भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को “राज्यों का संघ” घोषित किया है। भारतीय संविधान में संघीय ढांचा मौजूद है, लेकिन इसमें मजबूत केंद्र के कारण इसे अर्द्ध-संघीय (Quasi-Federal) भी कहा जाता है। संविधान में संघीय तत्व मौजूद है—दोहरी सरकार, शक्तियों का विभाजन, स्वतंत्र न्यायपालिका—लेकिन साथ ही मजबूत केंद्र, एकल नागरिकता और आपातकालीन प्रावधान जैसे एकात्मक तत्व भी शामिल हैं। संघवाद भारतीय संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।
- इसी कारण भारत को अक्सर “अर्द्ध-संघीय” (Quasi-Federal) या “मजबूत केंद्र वाला संघ” कहा जाता है।
यह टॉपिक UPSC, PCS, SSC, और अन्य परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

Table of Contents
संघीय व्यवस्था: परिचय (Introduction)
राजनीतिक वैज्ञानिकों ने सरकारों को उनके केंद्र और क्षेत्रीय सरकारों के बीच संबंधों के आधार पर दो भागों में विभाजित किया है: एकात्मक (Unitary) और संघीय (Federal)।
- अर्थ: ‘फेडरेशन’ (Federation) शब्द लैटिन शब्द ‘Foedus’ से निकला है, जिसका अर्थ है ‘संधि’ या ‘समझौता’।
- भारतीय संदर्भ: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को ‘राज्यों का संघ’ (Union of States) कहा गया है। डॉ. अंबेडकर के अनुसार, भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी ‘समझौते’ का परिणाम नहीं है और किसी भी राज्य को इससे अलग होने का अधिकार नहीं है।
- मॉडल: भारत का संघीय ढांचा कनाडाई मॉडल पर आधारित है, जिसमें एक ‘मजबूत केंद्र’ की व्यवस्था है।
संघीय व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ (Core Federal Features)
भारतीय संविधान में वे सभी लक्षण मौजूद हैं जो एक संघीय ढांचे के लिए आवश्यक हैं:
1. दोहरी सरकार (Dual Polity)
संविधान ने केंद्र और राज्य स्तर पर दो पृथक सरकारों की व्यवस्था की है। केंद्र सरकार राष्ट्रीय महत्व के विषय (रक्षा, विदेश, बैंकिंग) देखती है, जबकि राज्य सरकारें क्षेत्रीय महत्व के विषय (पुलिस, स्वास्थ्य, कृषि) संभालती हैं।
2. शक्तियों का विभाजन (Division of Powers)
संविधान की 7वीं अनुसूची के माध्यम से केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है:
- संघ सूची: 100 विषय (मूलतः 97)
- राज्य सूची: 61 विषय (मूलतः 66)
- समवर्ती सूची: 52 विषय (मूलतः 47)
3. लिखित संविधान (Written Constitution)
भारत का संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। यह केंद्र और राज्यों की शक्तियों और सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है, जिससे भविष्य के विवादों की संभावना कम होती है।
4. संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution)
संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। केंद्र या राज्य द्वारा बनाया गया कोई भी कानून यदि संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध है, तो न्यायपालिका उसे शून्य घोषित कर सकती है।
5. कठोर संविधान (Rigid Constitution)
संघीय ढांचे से संबंधित प्रावधानों (जैसे शक्तियों का बंटवारा या न्यायपालिका की शक्ति) को संशोधित करने के लिए संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ आधे राज्यों की सहमति भी अनिवार्य है।
6. स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)
संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय के नेतृत्व में एक स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की है। यह केंद्र और राज्यों के बीच होने वाले कानूनी विवादों का निपटारा करती है और संविधान की व्याख्या करती है।
7. द्विसदनीय व्यवस्था (Bicameralism)
भारतीय संसद में दो सदन हैं:
- लोकसभा: जो भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करती है।
- राज्यसभा: जो राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और संघीय संतुलन बनाए रखती है।
💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):
भारत को ‘विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि संसद किसी राज्य की सीमा या नाम बदल सकती है, लेकिन कोई राज्य भारत से अलग नहीं हो सकता। 1994 के एस.आर. बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि ‘संघवाद’ संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का हिस्सा है।
संघीय शासन की तालिका
| संघीय लक्षण | महत्व |
| 7वीं अनुसूची | शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा |
| स्वतंत्र SC | केंद्र-राज्य विवादों का हल |
| राज्यसभा | राज्यों के हितों का संरक्षण |
| विशेष बहुमत | राज्यों के अधिकारों की रक्षा |
एकात्मक या गैर-संघीय विशेषताएं (Unitary Features)
भारतीय संविधान में कई ऐसे प्रावधान हैं जो संघीय ढांचे को तोड़कर केंद्र को अत्यधिक शक्तिशाली बना देते हैं। इन्हें ‘गैर-संघीय’ तत्व कहा जाता है:
1. सशक्त केंद्र (Strong Centre)
शक्तियों का विभाजन केंद्र के पक्ष में है। संघ सूची में राज्यों की तुलना में अधिक विषय (100) हैं और वे राष्ट्रीय महत्व के हैं। साथ ही, अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) भी केंद्र के पास ही हैं।
2. राज्य अनश्वर नहीं (States are not Indestructible)
अमेरिका के विपरीत, भारत में राज्यों को अपनी क्षेत्रीय अखंडता का अधिकार नहीं है। संसद अनुच्छेद 3 के तहत किसी भी राज्य की सीमा, नाम या क्षेत्र को उसकी सहमति के बिना भी बदल सकती है। इसीलिए भारत “विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ” है।
3. एकल संविधान (Single Constitution)
पूरे भारत के लिए केवल एक ही संविधान है। राज्यों को अपना अलग संविधान बनाने की अनुमति नहीं है (पहले जम्मू-कश्मीर अपवाद था, जो अब नहीं है)।
4. आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)
आपातकाल (अनुच्छेद 352, 356, 360) के दौरान केंद्र सरकार बिना किसी संवैधानिक संशोधन के सर्वशक्तिमान हो जाती है। उस समय भारत का संघीय ढांचा पूरी तरह एकात्मक (Unitary) में बदल जाता है।
5. एकल नागरिकता (Single Citizenship)
कनाडा की तरह भारत में भी केवल ‘राष्ट्रीय नागरिकता’ है। यहाँ अमेरिका की तरह राज्यों की अलग नागरिकता का प्रावधान नहीं है, जो राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देता है।
6. राज्यपाल की नियुक्ति (Appointment of Governor)
राज्य का संवैधानिक प्रमुख (राज्यपाल) राष्ट्रपति (केंद्र) द्वारा नियुक्त किया जाता है। वह केंद्र के एक ‘एजेंट’ के रूप में कार्य करता है, जो संघीय भावना के विपरीत है।
7. अखिल भारतीय सेवाएँ (All-India Services)
IAS और IPS अधिकारियों का चयन और प्रशिक्षण केंद्र द्वारा होता है, लेकिन वे राज्यों में तैनात होते हैं। केंद्र का इन पर अंतिम नियंत्रण राज्यों के प्रशासन में हस्तक्षेप जैसा प्रतीत होता है।
8. एकीकृत चुनाव और लेखा मशीनरी
- चुनाव आयोग: केंद्र और राज्य दोनों के चुनाव कराता है।
- CAG: केंद्र और राज्यों दोनों के खातों की जांच करता है।इनकी नियुक्ति और सेवा शर्तें पूरी तरह केंद्र के हाथ में होती हैं।
💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):
‘तकनीकी शब्दावली’
- के.सी. ह्वीयर (K.C. Wheare): उन्होंने भारत को ‘अर्द्ध-संघीय’ (Quasi-Federal) कहा।
- आईवर जेनिंग्स: उन्होंने इसे “मजबूत केंद्र वाला संघ” कहा।
- ग्रेनविले ऑस्टिन: उन्होंने इसे “सहयोगी संघवाद” (Cooperative Federalism) कहा।
एकात्मक तत्व
| तत्व | प्रभाव |
| एकल नागरिकता | राष्ट्रीय एकता |
| एकीकृत न्यायपालिका | कानून की एकरूपता |
| अखिल भारतीय सेवाएँ | प्रशासनिक एकीकरण |
| अनुच्छेद 356 | राज्यों पर केंद्र का नियंत्रण |
संघवाद पर महत्वपूर्ण विचार और आयोग
भारतीय संघवाद की प्रकृति इतनी अनूठी है कि विभिन्न विद्वानों ने इसे अलग-अलग नामों से पुकारा है। परीक्षाओं में ये ‘कोटेशन’ सीधे पूछे जाते हैं:
1. विद्वानों के प्रसिद्ध मत (Expert Opinions)
- के.सी. ह्वीयर (K.C. Wheare): उन्होंने भारत को ‘अर्द्ध-संघीय’ (Quasi-Federal) कहा।
- ग्रेनविले ऑस्टिन: इसे ‘सहयोगी संघवाद’ (Cooperative Federalism) की संज्ञा दी।
- मॉरिस जोन्स: इसे ‘सौदेबाजी वाला संघवाद’ (Bargaining Federalism) कहा।
- आईवर जेनिंग्स: उनके अनुसार यह “मजबूत केंद्र वाला संघ” है।
2. प्रमुख आयोग (Important Commissions)
केंद्र-राज्य संबंधों और संघीय ढांचे को मजबूत करने के लिए समय-समय पर समितियां बनाई गईं:
- सरकारिया आयोग (1983): इसने केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा की और ‘सहयोगी संघवाद’ पर जोर दिया।
- पुंछी आयोग (2007): इसने समकालीन चुनौतियों (जैसे आंतरिक सुरक्षा और जल विवाद) पर ध्यान केंद्रित किया।
वित्तीय संघवाद के उदाहरण (Financial Federalism)
वित्तीय शक्तियों का बँटवारा ही संघवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। इसके प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:
- GST परिषद (GST Council): यह सहयोगी संघवाद का सबसे बड़ा उदाहरण है। यहाँ केंद्र और राज्य मिलकर अप्रत्यक्ष करों (Indirect Taxes) पर निर्णय लेते हैं।
- वित्त आयोग (Finance Commission): अनुच्छेद 280 के तहत, यह आयोग तय करता है कि केंद्र के करों में राज्यों का कितना हिस्सा होगा (वर्तमान में 41%)।
- नीति आयोग (NITI Aayog): ‘बॉटम-अप’ दृष्टिकोण के माध्यम से राज्यों को राष्ट्रीय नीतियों के निर्माण में शामिल करता है।
| संस्था/तंत्र | महत्व |
|---|---|
| GST परिषद | सहकारी वित्तीय संघवाद |
| वित्त आयोग | कर-वितरण अनुशंसा |
| अंतर-राज्य परिषद (Art 263) | समन्वय मंच |
| नीति आयोग | सहयोगी संघवाद |
महत्वपूर्ण तथ्य
- एस.आर. बोम्मई मामला (1994): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘संघवाद’ संविधान का मूल ढांचा है।
- अनुच्छेद 263: संघीय सहयोग बढ़ाने के लिए ‘अंतर-राज्य परिषद’ (Inter-State Council) के गठन का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 249: संसद को राष्ट्रहित में राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की शक्ति देता है।
- विनाशी बनाम अविनाशी: भारत “विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ” है, जबकि अमेरिका “अविनाशी राज्यों का अविनाशी संघ” है।
निष्कर्ष (Conclusion)
भारतीय संघवाद न तो पूरी तरह संघीय है और न ही पूरी तरह एकात्मक। यह एक ‘संतुलन चक्र’ है जो सामान्य परिस्थितियों में राज्यों को स्वायत्तता देता है, लेकिन राष्ट्रीय एकता के समय केंद्र को शक्ति प्रदान करता है। क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय अखंडता के बीच समन्वय ही भारतीय संघवाद की असली सफलता है।
💡 “संघवाद केवल अधिकारों का बँटवारा नहीं, बल्कि ‘साझा संप्रभुता’ है। GST और नीति आयोग जैसे संस्थानों ने भारत को ‘प्रतिस्पर्धी संघवाद’ (Competitive Federalism) से ‘सहयोगी संघवाद’ की ओर बढ़ाया है, जो एक मजबूत राष्ट्र के लिए अनिवार्य है।”
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- शासन प्रणाली को शक्तियों के वितरण के आधार पर एकात्मक (Unitary) और संघीय (Federal) दो भागों में बांटा गया है।
- अनुच्छेद 1 में ‘संघ’ (Federation) शब्द के स्थान पर ‘राज्यों का संघ’ (Union of States) शब्द का प्रयोग किया गया है।
- डॉ. अंबेडकर के अनुसार, भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी ‘समझौते’ का परिणाम नहीं है।
- भारतीय संघवाद मुख्य रूप से कनाडाई मॉडल पर आधारित है, जिसमें ‘मजबूत केंद्र’ की व्यवस्था है।
- 7वीं अनुसूची केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के स्पष्ट विभाजन का आधार प्रदान करती है।
- संघीय व्यवस्था की मुख्य पहचान दोहरी सरकार (केंद्र और राज्य) और स्वतंत्र न्यायपालिका है।
- संविधान की सर्वोच्चता संघीय शासन का अनिवार्य तत्व है ताकि केंद्र या राज्य मनमाना कानून न बना सकें।
- राज्यसभा को भारतीय संसद में ‘संघीय ढांचे का रक्षक’ और राज्यों का प्रतिनिधि माना जाता है।
- एस.आर. बोम्मई मामला (1994): सुप्रीम कोर्ट ने ‘संघवाद’ को संविधान का ‘मूल ढांचा’ घोषित किया।
- भारत को “विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ” कहा जाता है क्योंकि संसद किसी राज्य की सीमा बदल सकती है (अनुच्छेद 3)।
- आपातकाल के दौरान भारतीय संघीय ढांचा पूरी तरह से एकात्मक (Unitary) हो जाता है।
- एकल नागरिकता और एकल संविधान भारतीय संघवाद के प्रमुख ‘एकात्मक’ लक्षण हैं।
- अखिल भारतीय सेवाएँ (IAS/IPS) केंद्र द्वारा नियुक्त होती हैं लेकिन राज्यों में कार्य करती हैं, जो केंद्र को मजबूत बनाती हैं।
- राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति (केंद्र) द्वारा होती है, जो राज्यों में केंद्र के एजेंट के रूप में कार्य करता है।
- अनुच्छेद 249 के तहत संसद राष्ट्रहित में राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की शक्ति रखती है।
- के.सी. ह्वीयर ने भारतीय संविधान को ‘अर्द्ध-संघीय’ (Quasi-Federal) की संज्ञा दी है।
- ग्रेनविले ऑस्टिन ने भारतीय संघवाद को ‘सहयोगी संघवाद’ (Cooperative Federalism) कहा है।
- GST परिषद और नीति आयोग भारत में ‘सहयोगी संघवाद’ को बढ़ावा देने वाले प्रमुख मंच हैं।
- वित्त आयोग (Art 280) केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के बँटवारे का मुख्य आधार है।
- केंद्र-राज्य संबंधों में सुधार के लिए सरकारिया आयोग (1983) और पुंछी आयोग (2007) का गठन किया गया था।
- अंतर-राज्य परिषद (Art 263) राज्यों के बीच समन्वय और सहयोग बढ़ाने का संवैधानिक तंत्र है।
- अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का अत्यधिक प्रयोग अक्सर संघीय ढांचे के लिए चुनौती माना जाता है।
- ‘एक राष्ट्र, एक कर’ (GST) ने भारत में वित्तीय संघवाद का एकीकरण किया है।
- भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन ने भारतीय संघवाद की जड़ों को अधिक मजबूती दी है।
- भारतीय संघवाद केंद्र और राज्यों के बीच एक ‘संतुलन चक्र’ के रूप में कार्य करता है।

🎯 PYQ (UPSC/State PCS Pattern)
Q1. भारत को ‘राज्यों का संघ’ कहा गया है, क्योंकि: (UPSC)
(a) राज्य संधि से बने हैं
(b) राज्यों को पृथक होने का अधिकार है
(c) संघ राज्यों का समझौता नहीं है
(d) राज्य सर्वोच्च हैं
✅ उत्तर: (c)
Q2. निम्न में से कौन-सा भारतीय संघवाद का एकात्मक तत्व है?(UPPCS)
- एकल नागरिकता
- स्वतंत्र न्यायपालिका
- अखिल भारतीय सेवाएँ
(a) केवल 1
(b) 1 और 3
(c) 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
✅ उत्तर: (b)
Q3. संघवाद को मूल संरचना किस मामले में घोषित किया गया?(BPSC)
(a) गोलकनाथ
(b) मिनर्वा मिल्स
(c) एस.आर. बोम्मई
(d) शंकरी प्रसाद
✅ उत्तर: (c)
Q4. अनुच्छेद 3 संबंधित है: (MPPSC)
(a) वित्त आयोग
(b) राज्य पुनर्गठन
(c) नागरिकता
(d) न्यायपालिका
✅ उत्तर: (b)
❓ FAQ
Q1. क्या भारत पूर्ण संघीय राज्य है?
नहीं, इसे अर्द्ध-संघीय या मजबूत केंद्र वाला संघ कहा जाता है।
Q2. भारतीय संघवाद किस मॉडल पर आधारित है?
कनाडाई मॉडल।
Q3. 7वीं अनुसूची में कितनी सूचियाँ हैं?
तीन—संघ, राज्य, समवर्ती।
Q4. संघवाद संविधान के किस हिस्से में है?
अनुच्छेद 1 और 7वीं अनुसूची में; साथ ही मूल ढांचा सिद्धांत में।
Q5. संघवाद क्यों अपनाया गया?
विविधता, विशालता और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के संतुलन हेतु।
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