संविधान की मूल संरचना (Basic Structure of the Constitution)

“भारतीय संविधान की ‘मूल संरचना’ (Basic Structure) का सिद्धांत भारत के संवैधानिक इतिहास में न्यायपालिका द्वारा विकसित सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। “इस सिद्धांत का जन्म 1973 के ऐतिहासिक केशवानंद भारती मामले में हुआ था। इसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया कि संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, शक्तियों का पृथक्करण और धर्मनिरपेक्षता जैसे मौलिक तत्व हमेशा सुरक्षित रहें। सरल शब्दों में कहें तो, मूल संरचना वह ‘आत्मा’ है जिसे संसद भी नहीं छू सकती।”

भारतीय संविधान की 'मूल संरचना'
मूल संरचना (जेनेटिक कोड) संसद की संशोधन शक्ति (Art 368) लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता न्यायिक समीक्षा संविधान की सर्वोच्चता Note: संसद संशोधन कर सकती है, पर मूल संरचना को नहीं छू सकती।

संसद vs न्यायपालिका: सर्वोच्चता

आजादी के बाद से ही इस बात पर बहस छिड़ गई कि क्या संसद संविधान के किसी भी हिस्से (विशेषकर मौलिक अधिकारों) को बदल सकती है। इस संघर्ष को हम तीन चरणों में समझ सकते हैं:

प्रथम चरण (1951–1967): संसद का वर्चस्व

शुरुआत में न्यायपालिका का रुख नरम था और संसद को असीमित शक्तियां प्राप्त थीं।

  • शंकरी प्रसाद मामला (1951) और सज्जन सिंह मामला (1965): सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है।

द्वितीय चरण (1967–1973): न्यायपालिका का पलटवार

यहाँ से न्यायपालिका ने संसद की शक्ति पर ‘ब्रेक’ लगाना शुरू किया।

  • गोलकनाथ मामला (1967): 11 जजों की बेंच ने फैसला सुनाया कि मौलिक अधिकार ‘अलौकिक’ (Transcendental) हैं। संसद इन्हें न तो कम कर सकती है और न ही छीन सकती है।
  • संसद की प्रतिक्रिया: इंदिरा गांधी सरकार ने 24वें और 25वें संशोधन (1971) के जरिए गोलकनाथ फैसले को पलट दिया और घोषित किया कि संसद के पास किसी भी अधिकार को बदलने की असीमित शक्ति है।

तृतीय चरण (1973–वर्तमान): संतुलन और ‘मूल ढांचा’

यह चरण भारतीय लोकतंत्र का टर्निंग पॉइंट था।

  • केशवानंद भारती मामला (1973): 13 जजों की सबसे बड़ी बेंच बैठी। कोर्ट ने संसद की शक्ति को स्वीकार किया लेकिन एक ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच दी।
  • कोर्ट ने कहा: “संसद घर की मरम्मत (संशोधन) तो कर सकती है, लेकिन घर की नींव (Basic Structure) को नहीं हटा सकती।”

मुख्य सारांश :

वर्षघटना/केससंसद की स्थितिन्यायपालिका का रुख
1951शंकरी प्रसादशक्तिशाली (असीमित संशोधन)“संसद कुछ भी बदल सकती है।”
1967गोलकनाथसीमित (FR नहीं बदल सकती)“मौलिक अधिकार पवित्र हैं।”
197124वां संशोधनअसीमित शक्ति का दावासंसद ने कानून बनाकर शक्ति छीनी।
1973केशवानंद भारतीसंतुलित (मूल ढांचा लागू)“शक्ति है, पर मूल ढांचा नहीं छुएंगे।”
1980मिनर्वा मिल्सनियंत्रित“संसद की सीमित शक्ति ही मूल ढांचा है।”

💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

‘चेक एंड बैलेंस’ का सिद्धांत :

  1. संसद कहती है: “हमें जनता ने चुना है, इसलिए हम सर्वोच्च हैं।”
  2. न्यायपालिका कहती है: “हम संविधान के रक्षक हैं, इसलिए संविधान सर्वोच्च है।”आज की स्थिति यह है कि भारत में ‘संवैधानिक सर्वोच्चता’ है, संसदीय सर्वोच्चता (ब्रिटेन की तरह) नहीं।
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मूल संरचना के प्रमुख तत्व (Key Elements of Basic Structure)

सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अपने विभिन्न फैसलों में कई प्रावधानों को ‘मूल संरचना’ का हिस्सा घोषित किया है। मुख्य तत्व निम्नलिखित हैं:

मूल संरचना के प्रमुख तत्व – Consolidated Table

मूल संरचना के तत्व (Elements)संबंधित ऐतिहासिक मामला (Leading Case)
संविधान की सर्वोच्चताकेशवानंद भारती मामला (1973)
गणतंत्रात्मक और लोकतांत्रिक स्वरूपकेशवानंद भारती मामला (1973)
धर्मनिरपेक्षता (Secularism)एस.आर. बोम्मई मामला (1994)
शक्तियों का पृथक्करणकेशवानंद भारती मामला (1973)
संघीय ढांचा (Federalism)एस.आर. बोम्मई मामला (1994)
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)मिनर्वा मिल्स मामला (1980)
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावइंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975)
न्यायपालिका की स्वतंत्रताNJAC मामला (2015)
कानून का शासन (Rule of Law)इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975)
संसदीय प्रणालीकेशवानंद भारती मामला (1973)
मौलिक अधिकारों और DPSP में संतुलनमिनर्वा मिल्स मामला (1980)
न्याय तक प्रभावी पहुँचसेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (1980)

💡‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

सुप्रीम कोर्ट ने मिनर्वा मिल्स (1980) में कहा था कि “संसद की संविधान में संशोधन करने की सीमित शक्ति स्वयं में संविधान की मूल संरचना है।” इसका अर्थ यह है कि संसद अपनी संशोधन शक्ति का उपयोग करके उस शक्ति को ‘असीमित’ नहीं बना सकती। यदि वह ऐसा करती है, तो वह मूल संरचना का उल्लंघन होगा।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – Case Law Timeline Table

वर्षमामलाकोर्ट का निर्णयप्रभाव
1951शंकरी प्रसादसंसद FR बदल सकती हैसंशोधन शक्ति व्यापक
1965सज्जन सिंहशंकरी प्रसाद दोहरायासंसद की शक्ति कायम
1967गोलकनाथसंसद FR नहीं बदल सकतीसंशोधन शक्ति सीमित
197124वां संशोधनसंसद को FR बदलने की शक्तिगोलकनाथ प्रभाव समाप्त
1973केशवानंद भारतीसंशोधन संभव, पर Basic Structure नहींमूल ढांचा सिद्धांत जन्म
1975इंदिरा गांधी केसस्वतंत्र चुनाव = मूल संरचनालोकतंत्र सुरक्षित
1980मिनर्वा मिल्ससीमित संशोधन शक्ति = मूल ढांचान्यायिक समीक्षा सुरक्षित
1981वामन राव24 अप्रैल 1973 के बाद Basic Structure लागूCut-off Date तय
1994एस.आर. बोम्मईसंघवाद + धर्मनिरपेक्षता = मूल संरचनाFederal Balance
2015NJAC केसन्यायपालिका की स्वतंत्रता = मूल ढांचा99वां संशोधन रद्द

अवधारणात्मक समझ: मूल संरचना क्यों अनिवार्य है?

संविधान की मूल संरचना कोई ‘लिखित नियम’ नहीं बल्कि एक ‘संवैधानिक दर्शन’ है। इसे समझने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है:

  • संविधान बनाम संसद: भारत में ‘संसदीय संप्रभुता’ (ब्रिटेन की तरह) नहीं, बल्कि ‘संवैधानिक संप्रभुता’ है। इसका अर्थ है कि संसद संविधान की संतान है, उसकी निर्माता नहीं। संतान अपने माता-पिता (मूल ढांचे) को नहीं बदल सकती।
  • असीमित शक्ति पर अंकुश: यदि मूल संरचना का सिद्धांत न होता, तो कोई भी बहुमत वाली सरकार अनुच्छेद 368 का उपयोग करके भारत को लोकतंत्र से तानाशाही में बदल सकती थी। यह सिद्धांत ‘बहुमत की निरंकुशता’ के विरुद्ध सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।
  • न्यायिक नवाचार (Judicial Innovation): यह सिद्धांत दुनिया के किसी भी अन्य संविधान में इतने स्पष्ट रूप से नहीं है। यह भारतीय न्यायपालिका की ‘खोज’ है, जिसने संविधान को एक निर्जीव दस्तावेज होने से बचाया और उसे ‘जीवंत’ (Living) बनाए रखा।
  • 9वीं अनुसूची का भ्रम: पहले माना जाता था कि 9वीं अनुसूची में डाला गया कोई भी कानून कोर्ट चेक नहीं कर सकता। लेकिन आई.आर. कोहिलो केस (2007) में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कानून मूल ढांचे को चोट पहुँचाता है, तो उसकी समीक्षा की जा सकती है।

💡‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

“मूल संरचना संविधान का ‘जेनेटिक कोड’ है।” जैसे इंसान का DNA बदलने से उसका अस्तित्व बदल जाता है, वैसे ही मूल संरचना को बदलने से भारत का वह स्वरूप खत्म हो जाएगा जिसकी कल्पना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी। यह सिद्धांत सुनिश्चित करता है कि भारत हमेशा एक स्वतंत्र, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बना रहे।

निष्कर्ष (Conclusion)

संविधान की मूल संरचना का सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र की ‘लक्ष्मण रेखा’ है। यह संसद की संशोधन शक्ति और न्यायपालिका की समीक्षा शक्ति के बीच एक सुंदर संतुलन (Balance) बनाता है। यद्यपि इसकी आलोचना इस आधार पर की जाती है कि यह न्यायपालिका को बहुत अधिक शक्तिशाली बनाता है, लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में संविधान की “आत्मा” को बचाने के लिए यह अपरिहार्य है। यह सुनिश्चित करता है कि बहुमत की सरकार संविधान की आत्मा को न बदल सके।

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अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर्स

  1. संविधान की ‘मूल संरचना’ का सिद्धांत न्यायपालिका की एक महान खोज है।
  2. इसका मुख्य उद्देश्य संसद की संविधान संशोधन की शक्ति को नियंत्रित करना है।
  3. शंकरी प्रसाद मामला (1951): सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद मौलिक अधिकारों सहित किसी भी भाग को बदल सकती है।
  4. सज्जन सिंह मामला (1965): कोर्ट ने पुनः संसद की संशोधन शक्ति को सही ठहराया।
  5. गोलकनाथ मामला (1967): कोर्ट ने अपना पिछला फैसला पलटते हुए कहा कि संसद मौलिक अधिकारों को नहीं छीन सकती।
  6. गोलकनाथ केस में कहा गया कि मौलिक अधिकार ‘अलौकिक’ (Transcendental) और अपरिवर्तनीय हैं।
  7. संसद ने गोलकनाथ फैसले के जवाब में 24वां संविधान संशोधन (1971) पारित किया।
  8. 24वें संशोधन ने संसद को अधिकार दिया कि वह किसी भी मौलिक अधिकार को कम कर सकती है।
  9. केशवानंद भारती मामला (1973): यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा बेंच मामला (13 जज) था।
  10. इस मामले में कोर्ट ने 24वें संशोधन को सही माना लेकिन ‘मूल संरचना’ का सिद्धांत पेश किया।
  11. कोर्ट ने कहा: संसद संविधान बदल सकती है, लेकिन इसके ‘बुनियादी ढांचे’ को नष्ट नहीं कर सकती।
  12. ‘मूल संरचना’ क्या है? इसे कोर्ट ने स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया, बल्कि समय-समय पर तय करने की बात कही।
  13. इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण मामला (1975): कोर्ट ने ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ को मूल संरचना घोषित किया।
  14. संसद ने इसके जवाब में 42वां संशोधन (1976) पारित किया।
  15. 42वें संशोधन ने कहा कि संसद की संशोधन शक्ति की कोई सीमा नहीं है और इसे कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  16. मिनर्वा मिल्स मामला (1980): कोर्ट ने 42वें संशोधन के इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
  17. कोर्ट ने कहा: ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) संविधान की मूल संरचना है।
  18. संसद ‘सीमित’ संशोधन शक्ति का उपयोग करके खुद को ‘असीमित’ शक्ति नहीं दे सकती।
  19. वामन राव मामला (1981): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूल संरचना का सिद्धांत 24 अप्रैल 1973 के बाद के कानूनों पर लागू होगा।
  20. किहोतो होलोहन मामला (1993): ‘लोकतांत्रिक संरचना’ को मूल ढांचा माना गया।
  21. एस.आर. बोम्मई मामला (1994): ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘संघवाद’ को मूल संरचना घोषित किया गया।
  22. एल. चंद्र कुमार मामला (1997): उच्च न्यायालयों की अनुच्छेद 226/227 के तहत शक्ति को मूल ढांचा माना गया।
  23. इंद्र साहनी मामला (1992): ‘कानून का शासन’ (Rule of Law) मूल संरचना है।
  24. कुलदीप नायर मामला (2006): लोकतंत्र और स्वतंत्र चुनाव को पुनः मूल ढांचा माना गया।
  25. नवलखा मामला (2010): न्यायिक स्वतंत्रता को मूल संरचना माना गया।
  26. कानून का शासन (Rule of Law)।
  27. मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के बीच संतुलन।
  28. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव।
  29. न्यायपालिका की स्वतंत्रता।
  30. संविधान में संशोधन करने की संसद की ‘सीमित’ शक्ति।
  31. न्याय तक प्रभावी पहुंच।
  32. मौलिक अधिकारों के आधारभूत तत्व।
  33. अनुच्छेद 32, 136, 141 और 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां।
  34. अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाई कोर्ट की शक्तियां।
  35. मूल संरचना कोई स्थिर अवधारणा नहीं है, यह गतिशील है।
  36. यह सिद्धांत संविधान की ‘आत्मा’ की रक्षा करता है।
  37. मूल संरचना संसद को ‘तानाशाह’ बनने से रोकती है।
  38. यह न्यायपालिका को संविधान की अंतिम व्याख्या करने वाली संस्था बनाता है।
  39. मूल संरचना का सिद्धांत केवल ‘संवैधानिक संशोधनों’ पर लागू होता है, सामान्य कानूनों पर नहीं।
  40. मूल संरचना’ शब्द का उल्लेख संविधान में कहीं नहीं है।
  41. यह पूरी तरह से एक न्यायिक नवाचार (Judicial Innovation) है।
  42. इस सिद्धांत ने भारत को ‘संसदीय संप्रभुता’ (ब्रिटेन) से ‘संवैधानिक संप्रभुता’ की ओर मोड़ा।
  43. मूल संरचना का उद्देश्य संविधान के मूल दर्शन को बचाए रखना है।
  44. 9वीं अनुसूची के कानूनों की भी न्यायिक समीक्षा हो सकती है यदि वे मूल संरचना का उल्लंघन करें (कोहिलो केस)।
  45. संसद और न्यायपालिका के बीच संघर्ष का अंत इसी सिद्धांत से हुआ।
  46. यह लोकतंत्र में ‘चेक एंड बैलेंस’ का सबसे अच्छा उदाहरण है।
  47. 99वां संशोधन (NJAC) मूल संरचना (न्यायिक स्वतंत्रता) के उल्लंघन के कारण रद्द हुआ था।
  48. संविधान की प्रस्तावना मूल संरचना को समझने का सबसे बड़ा स्रोत है।
  49. मूल संरचना का सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा दीवार है।
  50. यह सुनिश्चित करता है कि बहुमत की सरकार संविधान को खत्म न कर सके।
  51. मूल संरचना का हनन करने वाला कोई भी संशोधन ‘शून्य’ माना जाता है।
  52. इस सिद्धांत की आलोचना की जाती है कि यह न्यायपालिका को ‘तीसरा सदन’ बना देता है।
  53. समर्थकों का मानना है कि यह ‘भीड़तंत्र’ से संविधान की रक्षा करता है।
  54. यह सिद्धांत केवल भारत में ही नहीं, अब अन्य देशों के कोर्ट भी अपना रहे हैं।
  55. मूल संरचना के बिना संविधान एक निर्जीव कानूनी किताब मात्र रह जाता।
  56. संसद की शक्ति ‘संविधान के भीतर’ है, ‘संविधान के ऊपर’ नहीं।
  57. मूल संरचना संविधान के ‘जेनेटिक कोड’ की तरह है।
  58. अनुच्छेद 368 की शक्ति ‘सीमित’ है, और यह सीमा ही मूल संरचना है।

Previous Year Questions (PYQ Compilation)

नीचे दिए गए प्रश्न UPSC, State PCS, SSC तथा अन्य परीक्षाओं में पूछे जा चुके हैं।


Q1. निम्नलिखित में से कौन-सा/से संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है?(UPSC Prelims 2013)

  1. गणतंत्रात्मक स्वरूप
  2. संघीयता
  3. न्यायिक समीक्षा

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

(a) केवल 1
(b) 1 और 2
(c) 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)


Q2. भारत के संविधान में ‘मूल संरचना’ सिद्धांत का प्रतिपादन किस मामले में किया गया था?(UPSC Prelims 2015)

(a) गोलकनाथ मामला
(b) केशवानंद भारती मामला
(c) मिनर्वा मिल्स मामला
(d) शंकरी प्रसाद मामला

उत्तर: (b)


Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा संविधान की मूल संरचना का हिस्सा नहीं है?(UPSC Prelims 2019)

(a) धर्मनिरपेक्षता
(b) संसदीय प्रणाली
(c) स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव
(d) नीति निदेशक तत्व

उत्तर: (d)


Q5. ‘मूल संरचना’ सिद्धांत किस वर्ष स्थापित हुआ?(UPPCS)

(a) 1967
(b) 1971
(c) 1973
(d) 1975

उत्तर: (c)


Q6. निम्न में से कौन-सा ‘मूल ढांचे’ का तत्व है?(BPSC)

  1. न्यायपालिका की स्वतंत्रता
  2. संघवाद
  3. संपत्ति का अधिकार

सही कूट चुनिए:

(a) केवल 1
(b) 1 और 2
(c) 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)


Q7. वामन राव मामला (1981) किससे संबंधित है?(MPPSC)

(a) मौलिक अधिकार
(b) मूल संरचना सिद्धांत की कट-ऑफ तिथि
(c) आरक्षण नीति
(d) चुनाव सुधार

उत्तर: (b)


Q8. ‘सीमित संशोधन शक्ति’ को मूल संरचना किस मामले में घोषित किया गया?(RPSC)

(a) केशवानंद भारती
(b) मिनर्वा मिल्स
(c) गोलकनाथ
(d) NJAC

उत्तर: (b)


Q9.‘मूल संरचना’ शब्द संविधान में कहाँ उल्लिखित है?

(a) अनुच्छेद 368
(b) प्रस्तावना
(c) भाग 3
(d) कहीं भी नहीं

उत्तर: (d)


Q10. 99वां संविधान संशोधन (NJAC) किस आधार पर रद्द हुआ?

(a) संघवाद का उल्लंघन
(b) धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन
(c) न्यायपालिका की स्वतंत्रता का उल्लंघन
(d) चुनाव सुधार

उत्तर: (c)

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Vikas Singh

लेखक: विकास सिंह

विकास सिंह 15+ वर्षों के शिक्षण अनुभव वाले General Studies (GS) शिक्षक हैं। उन्होंने GS Faculty के रूप में कार्य किया है तथा दो बार UPSC Mains परीक्षा में सम्मिलित हो चुके हैं। वे भारतीय राजव्यवस्था, इतिहास, भूगोल और सामान्य विज्ञान के विशेषज्ञ हैं। वर्तमान में वे वाराणसी में अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं और अपने YouTube चैनल Study2Study के माध्यम से शिक्षा जगत में योगदान दे रहे हैं।