न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका (PIL)

भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को केवल विवाद निपटाने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान का संरक्षक (Guardian of the Constitution) बनाया है। विधायिका और कार्यपालिका पर नियंत्रण रखने के लिए न्यायपालिका को कई शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इन्हीं शक्तियों और भूमिकाओं को समझने के लिए न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका (PIL) तीन अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं।

ये तीनों विषय आपस में जुड़े हुए हैं, लेकिन स्वरूप, उद्देश्य और कार्य-क्षेत्र में भिन्न हैं। परीक्षाओं में अक्सर इनसे जुड़े प्रत्यक्ष प्रश्न, कथन आधारित MCQs और तुलनात्मक उत्तर पूछे जाते हैं।


1️⃣ न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)

न्यायिक समीक्षा वह शक्ति है जिसके अंतर्गत न्यायपालिका यह जाँच करती है कि:

  • विधायिका द्वारा बनाया गया कानून
  • कार्यपालिका द्वारा किया गया कोई कार्य

संविधान के अनुरूप है या नहीं।
यदि कोई कानून या कार्य संविधान का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है।

अनुच्छेद 137 के अंतर्गत:

  • यह शक्ति:
    • न्यायिक त्रुटियों को सुधारने
    • न्याय की पूर्णता सुनिश्चित करने
  • के लिए प्रयोग की जाती है।

🔹 I. R. Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य मामला (2007)

  • इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
    • नौवीं अनुसूची (9th Schedule) में डाले गए कानून भी
    • Basic Structure Doctrine की कसौटी पर परखे जा सकते हैं।

👉 इसका अर्थ:

  • संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है
  • न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न हिस्सा है

📌 Exam Fact:

👉Judicial Review itself is part of the Basic Structure of the Constitution.

👉 Review Power of Supreme Court = Article 137


🔹 संवैधानिक आधार

भारत में न्यायिक समीक्षा स्पष्ट रूप से संविधान में लिखी गई है। इसके प्रमुख अनुच्छेद हैं:

  • अनुच्छेद 13 – मूल अधिकारों के विरुद्ध कानून शून्य
  • अनुच्छेद 32 – सर्वोच्च न्यायालय में मूल अधिकारों की रक्षा
  • अनुच्छेद 226 – उच्च न्यायालयों की रिट शक्ति
  • अनुच्छेद 131–136 – न्यायिक अधिकार क्षेत्र

📌 इसलिए भारत में न्यायिक समीक्षा को संवैधानिक शक्ति माना जाता है।


🔹 भारतीय मॉडल बनाम अमेरिकी मॉडल

  • अमेरिका में न्यायिक समीक्षा न्यायिक व्याख्या से विकसित हुई
  • भारत में यह सीधे संविधान में निहित है

👉 भारतीय मॉडल अधिक व्यापक है।


🔹 क्षेत्र (Scope)

न्यायिक समीक्षा निम्न पर लागू होती है:

  • कानूनों की वैधता
  • कार्यपालिका के आदेश
  • संवैधानिक संशोधन (सीमित रूप में)

📌 ऐतिहासिक केस: केशवानंद भारती मामला (1973) – इसमें न्यायिक समीक्षा को संविधान का ‘मूल ढांचा’ घोषित किया गया।


🔹 सीमाएँ

  • नीति निर्माण में हस्तक्षेप नहीं
  • राजनीतिक प्रश्नों से दूरी
  • संसद की सर्वोच्चता का सम्मान

2️⃣ न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)

न्यायिक सक्रियता का अर्थ है:

जब न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या तक सीमित न रहकर
सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और सुशासन सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाती है।

यह कोई संवैधानिक अनुच्छेद नहीं, बल्कि न्यायपालिका का दृष्टिकोण (Approach) है।


🔹 भारत में उद्भव

  • भारत में न्यायिक सक्रियता के विकास में जस्टिस पी. एन. भगवती की भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है। उन्होंने न्यायपालिका को केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था न मानकर, उसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया।
  • जस्टिस भगवती ने ही लॉक्स स्टैंडी (Locus Standi) की पारंपरिक अवधारणा को शिथिल कर जनहित याचिका (PIL) को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि न्याय केवल संपन्न वर्ग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गरीब, शोषित और वंचित वर्गों तक पहुँचना चाहिए।
  • इसी दृष्टिकोण के कारण जस्टिस पी. एन. भगवती को भारत में न्यायिक सक्रियता और PIL आंदोलन का जनक माना जाता है।

भारत में न्यायिक सक्रियता विशेष रूप से:

  • 1970 के दशक के बाद
  • आपातकाल के अनुभव के पश्चात

तेजी से विकसित हुई।


🔹 प्रमुख कारण

  • कमजोर वर्गों तक न्याय की पहुँच
  • विधायिका और कार्यपालिका की निष्क्रियता
  • मानवाधिकार उल्लंघन

🔹 सकारात्मक भूमिका

  • पर्यावरण संरक्षण
  • मौलिक अधिकारों का विस्तार
  • प्रशासनिक जवाबदेही
  • सामाजिक न्याय

📌 कई बार न्यायपालिका ने नीति-निर्देशक सिद्धांतों को मौलिक अधिकारों से जोड़ा

🔹 अनुच्छेद 137 और पुनरावलोकन शक्ति

  • अनुच्छेद 137 के अंतर्गत:
    • सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही निर्णयों की पुनरावलोकन (Review) की शक्ति प्राप्त है।
  • यह शक्ति:
    • न्यायिक त्रुटियों को सुधारने
    • न्याय की पूर्णता सुनिश्चित करने

के लिए प्रयोग की जाती है।


🔹 I. R. Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य मामला (2007)

  • इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
    • नौवीं अनुसूची (9th Schedule) में डाले गए कानून भी
    • Basic Structure Doctrine की कसौटी पर परखे जा सकते हैं।

👉 इसका अर्थ:

  • संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं है
  • न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न हिस्सा है

📌 High Value Mains Line:

Judicial Review itself is part of the Basic Structure of the Constitution.


🔹 आलोचना (Judicial Overreach)

न्यायिक सक्रियता की सबसे बड़ी आलोचना है:

  • न्यायपालिका का नीति क्षेत्र में प्रवेश
  • शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन
  • “Judges making law”

👉 इसलिए Judicial Activism और Judicial Overreach में संतुलन आवश्यक है।


3️⃣ जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL)

जनहित याचिका वह प्रक्रिया है जिसमें:

  • कोई भी व्यक्ति
  • किसी सामाजिक संगठन की ओर से

सार्वजनिक हित में न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है, भले ही वह स्वयं पीड़ित न हो।


🔹 PIL की विशेषता

  • Locus Standi में शिथिलता
  • गरीब, वंचित और कमजोर वर्गों को न्याय
  • सरल प्रक्रिया

📌 PIL न्यायपालिका को सामाजिक न्याय का उपकरण बनाती है।


🔹 कौन दायर कर सकता है?

  • कोई भी नागरिक
  • सामाजिक संगठन
  • कभी-कभी पत्र या पोस्टकार्ड के माध्यम से भी

🔹 दायरा

  • मानवाधिकार
  • पर्यावरण
  • श्रमिक अधिकार
  • जेल सुधार
  • महिला एवं बाल अधिकार

🔹 PIL से जुड़े महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

🔸 हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य मामला

  • यह भारत का पहला प्रमुख PIL मामला माना जाता है।
  • इस केस में:
    • विचाराधीन कैदियों को वर्षों तक बिना मुकदमे जेल में रखा गया था।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन माना।
  • यहीं से Speedy Trial को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता मिली।

📌 Exam Trap:
👉 Speedy Trial = Article 21 = Hussainara Khatoon Case


🔸 एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले

  • यह केस पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी PILs की आधारशिला है।
  • इस मामले में न्यायालय ने:
    • Polluter Pays Principle
    • Absolute Liability
    • पर्यावरण को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना

📌 Exam Line:

M. C. Mehta cases expanded the scope of Article 21 by including the right to a clean environment.

🔹PIL का दुरुपयोग

आज PIL के दुरुपयोग की समस्या भी सामने आई है:

  • प्रचार के लिए याचिकाएँ
  • राजनीतिक हित
  • व्यक्तिगत लाभ

👉 न्यायालयों ने Frivolous PIL पर जुर्माना भी लगाया है।


4️⃣ तीनों के बीच संबंध (Inter-relationship)

तत्वभूमिका
न्यायिक समीक्षासंवैधानिक शक्ति
न्यायिक सक्रियतान्यायपालिका का दृष्टिकोण
PILन्याय तक पहुँच का साधन
  • PIL → माध्यम
  • Judicial Activism → तरीका
  • Judicial Review → शक्ति

👉 तीनों मिलकर न्यायपालिका को लोकतंत्र का संरक्षक स्तंभ बनाते हैं।


निष्कर्ष

न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका भारतीय लोकतंत्र की संविधानिक आत्मा को जीवंत बनाती हैं। न्यायपालिका की यह भूमिका तभी प्रभावी रहती है जब संवैधानिक मर्यादा और संस्थागत संतुलन बनाए रखा जाए।
परीक्षा दृष्टि से यह अध्याय कम शब्दों में गहराई वाले उत्तर लिखने में अत्यंत सहायक है।

❓ Frequently Asked Questions (FAQs)

1. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) क्या है?

न्यायिक समीक्षा वह शक्ति है जिसके अंतर्गत न्यायपालिका यह जाँच करती है कि विधायिका या कार्यपालिका का कोई कार्य संविधान के अनुरूप है या नहीं, और असंवैधानिक पाए जाने पर उसे निरस्त कर सकती है।


2. भारतीय संविधान में न्यायिक समीक्षा का संवैधानिक आधार क्या है?

न्यायिक समीक्षा का आधार मुख्यतः अनुच्छेद 13, 32, 226, 131–136 और 137 में निहित है, जो न्यायपालिका को कानूनों और कार्यों की संवैधानिकता जाँचने की शक्ति देते हैं।


3. अनुच्छेद 137 का संबंध न्यायिक समीक्षा से कैसे है?

अनुच्छेद 137 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही निर्णयों की पुनरावलोकन (Review) की शक्ति प्राप्त है, जो न्यायिक समीक्षा का एक महत्वपूर्ण आयाम है।


4. I. R. Coelho मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

I. R. Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नौवीं अनुसूची में शामिल कानून भी Basic Structure Doctrine के अधीन न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएँगे


5. न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) से क्या तात्पर्य है?

न्यायिक सक्रियता वह दृष्टिकोण है जिसमें न्यायपालिका सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और सुशासन सुनिश्चित करने के लिए कानून की विस्तृत और प्रगतिशील व्याख्या करती है।


6. भारत में न्यायिक सक्रियता के प्रमुख प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?

जस्टिस पी. एन. भगवती को भारत में न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका (PIL) आंदोलन का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है।


7. जनहित याचिका (PIL) क्या है?

जनहित याचिका वह प्रक्रिया है जिसमें कोई भी नागरिक या संगठन सार्वजनिक हित में, भले ही वह स्वयं पीड़ित न हो, न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है।


8. भारत की पहली प्रमुख PIL कौन-सी थी?

हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य मामला भारत की पहली प्रमुख PIL माना जाता है, जिसमें Speedy Trial को अनुच्छेद 21 का हिस्सा घोषित किया गया।


9. M. C. Mehta मामलों का PIL में क्या महत्व है?

M. C. Mehta बनाम भारत संघ मामलों ने पर्यावरण संरक्षण को मजबूत किया और स्वच्छ पर्यावरण को जीवन के अधिकार (Article 21) का हिस्सा माना।


10. न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और PIL में क्या अंतर है?

  • न्यायिक समीक्षा → संवैधानिक शक्ति
  • न्यायिक सक्रियता → न्यायपालिका का दृष्टिकोण
  • PIL → न्याय तक पहुँच का साधन
    तीनों मिलकर न्यायपालिका को लोकतंत्र का संरक्षक बनाते हैं।

क्या आप इन नोट्स को ऑफलाइन पढ़ना चाहते हैं?

📄 डाउनलोड करें (Click here)

(“ऐसे ही और शानदार PDF नोट्स के लिए हमारे टेलीग्राम चैनल से अभी जुड़ें!”)