भारत छोड़ो आंदोलन और आज़ाद हिंद फ़ौज (1942–1945)

1940 के दशक तक यह स्पष्ट हो चुका था कि ब्रिटिश शासन नैतिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं रहा।
द्वितीय विश्व युद्ध, औपनिवेशिक दमन और संवैधानिक टालमटोल के बीच भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन अपने अंतिम और निर्णायक चरण में प्रवेश करता है।

एक ओर महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन (1942) ने देश के भीतर जन-विद्रोह को जन्म दिया, वहीं दूसरी ओर सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज (INA) ने सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से स्वतंत्रता का प्रयास किया।

📌 यह चरण दर्शाता है कि
👉 अहिंसक जन-आंदोलन और सशस्त्र प्रयास—दोनों ने मिलकर स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।


भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement – 1942)

पृष्ठभूमि

  • द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को जबरन झोंकना
  • क्रिप्स मिशन (1942) की असफलता
  • बढ़ता आर्थिक संकट और दमन
  • तत्काल स्वतंत्रता की माँग

📌 गांधीजी का निष्कर्ष:
👉 अब “करो या मरो” का समय है।


घोषणा

  • तिथि: 8 अगस्त 1942
  • स्थान: बंबई (ग्वालिया टैंक)
  • नेतृत्व: महात्मा गांधी

नारा

“करो या मरो” (Do or Die)


आंदोलन का स्वरूप

नेतृत्वविहीन जन-आंदोलन

  • शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी
  • स्वतःस्फूर्त जन-उभार

गतिविधियाँ

  • रेलवे लाइनों का बाधन
  • डाक-तार व्यवस्था ठप
  • समानांतर सरकारें

📌 प्रमुख उदाहरण:

  • बलिया (UP)
  • तामलुक (बंगाल)
  • सतारा (महाराष्ट्र)

सरकारी दमन

  • मार्शल लॉ जैसे हालात
  • हवाई हमले
  • व्यापक गिरफ्तारियाँ

📌 भारत छोड़ो आंदोलन
👉 ब्रिटिश शासन के लिए सबसे बड़ा आंतरिक संकट बना।


आंदोलन का महत्व

  • ब्रिटिश प्रशासन की जड़ें हिलीं
  • स्वतंत्रता अब अपरिवर्तनीय मांग बनी
  • जनता का पूर्ण राजनीतिकरण

आज़ाद हिंद फ़ौज (Azad Hind Fauj – INA)

पृष्ठभूमि

  • सविनय अवज्ञा की सीमाएँ
  • विदेशी सहयोग से सशस्त्र संघर्ष का विचार
  • जापान की एशियाई विजय

सुभाष चंद्र बोस और INA

नेतृत्व

  • सुभाष चंद्र बोस

गठन

  • 1943, सिंगापुर
  • सरकार: आज़ाद हिंद सरकार

नारे

  • “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”
  • “दिल्ली चलो”

INA की संरचना और अभियान

विशेषताएँ

  • महिला रेजिमेंट: झांसी की रानी रेजिमेंट
  • सैनिक: भारतीय युद्धबंदी और प्रवासी

सैन्य अभियान

  • इंफाल और कोहिमा की ओर बढ़त
  • जापानी सहयोग

📌 सैन्य दृष्टि से असफल,
पर राजनीतिक-मनोवैज्ञानिक प्रभाव अत्यंत गहरा


INA ट्रायल (1945)

घटना

  • लाल क़िला, दिल्ली
  • तीन अधिकारी—शाहनवाज़, सहगल, ढिल्लों

प्रभाव

  • देशव्यापी जन-आक्रोश
  • सेना और नौसेना में असंतोष
  • रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (1946) की पृष्ठभूमि

📌 ब्रिटिश सरकार समझ गई कि
👉 भारतीय सेना अब भरोसेमंद नहीं रही।


भारत छोड़ो आंदोलन और INA : तुलनात्मक दृष्टि

बिंदुभारत छोड़ो आंदोलनआज़ाद हिंद फ़ौज
नेतृत्वगांधीसुभाष बोस
स्वरूपअहिंसक जन-विद्रोहसशस्त्र संघर्ष
क्षेत्रभारत के भीतरभारत के बाहर
परिणामप्रशासनिक संकटसैन्य-मनोवैज्ञानिक प्रभाव

📌 दोनों ने मिलकर
👉 ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।


ऐतिहासिक महत्व

राष्ट्रीय आंदोलन के लिए

  • स्वतंत्रता की अपरिवर्तनीयता
  • जनता और सेना—दोनों का समर्थन

ब्रिटिश नीति पर प्रभाव

  • सत्ता हस्तांतरण की अनिवार्यता
  • तेज़ी से संवैधानिक प्रक्रिया

📌 1942–45 के बाद
👉 ब्रिटिश वापसी केवल समय की बात रह गई।


परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

✔ भारत छोड़ो आंदोलन – 1942
✔ नारा – करो या मरो
✔ INA गठन – 1943
✔ आज़ाद हिंद सरकार – सिंगापुर
✔ INA ट्रायल – 1945


निष्कर्ष (Conclusion)

भारत छोड़ो आंदोलन और आज़ाद हिंद फ़ौज
👉 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की निर्णायक पराकाष्ठा थे।

जहाँ भारत छोड़ो आंदोलन ने

  • ब्रिटिश शासन को भीतर से तोड़ा,
    वहीं INA ने
  • सेना की निष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।

“अहिंसा और शौर्य—दोनों ने मिलकर भारत को आज़ाद कराया।”


FAQs (Frequently Asked Questions)

Q1. भारत छोड़ो आंदोलन कब शुरू हुआ?

8 अगस्त 1942।

Q2. ‘करो या मरो’ का क्या अर्थ था?

अंतिम संघर्ष का आह्वान।

Q3. INA का गठन किसने किया?

सुभाष चंद्र बोस ने।

Q4. INA सैन्य रूप से क्यों असफल रही?

जापानी पराजय और संसाधनों की कमी के कारण।

Q5. इस चरण का सबसे बड़ा योगदान क्या था?

ब्रिटिश शासन के अंत की अनिवार्यता।

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