न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका (PIL)

भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को केवल विवाद निपटाने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान का संरक्षक (Guardian of the Constitution) बनाया है। विधायिका और कार्यपालिका पर नियंत्रण रखने के लिए न्यायपालिका को कई शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इन्हीं शक्तियों और भूमिकाओं को समझने के लिए न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका (PIL) तीन अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणाएँ हैं।

ये तीनों विषय आपस में जुड़े हुए हैं, लेकिन स्वरूप, उद्देश्य और कार्य-क्षेत्र में भिन्न हैं। परीक्षाओं में अक्सर इनसे जुड़े प्रत्यक्ष प्रश्न, कथन आधारित MCQs और तुलनात्मक उत्तर पूछे जाते हैं।

न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका (PIL)
न्यायपालिका के सक्रिय स्तंभ विधि का शासन न्यायिक समीक्षा (शक्ति) संवैधानिक वैधता की जाँच (अनुच्छेद 13, 32, 226) जनहित याचिका (साधन) न्याय तक सबकी सुलभ पहुँच (Locus Standi में ढील) न्यायिक सक्रियता (दर्शन) अधिकारों का व्यापक विस्तार (सामाजिक परिवर्तन का मार्ग) Constitutional Framework | pdfnotes.in | vikas singh

न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): अर्थ और आधार

न्यायिक समीक्षा न्यायपालिका की वह शक्ति है जिसके माध्यम से वह विधायी अधिनियमों (Laws) और कार्यपालिका के आदेशों की संवैधानिक वैधता की जाँच करती है। यदि कोई कानून संविधान का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय उसे ‘शून्य’ (Void) घोषित कर सकता है।

न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) भारतीय संविधान न्यायपालिका (SC/HC) “वैधता की जाँच करना” विधायिका (कानून निर्माण) कार्यपालिका (आदेश लागू करना) न्यायिक समीक्षा का प्रभाव असंवैधानिक कानून = शून्य (Void) Constitutional Shield | pdfnotes.in | vikas singh

संवैधानिक आधार (Constitutional Basis)

यद्यपि “न्यायिक समीक्षा” शब्द का प्रयोग संविधान में कहीं भी स्पष्ट रूप से नहीं किया गया है, लेकिन कई अनुच्छेद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यह शक्ति प्रदान करते हैं:

  • अनुच्छेद 13: मूल अधिकारों से असंगत या उनका अनादर करने वाले कानून शून्य होंगे।
  • अनुच्छेद 32 और 226: क्रमशः उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने और मूल अधिकारों की रक्षा करने की शक्ति।
  • अनुच्छेद 131-136: केंद्र-राज्य विवादों और अपीलीय मामलों में न्यायालय की व्याख्या शक्ति।
  • अनुच्छेद 245 और 246: केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का विभाजन।

न्यायिक समीक्षा का महत्व

  1. संविधान की सर्वोच्चता: यह सुनिश्चित करना कि संविधान देश का सर्वोच्च कानून बना रहे।
  2. संघीय संतुलन: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के बँवारे में होने वाले विवादों को सुलझाना।
  3. मूल अधिकारों की रक्षा: नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कार्यपालिका के मनमाने फैसलों से बचाना।

ऐतिहासिक निर्णय और ‘मूल ढांचा’ सिद्धांत

न्यायिक समीक्षा की शक्ति को समय-समय पर विभिन्न ऐतिहासिक मामलों में मजबूत किया गया है:

  • केशवानंद भारती मामला (1973): उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि संसद की संविधान संशोधन की शक्ति असीमित नहीं है। न्यायिक समीक्षा को संविधान का ‘मूल ढांचा’ (Basic Structure) घोषित किया गया।
  • मिनर्वा मिल्स मामला (1980): न्यायालय ने पुनः दोहराया कि न्यायिक समीक्षा संविधान की आधारभूत विशेषता है और इसे छीना नहीं जा सकता।
  • I.R. कोएल्हो मामला (2007): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 9वीं अनुसूची में शामिल कानून भी अब न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं हैं (यदि वे मूल ढांचे का उल्लंघन करते हैं)।

💡‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

अमेरिका में ‘विधि की उचित प्रक्रिया’ (Due Process of Law) है, जबकि भारत में ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ (Procedure Established by Law) अपनाई जाती है। हालांकि, ‘मेनका गांधी केस (1978)‘ के बाद भारत में भी न्यायिक समीक्षा का दायरा अमेरिकी मॉडल के काफी करीब पहुँच गया है।”

न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism): अवधारणा और उद्भव

न्यायिक सक्रियता का अर्थ है न्यायपालिका द्वारा देश के नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण और समाज में न्याय सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय भूमिका निभाना। इसमें न्यायालय कार्यपालिका और विधायिका को उनके संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए निर्देश देता है।

भारत में उद्भव और विकास

  • मुख्य श्रेय: भारत में इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय जस्टिस पी.एन. भगवती और जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर को जाता है।
  • समय: 1970 के दशक के उत्तरार्ध में, विशेषकर आपातकाल के बाद, न्यायपालिका ने अपनी भूमिका को अधिक मानवीय और सक्रिय बनाया।
  • दर्शन: “न्याय केवल प्रक्रियात्मक (Procedural) नहीं, बल्कि वास्तविक और सामाजिक होना चाहिए।”

न्यायिक सक्रियता के प्रमुख कारण

  • विधायिका और कार्यपालिका की विफलता: जब सरकार अपने कर्तव्यों (जैसे प्रदूषण नियंत्रण, भ्रष्टाचार रोकना) में विफल होती है, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
  • नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूकता: लोग अब अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग हैं और सीधे कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं।
  • संविधान की व्याख्या: अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्यापक व्याख्या ने न्यायिक सक्रियता को आधार दिया है।

न्यायिक सक्रियता के विभिन्न रूप

  1. मौलिक अधिकारों का विस्तार: अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ हवा, पानी, गोपनीयता और त्वरित सुनवाई के अधिकार को शामिल करना।
  2. जनहित याचिका (PIL): किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक हित के मामले में कोर्ट आने की अनुमति देना।
  3. प्रशासनिक जवाबदेही: भ्रष्टाचार के मामलों में या जेल सुधारों के लिए सरकार को निर्देश देना।
  4. पर्यावरण संरक्षण: उद्योगों को बंद करने या गंगा सफाई जैसे मुद्दों पर कड़े आदेश देना।

न्यायिक अतिरेक (Judicial Overreach) बनाम सक्रियता

सक्रियता और अतिरेक के बीच एक महीन रेखा है।

  • सक्रियता: जहाँ कोर्ट सरकार को उसका काम याद दिलाता है।
  • अतिरेक (Overreach): जब कोर्ट स्वयं ‘सरकार’ बनकर नीति निर्माण (Policy Making) या बजट आवंटन जैसे कार्यों में हस्तक्षेप करने लगता है। यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध है।
न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) सामाजिक न्याय नागरिक अधिकारों की रक्षा (अनुच्छेद 21 का विस्तार) प्रशासनिक जवाबदेही (भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक) जनहित याचिका (PIL) (न्याय तक सुलभ पहुँच) सरकार को कर्तव्य का बोध कराना Judicial Proactivity | pdfnotes.in | vikas singh

💡‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) एक ‘संवैधानिक शक्ति’ है, जबकि न्यायिक सक्रियता एक ‘न्यायिक दर्शन’ (Judicial Philosophy) है। सक्रियता का आधार ‘न्यायिक समीक्षा’ ही है।”

जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL)

जनहित याचिका का अर्थ है— ‘जनता के हित में दायर किया गया मुकदमा’। यह एक ऐसी न्यायिक प्रक्रिया है जिसमें कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी ऐसे व्यक्ति या वर्ग के लिए न्यायालय जा सकता है, जो गरीबी, अज्ञानता या अपनी प्रतिकूल सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण न्याय पाने में असमर्थ है।

उद्भव और विकास

  • जनक: भारत में PIL की शुरुआत का श्रेय जस्टिस पी.एन. भगवती और जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर को दिया जाता है।
  • परिवर्तन: PIL ने ‘लॉक्स स्टैंडी’ (Locus Standi) के पारंपरिक नियम को बदल दिया।
    • पारंपरिक नियम: केवल पीड़ित व्यक्ति ही कोर्ट जा सकता है।
    • PIL नियम: कोई भी सार्वजनिक हितैषी व्यक्ति पीड़ित की ओर से कोर्ट जा सकता है।

PIL की मुख्य विशेषताएँ

  • उद्देश्य: सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना और मानवाधिकारों की रक्षा करना।
  • सरल प्रक्रिया: कभी-कभी न्यायालय ने पत्र (Letter) या टेलीग्राम को भी याचिका के रूप में स्वीकार किया है।
  • स्वत: संज्ञान (Suo Motu): न्यायालय समाचार पत्रों की खबरों के आधार पर भी खुद कार्रवाई शुरू कर सकता है।

महत्वपूर्ण न्यायिक मामले (Landmark Cases)

  1. हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य (1979): इसे भारत का पहला PIL मामला माना जाता है। इससे जेल में बंद विचाराधीन कैदियों को मुक्ति मिली और ‘त्वरित सुनवाई’ (Speedy Trial) को मौलिक अधिकार माना गया।
  2. एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ: पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी याचिकाओं की झड़ी लगा दी। इसी से ‘प्रदूषक भुगतान करे’ (Polluter Pays) का सिद्धांत आया।
  3. विशाखा बनाम राजस्थान राज्य: कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी किए गए।
जनहित याचिका (PIL) का ढांचा कौन दायर कर सकता है? कोई भी जागरूक नागरिक या NGO किसके विरुद्ध? केंद्र/राज्य सरकार या प्राधिकरण सामाजिक न्याय प्रमुख क्षेत्र: पर्यावरण, मानवाधिकार, महिला कल्याण, जेल सुधार Public Interest Litigation | pdfnotes.in | vikas singh

💡‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

PIL केवल सार्वजनिक हित के लिए होती है। निजी लाभ, प्रचार या राजनीतिक बदले के लिए दायर की गई याचिकाओं पर न्यायालय अब भारी जुर्माना भी लगाता है।”

विशेषतान्यायिक समीक्षान्यायिक सक्रियताजनहित याचिका (PIL)
प्रकृतिसंवैधानिक शक्तिन्यायिक दृष्टिकोणन्याय तक पहुँच का साधन
स्त्रोतलिखित संविधान (अनुच्छेद 13 आदि)न्यायिक नवाचार (Judicial Innovation)जस्टिस पी.एन. भगवती व वी.आर. कृष्णा अय्यर
मुख्य लक्ष्यसंविधान की सर्वोच्चता बनाए रखनासामाजिक न्याय सुनिश्चित करनावंचित वर्गों को अधिकार दिलाना

न्यायिक समीक्षा एक ‘शक्ति’ (Power) है, न्यायिक सक्रियता एक ‘दृष्टिकोण’ (Philosophy) है और PIL उस सक्रियता को लागू करने का एक ‘माध्यम’ (Tool) है।”

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  1. न्यायिक समीक्षा का अर्थ है—विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की संवैधानिक वैधता की जाँच करना।
  2. भारतीय संविधान में न्यायिक समीक्षा की अवधारणा अमेरिका के संविधान से प्रेरित है।
  3. अनुच्छेद 13 न्यायिक समीक्षा का मुख्य आधार है (मूल अधिकारों से असंगत कानून शून्य)।
  4. अनुच्छेद 32 और 226 क्रमशः SC और HC को न्यायिक समीक्षा की शक्ति प्रदान करते हैं।
  5. केशवानंद भारती केस (1973) में न्यायिक समीक्षा को संविधान का ‘मूल ढांचा’ घोषित किया गया।
  6. I.R. कोएल्हो केस (2007) के अनुसार 9वीं अनुसूची के कानून भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में हैं।
  7. न्यायिक समीक्षा का मुख्य उद्देश्य संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखना है।
  8. भारत में ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ है, जबकि अमेरिका में ‘विधि की उचित प्रक्रिया’ है।
  9. मेनका गांधी केस (1978) के बाद भारत में भी ‘विधि की उचित प्रक्रिया’ का प्रभाव बढ़ा है।
  10. न्यायिक समीक्षा केंद्र और राज्यों के बीच संघीय संतुलन बनाए रखती है।
  11. न्यायिक सक्रियता का अर्थ है—सामाजिक न्याय हेतु न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका।
  12. भारत में न्यायिक सक्रियता का विचार 1970 के दशक के उत्तरार्ध में विकसित हुआ।
  13. भारत में न्यायिक सक्रियता के जनक जस्टिस पी.एन. भगवती और जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर हैं।
  14. न्यायिक सक्रियता अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) की व्यापक व्याख्या पर आधारित है।
  15. जब न्यायपालिका कार्यपालिका के क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप करती है, तो उसे ‘न्यायिक अतिरेक’ (Judicial Overreach) कहते हैं।
  16. न्यायिक सक्रियता का मुख्य साधन जनहित याचिका (PIL) है।
  17. जनहित याचिका (PIL) का अर्थ है—सार्वजनिक हित के लिए दायर मुकदमा।
  18. PIL की अवधारणा भी मूल रूप से अमेरिका से ली गई है।
  19. PIL ने ‘लॉक्स स्टैंडी’ (Locus Standi) के पारंपरिक नियम को शिथिल कर दिया है।
  20. ‘लॉक्स स्टैंडी’ का अर्थ है—केवल पीड़ित व्यक्ति ही कोर्ट जा सकता है।
  21. PIL के मामले में कोई भी जागरूक नागरिक या संगठन पीड़ित की ओर से कोर्ट जा सकता है।
  22. हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) भारत का पहला PIL मामला माना जाता है।
  23. इसी केस से ‘त्वरित सुनवाई’ (Speedy Trial) को मौलिक अधिकार का दर्जा मिला।
  24. एम.सी. मेहता को भारत में ‘पर्यावरण संबंधी PIL’ का अग्रदूत माना जाता है।
  25. PIL केवल सार्वजनिक हित के लिए होनी चाहिए, निजी लाभ के लिए नहीं।
  26. न्यायालय समाचार पत्र की खबरों के आधार पर भी स्वत: संज्ञान (Suo Motu) ले सकता है।
  27. PIL की प्रक्रिया बहुत सरल है; कोर्ट एक पोस्टकार्ड या पत्र को भी याचिका मान सकता है।
  28. विशाखा केस (1997) PIL के माध्यम से ही कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा हेतु गाइडलाइन आई।
  29. न्यायिक सक्रियता सरकार को उसके संवैधानिक कर्तव्यों की याद दिलाती है।
  30. न्यायिक समीक्षा की शक्ति अनुच्छेद 131-136 के अपीलीय क्षेत्राधिकार में भी निहित है।
  31. मिनर्वा मिल्स केस (1980) में न्यायिक समीक्षा को पुनः ‘मूल ढांचा’ पुष्ट किया गया।
  32. न्यायिक सक्रियता नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने में भी सहायक है।
  33. अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए विवेकाधीन शक्ति देता है।
  34. PIL का दुरुपयोग रोकने के लिए न्यायालय ‘फालतू याचिकाओं’ पर जुर्माना लगा सकता है।
  35. सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन केस जेल सुधारों से जुड़ी महत्वपूर्ण PIL थी।
  36. न्यायिक समीक्षा का अधिकार केवल उच्चतम और उच्च न्यायालयों को है।
  37. अधीनस्थ न्यायालयों (District Courts) के पास न्यायिक समीक्षा की शक्ति नहीं होती।
  38. न्यायिक पुनरावलोकन (Review) अनुच्छेद 137 के तहत कोर्ट अपने ही फैसले को बदल सकता है।
  39. न्यायिक समीक्षा का दायरा भारत में ‘संसद की सर्वोच्चता’ और ‘न्यायपालिका की सर्वोच्चता’ के बीच का समन्वय है।
  40. परमानंद कटारा बनाम भारत संघ केस से घायलों को त्वरित ‘चिकित्सा सहायता’ का अधिकार मिला।
  41. न्यायिक सक्रियता का एक बड़ा कारण विधायिका और कार्यपालिका की निष्क्रियता है।
  42. ‘पार्लियामेंट्री प्रिविलेज’ (संसदीय विशेषाधिकार) भी न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
  43. PIL को ‘सामाजिक क्रिया याचिका’ (Social Action Litigation) भी कहा जाता है।
  44. न्यायिक सक्रियता से ‘कानून का शासन’ (Rule of Law) मजबूत होता है।
  45. अनुच्छेद 143 (सलाहकारी क्षेत्राधिकार) भी न्यायिक समीक्षा की एक कड़ी है।
  46. PIL में न्यायालय अक्सर विशेषज्ञों की ‘जाँच समितियाँ’ नियुक्त करता है।
  47. न्यायिक सक्रियता लोकतंत्र में ‘चेक्स एंड बैलेंसेज’ (निरोध और संतुलन) का काम करती है।
  48. बंधुआ मुक्ति मोर्चा केस बंधुआ मजदूरों के अधिकारों से जुड़ी ऐतिहासिक PIL थी।
  49. न्यायिक समीक्षा की शक्ति को संविधान संशोधन द्वारा भी समाप्त नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष

न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका भारतीय लोकतंत्र की संविधानिक आत्मा को जीवंत बनाती हैं। न्यायपालिका की यह भूमिका तभी प्रभावी रहती है जब संवैधानिक मर्यादा और संस्थागत संतुलन बनाए रखा जाए।
परीक्षा दृष्टि से यह अध्याय कम शब्दों में गहराई वाले उत्तर लिखने में अत्यंत सहायक है।

Frequently Asked Questions (FAQs)

1. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) क्या है?

न्यायिक समीक्षा वह शक्ति है जिसके अंतर्गत न्यायपालिका यह जाँच करती है कि विधायिका या कार्यपालिका का कोई कार्य संविधान के अनुरूप है या नहीं, और असंवैधानिक पाए जाने पर उसे निरस्त कर सकती है।


2. भारतीय संविधान में न्यायिक समीक्षा का संवैधानिक आधार क्या है?

न्यायिक समीक्षा का आधार मुख्यतः अनुच्छेद 13, 32, 226, 131–136 और 137 में निहित है, जो न्यायपालिका को कानूनों और कार्यों की संवैधानिकता जाँचने की शक्ति देते हैं।


3. अनुच्छेद 137 का संबंध न्यायिक समीक्षा से कैसे है?

अनुच्छेद 137 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही निर्णयों की पुनरावलोकन (Review) की शक्ति प्राप्त है, जो न्यायिक समीक्षा का एक महत्वपूर्ण आयाम है।


4. I. R. Coelho मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

I. R. Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नौवीं अनुसूची में शामिल कानून भी Basic Structure Doctrine के अधीन न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएँगे


5. न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) से क्या तात्पर्य है?

न्यायिक सक्रियता वह दृष्टिकोण है जिसमें न्यायपालिका सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और सुशासन सुनिश्चित करने के लिए कानून की विस्तृत और प्रगतिशील व्याख्या करती है।


6. भारत में न्यायिक सक्रियता के प्रमुख प्रवर्तक कौन माने जाते हैं?

जस्टिस पी. एन. भगवती को भारत में न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिका (PIL) आंदोलन का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है।


7. जनहित याचिका (PIL) क्या है?

जनहित याचिका वह प्रक्रिया है जिसमें कोई भी नागरिक या संगठन सार्वजनिक हित में, भले ही वह स्वयं पीड़ित न हो, न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है।


8. भारत की पहली प्रमुख PIL कौन-सी थी?

हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य मामला भारत की पहली प्रमुख PIL माना जाता है, जिसमें Speedy Trial को अनुच्छेद 21 का हिस्सा घोषित किया गया।


9. M. C. Mehta मामलों का PIL में क्या महत्व है?

M. C. Mehta बनाम भारत संघ मामलों ने पर्यावरण संरक्षण को मजबूत किया और स्वच्छ पर्यावरण को जीवन के अधिकार (Article 21) का हिस्सा माना।


10. न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता और PIL में क्या अंतर है?

  • न्यायिक समीक्षा → संवैधानिक शक्ति
  • न्यायिक सक्रियता → न्यायपालिका का दृष्टिकोण
  • PIL → न्याय तक पहुँच का साधन
    तीनों मिलकर न्यायपालिका को लोकतंत्र का संरक्षक बनाते हैं।

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Vikas Singh

लेखक: विकास सिंह

विकास सिंह 15+ वर्षों के शिक्षण अनुभव वाले General Studies (GS) शिक्षक हैं। उन्होंने GS Faculty के रूप में कार्य किया है तथा दो बार UPSC Mains परीक्षा में सम्मिलित हो चुके हैं। वे भारतीय राजव्यवस्था, इतिहास, भूगोल और सामान्य विज्ञान के विशेषज्ञ हैं। वर्तमान में वे वाराणसी में अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं और अपने YouTube चैनल Study2Study के माध्यम से शिक्षा जगत में योगदान दे रहे हैं।