वित्त आयोग (Finance Commission) – अनुच्छेद 280, संरचना, कार्य और भूमिका | Indian Polity Notes

वित्त आयोग भारतीय संविधान के अंतर्गत गठित एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय है, जिसका मुख्य उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है। भारत जैसे संघीय देश में जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच कार्यों एवं दायित्वों का स्पष्ट विभाजन है, वहाँ वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था की आवश्यकता होती है। इसी आवश्यकता की पूर्ति वित्त आयोग करता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत वित्त आयोग का गठन किया जाता है। यह आयोग राष्ट्रपति को इस बात पर सिफारिश करता है कि करों का केंद्र-राज्य वितरण (Vertical Devolution) कैसे हो, राज्यों के बीच संसाधनों का बँटवारा (Horizontal Devolution) किस आधार पर किया जाए तथा अनुदान (Grants-in-Aid) किस प्रकार दिए जाएँ। वित्त आयोग की सिफारिशें देश की राजकोषीय संघीय व्यवस्था (Fiscal Federalism) की रीढ़ मानी जाती हैं।

संवैधानिक आधार और विकास

  • अनुच्छेद 280: राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष (या उससे पहले) एक वित्त आयोग का गठन करता है।
  • आयोग की सिफारिशें राष्ट्रपति को दी जाती हैं और संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत होती हैं।
  • परंपरागत रूप से प्रत्येक आयोग पाँच वर्षों के लिए सिफारिशें देता है (जैसे 14वाँ, 15वाँ वित्त आयोग)।

📌 Exam Line:

Finance Commission institutionalises fiscal federalism through periodic, rule-based transfers.


2️⃣ संरचना (Composition)

वित्त आयोग में सामान्यतः शामिल होते हैं:

  • एक अध्यक्ष (Chairperson)
  • चार अन्य सदस्य

संविधान संरचना को लचीला रखता है; विस्तृत योग्यताएँ संसद द्वारा बनाए गए कानून (Finance Commission (Miscellaneous Provisions) Act) के अनुसार निर्धारित होती हैं। अध्यक्ष प्रायः सार्वजनिक वित्त/अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ होते हैं, जबकि सदस्यों में प्रशासनिक, विधिक और वित्तीय अनुभव शामिल किया जाता है।


3️⃣ नियुक्ति (Appointment) और कार्यकाल

  • नियुक्ति: राष्ट्रपति द्वारा
  • कार्यकाल: आयोग के संदर्भ-शर्तों (ToR) में निर्दिष्ट अवधि (आमतौर पर 5 वर्ष)
  • आयोग अस्थायी (Ad hoc) होता है—हर पाँच वर्ष में नया आयोग गठित होता है।

4️⃣ शक्तियाँ (Powers)

वित्त आयोग की शक्तियाँ मुख्यतः सलाहकारी हैं, किंतु व्यवहार में अत्यंत प्रभावशाली:

  • करों के बँटवारे पर सिफारिश
  • अनुदानों की प्रकृति/उद्देश्य तय करना
  • राजकोषीय अनुशासन से जुड़े उपाय सुझाना

👉 सिफारिशें कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं, परंतु परंपरा और संघीय संतुलन के कारण सरकारें प्रायः इन्हें स्वीकार करती हैं।


5️⃣ कार्य (Functions)

अनुच्छेद 280(3) के अनुसार वित्त आयोग के प्रमुख कार्य:

🔹 (1) करों का वितरण

  • Vertical Devolution: केंद्र–राज्य कर-हिस्सा (जैसे राज्यों को कर-पूल का प्रतिशत)
  • Horizontal Devolution: राज्यों के बीच वितरण—जनसंख्या, आय-दूरी, क्षेत्रफल, वन-आवरण, कर-प्रयास आदि मानदंडों पर

🔹 (2) अनुदान (Grants-in-Aid)

  • राजस्व घाटा अनुदान
  • स्थानीय निकाय अनुदान (पंचायत/नगरपालिका)
  • क्षेत्र-विशिष्ट/सुधार-प्रोत्साहन अनुदान

🔹 (3) राजकोषीय अनुशासन

  • वित्तीय उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और स्थिरता पर सुझाव

🔹 (4) स्थानीय निकाय वित्त

  • 73वें/74वें संशोधनों के बाद स्थानीय सरकारों के लिए अनुदान ढांचा

6️⃣ रिपोर्टें (Reports)

  • आयोग अपनी मुख्य रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है।
  • रिपोर्ट संसद में रखी जाती है; सरकार Action Taken Report (ATR) प्रस्तुत करती है।
  • रिपोर्टें डेटा-आधारित मानदंड, अनुमान और नीति-तर्क के साथ आती हैं—यही इनकी विश्वसनीयता है।

7️⃣ वित्त आयोग का महत्व (Significance)

  • संघीय संतुलन और एकता
  • क्षेत्रीय असमानताओं में कमी
  • नियम-आधारित, पूर्वानुमेय संसाधन हस्तांतरण
  • स्थानीय शासन को वित्तीय आधार

📌 Mains Line:

Finance Commission converts political bargaining into rule-based fiscal transfers.


8️⃣ प्रमुख मुद्दे और चुनौतियाँ (Issues & Challenges)

🔴 (1) केंद्र का बढ़ता कर-संकेंद्रण

  • सेस/सरचार्ज का बढ़ता उपयोग (जो साझा-पूल में नहीं आते)

🔴 (2) राज्यों की विविधता

  • एक-सा मानदंड सभी राज्यों पर समान प्रभाव नहीं डालता

🔴 (3) समयानुकूल डेटा

  • जनसंख्या/आर्थिक आँकड़ों की नवीनता पर विवाद

🔴 (4) कार्यक्षेत्र ओवरलैप

  • GST Council/NITI Aayog के साथ भूमिकाओं की सीमा-रेखा

9️⃣ सुधार और आगे की राह (Reforms & Way Forward)

  • साझा-पूल को मज़बूत करना; सेस/सरचार्ज की पारदर्शिता
  • मानदंडों में डायनेमिक वेटेज (उत्पादकता + समावेशन)
  • स्थानीय निकायों के लिए परिणाम-आधारित अनुदान
  • डेटा-गवर्नेंस और स्वतंत्र आकलन
  • केंद्र–राज्य संवाद को संस्थागत बनाना

🔚 निष्कर्ष

वित्त आयोग भारत की राजकोषीय संघीय व्यवस्था का संरक्षक है। इसकी नियम-आधारित सिफारिशें राजनीतिक मोल-भाव को सीमित कर न्यायसंगत, पारदर्शी और पूर्वानुमेय संसाधन हस्तांतरण सुनिश्चित करती हैं। बदलते कर-ढाँचे (GST), बढ़ते सेस और विकास-असमानताओं के बीच आयोग की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। UPSC/PCS परीक्षाओं में यह अध्याय संवैधानिक + विश्लेषणात्मक दृष्टि से अत्यंत स्कोरिंग है।


📊 Comparison Tables

A) Finance Commission vs GST Council

आधारवित्त आयोगGST परिषद
संवैधानिक आधारअनुच्छेद 280अनुच्छेद 279A
प्रकृतिसलाहकारी (Ad hoc)स्थायी संघीय निकाय
फोकसकर-हस्तांतरण, अनुदानGST दरें, कानून, प्रक्रियाएँ
अध्यक्षताविशेषज्ञ अध्यक्षकेंद्रीय वित्त मंत्री
परिणामDevolution/GrantsTax harmonisation

B) Finance Commission vs NITI Aayog

आधारवित्त आयोगNITI Aayog
संवैधानिक दर्जासंवैधानिकगैर-संवैधानिक
भूमिकासंसाधन वितरणनीति-निर्माण/रणनीति
प्रकृतिनियम-आधारितसहयोगात्मक/थिंक-टैंक
रिपोर्टराष्ट्रपति/संसदसरकार को सिफारिशें

📌 Prelims Tip:

Finance Commission ≠ GST Council ≠ NITI Aayog (different articles & mandates)

PYQ-Based

I. गठन और संरचना

  1. वित्त आयोग एक अर्द्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) और संवैधानिक निकाय है।
  2. संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत वित्त आयोग के गठन का प्रावधान है।
  3. इसका गठन हर 5 वर्ष में या उससे पहले राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
  4. आयोग में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं।
  5. इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और इनका कार्यकाल राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार होता है।
  6. सदस्यों की पुनर्नियुक्ति (Re-appointment) की जा सकती है।
  7. योग्यता: संविधान ने संसद को सदस्यों की योग्यता निर्धारित करने की शक्ति दी है।
  8. अध्यक्ष: वह व्यक्ति होना चाहिए जिसे ‘सार्वजनिक मामलों’ (Public Affairs) का अनुभव हो।
  9. अन्य सदस्य: (1) हाई कोर्ट का जज या उसके योग्य व्यक्ति, (2) सरकार के वित्त और खातों का विशेषज्ञ, (3) प्रशासन और वित्तीय मामलों का अनुभवी, और (4) अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञाता।

II. कार्य और भूमिका

  1. मुख्य कार्य: केंद्र और राज्यों के बीच करों (Taxes) के शुद्ध आगमों का वितरण करना।
  2. राज्यों के बीच करों के हिस्से का आवंटन करना।
  3. भारत की संचित निधि से राज्यों को दिए जाने वाले सहायता अनुदान (Grants-in-aid) के सिद्धांत तय करना।
  4. राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर पंचायतों और नगर पालिकाओं के संसाधनों के लिए राज्य की संचित निधि को बढ़ाने के उपाय सुझाना।
  5. राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए किसी अन्य वित्तीय मामले पर सलाह देना।
  6. 1960 तक, यह असम, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल को जूट निर्यात शुल्क के बदले अनुदान पर भी सलाह देता था।
  7. रिपोर्ट: वित्त आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है।
  8. राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखवाता है।
  9. इसके साथ ‘स्पष्टीकरण ज्ञापन’ भी होता है कि सिफारिशों पर क्या कार्रवाई की गई।

III. शक्तियाँ और महत्वपूर्ण तथ्य

  1. वित्त आयोग की सिफारिशें केवल सलाहकारी (Advisory) प्रकृति की होती हैं।
  2. सरकार इन सिफारिशों को मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।
  3. डॉ. पी.वी. राजमन्नार के अनुसार, “चूंकि वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है, इसलिए इसकी सिफारिशों को सरकार द्वारा टाला नहीं जाना चाहिए।”
  4. प्रथम वित्त आयोग: इसका गठन 1951 में हुआ था और इसके अध्यक्ष के.सी. नियोगी थे।
  5. 15वें वित्त आयोग: इसके अध्यक्ष एन.के. सिंह हैं।
  6. वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच ‘राजकोषीय अंतर’ को कम करने का प्रयास करता है।
  7. संविधान के अनुसार, वित्त आयोग भारत में राजकोषीय संघवाद का संतुलन चक्र है।
  8. योजना आयोग (अब नीति आयोग) के आने से वित्त आयोग की भूमिका कुछ हद तक प्रभावित हुई थी, लेकिन इसका संवैधानिक महत्व बना हुआ है।

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