: प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।
- 7वें संविधान संशोधन (1956): एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है।
- नियुक्ति (अनुच्छेद 155): राज्यपाल की नियुक्ति सीधे राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- राज्यपाल का पद न तो प्रत्यक्ष चुनाव से भरा जाता है और न ही अप्रत्यक्ष चुनाव से।
- भारत ने राज्यपाल की नियुक्ति का कनाडाई मॉडल अपनाया है।
- अर्हताएँ: वह भारत का नागरिक हो।
- उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए।
- वह संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं होना चाहिए।
- वह किसी लाभ के पद (Office of Profit) पर नहीं होना चाहिए।
- परंपरा: राज्यपाल को सामान्यतः उस राज्य का निवासी नहीं होना चाहिए जहाँ उसे नियुक्त किया जा रहा है।
- परंपरा: नियुक्ति के समय राष्ट्रपति संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श करता है।
- कार्यकाल: पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष तक।
- वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the President) पद धारण करता है।
- राष्ट्रपति उसे किसी भी समय पद से हटा सकता है।
- संविधान में राज्यपाल को हटाने के किसी भी आधार का उल्लेख नहीं है।
- वह अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए देता है।
- शपथ: राज्यपाल को शपथ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं।
- राज्यपाल का वेतन राज्य की संचित निधि पर भारित होता है।
- जब एक राज्यपाल दो राज्यों का कार्यभार संभालता है, तो उसका वेतन दोनों राज्यों द्वारा साझा किया जाता है।
II. शक्तियाँ और कार्य
- राज्य के सभी कार्यकारी कार्य राज्यपाल के नाम पर किए जाते हैं।
- वह मुख्यमंत्री और उसकी सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
- छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा में राज्यपाल द्वारा एक जनजातीय कल्याण मंत्री की नियुक्ति अनिवार्य है।
- वह राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति करता है।
- वह राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करता है।
- वह राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करता है।
- विशेष तथ्य: SPSC के सदस्यों को राज्यपाल नियुक्त करता है, लेकिन उन्हें केवल राष्ट्रपति ही हटा सकता है।
- वह राष्ट्रपति से राज्य में संवैधानिक आपातकाल (Art 356) की सिफारिश कर सकता है।
- राज्यपाल राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति (Chancellor) होता है।
- वह विधानमंडल के सत्र को बुला सकता है और सत्रावसान कर सकता है।
- वह विधानसभा को भंग कर सकता है।
- वह विधान परिषद के 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है (साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता, समाज सेवा)।
- विधेयक पर वीटो: राज्यपाल विधेयक को सहमति दे सकता है, रोक सकता है या वापस भेज सकता है।
- अनुच्छेद 200: वह किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है।
- यदि कोई विधेयक उच्च न्यायालय की स्थिति को खतरे में डालता है, तो उसे सुरक्षित रखना अनिवार्य है।
- अनुच्छेद 213: जब विधानमंडल का सत्र न चल रहा हो, तो वह अध्यादेश जारी कर सकता है।
- वह बजट (वार्षिक वित्तीय विवरण) को विधानसभा के सामने रखवाता है।
- राज्य वित्त आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग की रिपोर्ट वह सदन के पटल पर रखता है।
- क्षमादान (अनुच्छेद 161): वह राज्य कानून के विरुद्ध अपराधों के लिए सजा को क्षमा, कम या स्थगित कर सकता है।
- राज्यपाल मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह क्षमा नहीं कर सकता (यह केवल राष्ट्रपति कर सकता है)।
III. विवेकाधीन शक्तियाँ और तुलना
- राष्ट्रपति के पास कोई संवैधानिक विवेकाधीन शक्ति नहीं है, लेकिन राज्यपाल के पास है।
- जब विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले, तो वह मुख्यमंत्री चुनने में विवेक का प्रयोग कर सकता है।
- राज्यपाल को कार्यकाल के दौरान किसी भी आपराधिक कार्यवाही से छूट प्राप्त है।
- उसे व्यक्तिगत कार्यों के लिए 2 महीने के नोटिस के बाद दीवानी मामला चलाया जा सकता है।
- राज्य सरकार का कोई भी मंत्री राज्यपाल को सलाह देने के अधिकार से इनकार नहीं कर सकता।
- सरोजिनी नायडू भारत की पहली महिला राज्यपाल थीं।
- राज्यपाल केंद्र और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी (Bridge) के रूप में कार्य करता है।
- राज्यपाल राज्य का मुखिया होने के साथ-साथ संघीय ढांचे का रक्षक भी है।
राष्ट्रपति बनाम राज्यपाल: तुलनात्मक विश्लेषण
| विशेषता / शक्ति | राष्ट्रपति (President) | राज्यपाल (Governor) |
| संवैधानिक स्थिति | संघ का संवैधानिक प्रमुख (अनुच्छेद 52)। | राज्य का संवैधानिक प्रमुख (अनुच्छेद 153)। |
| नियुक्ति | निर्वाचक मंडल द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव। | राष्ट्रपति द्वारा सीधे नियुक्त (मनोनीत)। |
| शपथ | भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) दिलाते हैं। | संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दिलाते हैं। |
| हटाने की प्रक्रिया | संविधान के उल्लंघन पर ‘महाभियोग’ (अनुच्छेद 61)। | राष्ट्रपति जब चाहें हटा सकते हैं (प्रसादपर्यंत)। |
| क्षमादान शक्ति | मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह क्षमा कर सकता है। | मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकता (केवल सजा कम या स्थगित)। |
| कोर्ट मार्शल | सैन्य अदालत की सजा को माफ कर सकता है। | सैन्य अदालत के मामलों में कोई शक्ति नहीं है। |
| विधेयक पर वीटो | धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए नहीं लौटा सकता। | धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए नहीं लौटा सकता। |
| विधेयक सुरक्षित रखना | लागू नहीं होता। | किसी विधेयक को ‘राष्ट्रपति’ के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है (अनुच्छेद 200)। |
| अध्यादेश शक्ति | अनुच्छेद 123 के तहत। | अनुच्छेद 213 के तहत। |
| कूटनीतिक शक्तियाँ | अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और समझौते राष्ट्रपति के नाम पर होते हैं। | कोई कूटनीतिक शक्ति प्राप्त नहीं है। |
| सैन्य शक्तियाँ | तीनों सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति होता है। | कोई सैन्य शक्ति प्राप्त नहीं है। |
| विवेकाधीन शक्ति | केवल ‘परिस्थितिजन्य’ विवेक (जैसे त्रिशंकु लोकसभा)। | ‘संवैधानिक’ और ‘परिस्थितिजन्य’ दोनों विवेक प्राप्त हैं। |
| सलाह की बाध्यता | 42वें और 44वें संशोधन के बाद कैबिनेट की सलाह मानना अनिवार्य है। | संविधान के अनुसार, सलाह मानने के लिए उस सीमा तक बाध्य नहीं है जहाँ उसे ‘विवेक’ का प्रयोग करना हो। |
प्रमुख निष्कर्ष (Key Notes):
- संवैधानिक विवेकाधिकार: राज्यपाल के पास राष्ट्रपति की तुलना में अधिक विवेकाधीन शक्तियाँ होती हैं क्योंकि वह केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में भी कार्य करता है।
- आपातकाल: राष्ट्रपति आपातकाल की घोषणा करता है, जबकि राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) की सिफारिश करता है।
- उच्च न्यायालय: राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति करता है, जबकि राज्यपाल से इस विषय में केवल परामर्श लिया जाता है।
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