भारतीय संविधान में निहित पंचायती राज व्यवस्था (Panchayati Raj System) भारत में स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) की आधारशिला है। इसका उद्देश्य लोकतंत्र को केवल राष्ट्रीय और राज्य स्तर तक सीमित न रखते हुए ग्राम स्तर तक सशक्त बनाना है। पंचायती राज के माध्यम से ग्रामीण जनता को प्रशासन और विकास प्रक्रिया में प्रत्यक्ष भागीदारी का अवसर मिलता है।
पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा प्रदान किया गया, जिसके तहत संविधान में भाग IX (अनुच्छेद 243 से 243O) और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई। इस संशोधन ने ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के रूप में त्रि-स्तरीय ढांचा, नियमित चुनाव, आरक्षण, वित्त आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान सुनिश्चित किए। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण (Democratic Decentralisation) को मजबूत करना है।
UPSC, State PCS और SSC जैसी परीक्षाओं में पंचायती राज से जुड़े प्रश्न प्रायः
- 73वाँ संविधान संशोधन,
त्रि-स्तरीय संरचना,
11वीं अनुसूची के विषय,
आरक्षण और वित्तीय प्रावधान,
तथा स्थानीय स्वशासन की चुनौतियाँ - के संदर्भ में पूछे जाते हैं। इसलिए परीक्षा दृष्टि से यह अध्याय तथ्यात्मक, अवधारणात्मक और अत्यंत स्कोरिंग माना जाता है।
I. ऐतिहासिक विकास और समितियाँ
- पंचायती राज का अर्थ है—’ग्रामीण स्थानीय स्वशासन’।
- भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक लॉर्ड रिपन (1882) को माना जाता है।
- अनुच्छेद 40 (DPSP): राज्य को ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश देता है।
- बलवंत राय मेहता समिति (1957): इसने ‘लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण’ की सिफारिश की।
- मेहता समिति ने त्रि-स्तरीय (Three-tier) पंचायती राज व्यवस्था का सुझाव दिया।
- त्रि-स्तरीय ढांचा: ग्राम स्तर (पंचायत), ब्लॉक स्तर (समिति) और जिला स्तर (परिषद)।
- भारत में पंचायती राज का उद्घाटन 2 अक्टूबर 1959 को हुआ।
- जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले में इसका उद्घाटन किया।
- राजस्थान के बाद आंध्र प्रदेश पंचायती राज अपनाने वाला दूसरा राज्य बना।
- अशोक मेहता समिति (1977): इसने द्वि-स्तरीय व्यवस्था (मंडल पंचायत और जिला परिषद) का सुझाव दिया।
- जी.वी.के. राव समिति (1985): इसने पंचायतों को ‘बिना जड़ की घास’ कहा और जिला परिषद को सशक्त बनाने पर जोर दिया।
- एल.एम. सिंघवी समिति (1986): इसने पहली बार पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने की सिफारिश की।
- थुंगन समिति (1988): इसने भी संवैधानिक मान्यता और 5 वर्ष के कार्यकाल की वकालत की।
- गॉडगिल समिति (1988): इसी समिति की सिफारिशों के आधार पर 73वें संशोधन का मसौदा तैयार हुआ।
II. 73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
- इस संशोधन द्वारा संविधान में एक नया भाग 9 जोड़ा गया।
- भाग 9 का शीर्षक ‘पंचायतें’ रखा गया।
- इसके द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।
- 11वीं अनुसूची में पंचायतों के कार्य के लिए 29 विषय दिए गए हैं।
- इस अधिनियम ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
- यह अधिनियम 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ, इसीलिए 24 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ मनाया जाता है।
- ग्राम सभा: यह पंचायती राज व्यवस्था का आधार है, जिसमें गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता सदस्य होते हैं।
- अधिनियम अनिवार्य रूप से त्रि-स्तरीय ढांचा (ग्राम, मध्यवर्ती, जिला) लागू करता है।
- अपवाद: जिस राज्य की जनसंख्या 20 लाख से कम है, वहाँ मध्यवर्ती स्तर (ब्लॉक) की आवश्यकता नहीं है।
- पंचायतों के सभी सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है।
- मध्यवर्ती और जिला स्तर के अध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों द्वारा होता है।
- आरक्षण (Art 243D): SC और ST को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित हैं।
- महिलाओं के लिए कुल सीटों का कम से कम एक-तिहाई (1/3) आरक्षण अनिवार्य है।
- पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित है।
- पंचायत भंग होने की स्थिति में 6 महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।
- चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए।
III. महत्वपूर्ण अनुच्छेद और निकाय
- राज्य निर्वाचन आयोग (Art 243K): पंचायतों के चुनावों के संचालन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार।
- राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति राज्यपाल करता है।
- राज्य वित्त आयोग (Art 243I): राज्यपाल प्रत्येक 5 वर्ष में पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए इसका गठन करता है।
- PESA अधिनियम (1996): पंचायतों के प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों (5वीं अनुसूची) में विस्तारित करने के लिए।
- PESA को ‘लघु संविधान’ (पंचायत स्तर पर) भी कहा जाता है, जो ग्राम सभा को विशेष शक्तियाँ देता है।
- अनुच्छेद 243A: ग्राम सभा की शक्तियों का वर्णन करता है।
- अनुच्छेद 243G: पंचायतों की शक्तियों, अधिकार और उत्तरदायित्व का वर्णन करता है।
- पंचायतों को कर (Tax) लगाने और धन एकत्रित करने की शक्ति राज्य विधानमंडल द्वारा दी जाती है।
- ऑडिटिंग: राज्य विधानमंडल पंचायतों के खातों की जाँच के लिए नियम बना सकता है।
- पंचायती राज ने भारत में ‘सत्ता के विकेंद्रीकरण’ के सपने को साकार किया है।
❓ Frequently Asked Questions (FAQs)
1. पंचायती राज (Panchayati Raj) क्या है?
पंचायती राज भारत में स्थानीय स्वशासन की त्रि-स्तरीय व्यवस्था है, जिसके माध्यम से ग्राम स्तर पर लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को लागू किया जाता है।
2. पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा कब और कैसे मिला?
पंचायती राज को 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संवैधानिक दर्जा मिला, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ।
3. पंचायती राज से संबंधित संवैधानिक प्रावधान कहाँ दिए गए हैं?
पंचायती राज से संबंधित प्रावधान भाग IX (अनुच्छेद 243 से 243O) में दिए गए हैं।
4. पंचायती राज की त्रि-स्तरीय संरचना कौन-सी है?
पंचायती राज की त्रि-स्तरीय संरचना है:
- ग्राम पंचायत
- पंचायत समिति (ब्लॉक स्तर)
- जिला परिषद
5. ग्राम सभा (Gram Sabha) क्या है?
ग्राम सभा गांव के सभी मतदाताओं की सभा होती है और यह पंचायती राज व्यवस्था की आधारशिला मानी जाती है।
6. पंचायती राज में आरक्षण का प्रावधान कैसे किया गया है?
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण किया गया है, जिसमें महिलाओं के लिए कम से कम 33% आरक्षण अनिवार्य है।
7. 11वीं अनुसूची का पंचायती राज में क्या महत्व है?
11वीं अनुसूची में 29 विषय शामिल हैं, जिन्हें पंचायतों को सौंपा जा सकता है।
8. पंचायतों के चुनाव कौन कराता है?
पंचायतों के चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission) द्वारा कराए जाते हैं।
9. पंचायतों का कार्यकाल कितना होता है?
पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
10. राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) की क्या भूमिका है?
राज्य वित्त आयोग पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है और संसाधनों के वितरण की सिफारिश करता है।
11. क्या सभी राज्यों में त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था अनिवार्य है?
नहीं, 20 लाख से कम जनसंख्या वाले राज्यों में द्वि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था का प्रावधान है।
12. पंचायती राज व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, स्थानीय विकास और जनभागीदारी को बढ़ावा देना है।
13. पंचायती राज प्रणाली की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?
प्रमुख समस्याएँ हैं:
- वित्तीय संसाधनों की कमी
- प्रशासनिक नियंत्रण
- क्षमता की कमी
- राजनीतिक हस्तक्षेप
14. पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकायों में क्या अंतर है?
पंचायती राज ग्रामीण क्षेत्रों के लिए है, जबकि शहरी स्थानीय निकाय शहरी क्षेत्रों में कार्य करते हैं।
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