संविधान संशोधन (अनुच्छेद 368) | प्रक्रिया, प्रकार, मूल ढांचा सिद्धांत | Complete Notes

भारतीय संविधान को ‘जीवंत दस्तावेज’ (Living Document) कहा जाता है क्योंकि यह समय की आवश्यकता के अनुसार बदला जा सकता है। अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद को संशोधन की शक्ति प्राप्त है।

संविधान संशोधन

संविधान संशोधन: प्रक्रिया और आधार (Process & Basis)

भारतीय संविधान न तो ब्रिटेन के संविधान की तरह पूरी तरह लचीला है और न ही अमेरिका के संविधान की तरह अत्यधिक कठोर। यह दोनों का एक अनूठा ‘संश्लेषण’ है, जो इसे एक ‘जीवंत दस्तावेज’ (Living Document) बनाता है।

1. संवैधानिक आधार (Constitutional Basis)

  • भाग और अनुच्छेद: संविधान के भाग 20 और अनुच्छेद 368 में संशोधन की शक्ति और प्रक्रिया दी गई है।
  • स्रोत: संशोधन की यह प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका के संविधान से प्रेरित है।
  • संसद की शक्ति: अनुच्छेद 368 संसद को संविधान के किसी भी हिस्से (मौलिक अधिकारों सहित) में संशोधन करने की शक्ति देता है, बशर्ते वह ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) को नुकसान न पहुँचाए।

2. संशोधन की प्रक्रिया (The Procedure)

अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन की प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में पूरी होती है:

  1. पेश करना: संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में पेश किया जा सकता है। इसे राज्य विधानमंडलों में पेश नहीं किया जा सकता।
  2. प्रस्तावक: इसे मंत्री या निजी सदस्य (Private Member) दोनों द्वारा पेश किया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।
  3. बहुमत: विधेयक को प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत से पारित होना चाहिए (सदन की कुल सदस्यता का 50% से अधिक + उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3 बहुमत)।
  4. अलग-अलग पारित होना: प्रत्येक सदन को विधेयक को अलग-अलग पारित करना अनिवार्य है। दोनों सदनों के बीच असहमति होने पर संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का कोई प्रावधान नहीं है।
  5. राज्यों की सहमति: यदि संशोधन ‘संघीय ढांचे’ (जैसे राष्ट्रपति का चुनाव, GST आदि) को प्रभावित करता है, तो उसे कम से कम आधे राज्यों के साधारण बहुमत की सहमति भी चाहिए।
  6. राष्ट्रपति की स्वीकृति: दोनों सदनों (और जहाँ आवश्यक हो, राज्यों) से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है।
    • 24वां संशोधन (1971): इसके बाद राष्ट्रपति संशोधन विधेयक पर अपनी सहमति देने के लिए बाध्य हैं। वे इसे न तो वापस कर सकते हैं और न ही पुनर्विचार के लिए भेज सकते हैं।
संविधान संशोधन: चरण दर चरण 1. प्रस्ताव LS या RS में (मंत्री/निजी सदस्य) 2. बहुमत विशेष बहुमत (No Joint Sitting) 3. राज्यों की राय सिर्फ संघीय मामलों में (आधे राज्यों का समर्थन) 4. राष्ट्रपति हस्ताक्षर अनिवार्य (बाध्यकारी शक्ति) याद रखें: संसद संविधान का ‘मूल ढांचा’ नहीं बदल सकती! Prepared for pdfnotes.in | By Vikas Singh Faculty of GS

💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

अनुच्छेद 368 के तहत केवल दो प्रकार के संशोधन (विशेष बहुमत और राज्यों की सहमति) ही आते हैं। साधारण बहुमत से किए गए संशोधन (जैसे राज्यों का नाम बदलना) तकनीकी रूप से ‘संविधान संशोधन अधिनियम’ की गिनती में नहीं आते।

यही कारण है कि भारत को ‘विनाशी राज्यों का अविनाशी संघ’ कहा जाता है क्योंकि राज्य की सीमाओं को तो बिना अनुच्छेद 368 की जटिल प्रक्रिया के बदला जा सकता है, लेकिन भारत के संघीय ढांचे को नहीं।

संविधान में संशोधन के प्रकार (Types of Amendments)

अनुच्छेद 368 दो प्रकार के संशोधनों की व्यवस्था करता है, लेकिन पूरे संविधान को देखा जाए तो संशोधन तीन तरीकों से किया जा सकता है:

1. संसद के साधारण बहुमत द्वारा (By Simple Majority)

यह अनुच्छेद 368 की सीमाओं के बाहर है। इसमें केवल ‘उपस्थित और मतदान करने वाले’ सदस्यों के 50% से अधिक बहुमत की आवश्यकता होती है।

  • प्रमुख उदाहरण:
    • नए राज्यों का प्रवेश या गठन (अनुच्छेद 2 और 3)।
    • नागरिकता की प्राप्ति और समाप्ति।
    • संसद में गणपूर्ति (Quorum) और सदस्यों के वेतन-भत्ते।
    • केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) का प्रशासन।

2. संसद के विशेष बहुमत द्वारा (By Special Majority)

संविधान के अधिकांश प्रावधान इसी प्रक्रिया से बदले जाते हैं। इसके लिए दो शर्तें पूरी करनी होती हैं:

  1. सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत (50% + 1)।
  2. उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई (2/3) बहुमत
  • प्रमुख उदाहरण:
    • मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)
    • राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP)।
    • वे सभी प्रावधान जो प्रथम और तृतीय श्रेणी में शामिल नहीं हैं।

यह सबसे कठिन प्रक्रिया है और इसका उपयोग तब होता है जब संविधान के ‘संघीय ढांचे’ (Federal Structure) में कोई बदलाव करना हो। इसमें संसद के विशेष बहुमत के साथ-साथ भारत के कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों का ‘साधारण बहुमत’ भी अनिवार्य है।

  • प्रमुख उदाहरण:
    • राष्ट्रपति का निर्वाचन और उसकी प्रक्रिया।
    • सातवीं अनुसूची की कोई भी सूची (संघ, राज्य या समवर्ती सूची)।
    • GST परिषद (Article 279A)
    • उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की शक्तियाँ।
    • स्वयं अनुच्छेद 368 (संशोधन की प्रक्रिया) में संशोधन।
संशोधन की गहराई (Levels of Amendment) साधारण बहुमत लचीला स्वरूप जैसे: नए राज्यों का नाम विशेष बहुमत कठोर + संतुलित जैसे: मौलिक अधिकार विशेष + राज्य अत्यधिक कठोर जैसे: संघीय ढांचा (GST)Designed for pdfnotes.in | Comprehensive Constitution Guide

तुलनात्मक तालिका: संशोधन के प्रकार

प्रकारबहुमत की आवश्यकताअनुच्छेद 368 के तहत?मुख्य विषय
साधारण बहुमत50% (उपस्थित + मतदान)नहींनए राज्य, नागरिकता, वेतन
विशेष बहुमतकुल का 50% + 2/3 (मतदान)हाँमौलिक अधिकार, DPSP
विशेष बहुमत + राज्यविशेष बहुमत + 1/2 राज्यहाँराष्ट्रपति चुनाव, GST, सुप्रीम कोर्ट

💡 ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

“राज्यों की सहमति के लिए कोई समय सीमा (Time Limit) निर्धारित नहीं है।” यदि संसद ने बिल पास कर दिया है, तो राज्य अपनी मर्जी से समय ले सकते हैं। हालांकि, एक बार आधे राज्यों ने सहमति दे दी, तो बाकी राज्यों की सहमति का इंतज़ार नहीं किया जाता और बिल सीधे राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है।

ऐतिहासिक संशोधन और मूल ढांचा (Historical Amendments & Basic Structure)

भारतीय संविधान में अब तक 105 से अधिक संशोधन हो चुके हैं, लेकिन कुछ संशोधनों और न्यायिक फैसलों ने देश की दिशा बदल दी।

1. संविधान के ‘महा-संशोधन’ (The Mega Amendments)

  • 42वां संशोधन (1976): इसे ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) कहा जाता है। इसने संविधान के लगभग हर हिस्से को प्रभावित किया।
    • प्रस्तावना में 3 नए शब्द जोड़े गए: समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता
    • 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।
    • संसद की शक्ति को न्यायपालिका से ऊपर करने की कोशिश की गई।
  • 44वां संशोधन (1978): यह 42वें संशोधन की ज्यादतियों को सुधारने के लिए लाया गया था।
    • संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की सूची से हटाकर कानूनी अधिकार (Art 300A) बनाया गया।
    • राष्ट्रीय आपातकाल के लिए ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को हटाकर ‘सशस्त्र विद्रोह’ किया गया।

2. मूल ढांचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)

संसद की संशोधन शक्ति असीमित है या नहीं? इस संघर्ष का समाधान 1973 के केशवानंद भारती मामले में हुआ।

  • उत्पत्ति: 24 अप्रैल, 1973 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय दिया।
  • सिद्धांत: कोर्ट ने कहा कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह इसके ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती।
  • मूल ढांचे के तत्व: कोर्ट ने इसकी कोई निश्चित सूची नहीं दी है, लेकिन समय-समय पर निम्नलिखित को मूल ढांचा माना गया है:
    1. संविधान की सर्वोच्चता।
    2. संसदीय शासन प्रणाली।
    3. शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers)।
    4. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review)।
    5. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव।
    6. धर्मनिरपेक्षता।

💡  ‘एग्जाम अलर्ट’ (Exam Alert):

‘वामन राव मामला (1981)’ :सुप्रीम कोर्ट ने इसमें स्पष्ट किया था कि मूल ढांचे का सिद्धांत 24 अप्रैल 1973 के बाद पारित होने वाले सभी संवैधानिक संशोधनों पर लागू होगा। यह ‘कट-ऑफ’ डेट अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछी जाती है।

मूल ढांचा (1973) केशवानंद भारती सीमित शक्ति (1980) मिनर्वा मिल्स शुरुआती संघर्ष (1951-67) शंकरी प्रसाद & गोलकनाथJudicial Evolution Analysis | By Vikas Singh | pdfnotes.in

महत्वपूर्ण संशोधन और ऐतिहासिक मामले

महत्वपूर्ण केस लॉ (Constitution Amendment & Basic Structure)

केसवर्षमुख्य प्रश्नसुप्रीम कोर्ट का निर्णयपरीक्षा ट्रिक
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ1951क्या संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन कर सकती है?हाँ, अनुच्छेद 368 के तहत कर सकती हैFR संशोधन संभव
गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य1967क्या संसद FR कम कर सकती है?नहीं, FR संशोधन नहींसंसद की शक्ति सीमित
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य1973क्या संसद असीमित संशोधन कर सकती है?संशोधन कर सकती है, पर मूल ढांचा नहीं बदल सकतीBasic Structure सिद्धांत
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ1980क्या संशोधन शक्ति असीमित है?नहीं, सीमित संशोधन शक्ति स्वयं मूल ढांचा हैLimited Power Doctrine
वामन राव बनाम भारत संघ19819वीं अनुसूची की वैधता?24 अप्रैल 1973 के बाद के कानून Basic Structure टेस्ट से गुजरेंगेCut-off Date याद रखें
📌 Cut-Off Date याद रखने की ट्रिक
24 अप्रैल 1973 = केशवानंद फैसला = Basic Structure लागू

मूल ढांचा सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)

मूल तत्वसंक्षिप्त अर्थकिस केस में प्रमुख
संविधान की सर्वोच्चतासंसद सर्वोच्च नहीं, संविधान सर्वोच्चकेशवानंद
गणतंत्रात्मक स्वरूपनिर्वाचित राष्ट्रपतिकेशवानंद
लोकतंत्रजनता का शासनइंदिरा गांधी केस
न्यायिक समीक्षाकोर्ट कानून रद्द कर सकता हैकेशवानंद
संघीयताकेंद्र-राज्य शक्ति संतुलनSR Bommai
धर्मनिरपेक्षताराज्य का कोई धर्म नहींSR Bommai
संसदीय प्रणालीमंत्रिपरिषद जिम्मेदारकेशवानंद
स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावचुनाव आयोग की स्वतंत्रताइंदिरा गांधी केस
शक्तियों का पृथक्करणविधायिका-कार्यपालिका-न्यायपालिका अलगकेशवानंद
सीमित संशोधन शक्तिसंसद असीमित नहींमिनर्वा मिल्स

महत्वपूर्ण संशोधन

संशोधनवर्षप्रमुख प्रावधान
1वां19519वीं अनुसूची
7वां1956राज्य पुनर्गठन
24वां1971संसद की संशोधन शक्ति
42वां1976Mini Constitution
44वां1978संपत्ति अधिकार हटाया
52वां1985दल-बदल कानून
61वां1988मतदान आयु 18 वर्ष
73वां1992पंचायती राज
74वां1992नगरपालिकाएँ
86वां2002शिक्षा मौलिक अधिकार
91वां2003मंत्रिपरिषद 15% सीमा
97वां2011सहकारी समितियाँ
101वां2016GST
102वां2018पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा।
103वां2019EWS आरक्षण
104वां2020SC/ST आरक्षण 10 साल बढ़ा, एंग्लो-इंडियन कोटा खत्म।
105वां2021OBC सूची शक्ति राज्य को

अति महत्वपूर्ण वन-लाइनर्स

  1. संविधान में संशोधन करने की शक्ति केवल संसद को प्राप्त है।
  2. संविधान के भाग 20 में संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन है।
  3. अनुच्छेद 368 संसद को संविधान और इसकी प्रक्रिया में संशोधन करने की शक्ति देता है।
  4. भारत में संविधान संशोधन की प्रक्रिया दक्षिण अफ्रीका से प्रेरित है।
  5. संसद संविधान के किसी भी प्रावधान (मौलिक अधिकारों सहित) में संशोधन कर सकती है।
  6. शर्त: संसद संविधान की ‘मूल संरचना’ (Basic Structure) को नहीं बदल सकती।
  7. ‘मूल संरचना’ का सिद्धांत 1973 के केशवानंद भारती मामले में दिया गया था।
  8. संशोधन का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में शुरू किया जा सकता है।
  9. इसे राज्य विधानमंडलों में पेश नहीं किया जा सकता।
  10. संशोधन विधेयक को मंत्री या निजी सदस्य दोनों पेश कर सकते हैं।
  11. विधेयक पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं है।
  12. विधेयक को प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत से पारित होना चाहिए।
  13. विशेष बहुमत = सदन की कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वालों का 2/3।
  14. प्रत्येक सदन को विधेयक को अलग-अलग पारित करना अनिवार्य है।
  15. दोनों सदनों के बीच असहमति होने पर संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का कोई प्रावधान नहीं है।
  16. यदि विधेयक संघीय ढांचे को प्रभावित करता है, तो इसे आधे राज्यों के साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है।
  17. राज्यों को विधेयक पर अपनी सहमति देने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है।
  18. संसद द्वारा पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
  19. 24वें संशोधन (1971) ने राष्ट्रपति के लिए संशोधन विधेयक पर हस्ताक्षर करना अनिवार्य बना दिया।
  20. राष्ट्रपति विधेयक को न तो वापस कर सकते हैं और न ही पुनर्विचार के लिए भेज सकते हैं।
  21. संविधान संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति को वीटो शक्ति (Veto Power) प्राप्त नहीं है।
  22. राष्ट्रपति की सहमति मिलते ही विधेयक ‘अधिनियम’ बन जाता है।
  23. साधारण बहुमत से किए गए संशोधन अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर होते हैं।
  24. अनुच्छेद 368 के तहत केवल दो प्रकार के संशोधन (विशेष बहुमत) ही आते हैं।
  25. संविधान में संशोधन करने की शक्ति ‘संवैधानिक शक्ति’ (Constituent Power) कहलाती है।
  26. राज्यों का निर्माण और सीमा परिवर्तन साधारण बहुमत से होता है।
  27. नागरिकता की प्राप्ति और समाप्ति साधारण बहुमत से बदली जा सकती है।
  28. संसद के कोरम (Quorum) में बदलाव साधारण बहुमत से संभव है।
  29. केंद्र-राज्य शक्तियों का बंटवारा विशेष बहुमत + राज्यों की सहमति से बदलता है।
  30. सातवीं अनुसूची में संशोधन के लिए राज्यों का समर्थन अनिवार्य है।
  31. उच्च न्यायालयों की शक्तियों में बदलाव के लिए राज्यों की सहमति चाहिए।
  32. संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव के लिए भी राज्यों की अनुमति आवश्यक है।
  33. जीएसटी (GST) परिषद का गठन राज्यों की सहमति से हुआ था।
  34. सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में बदलाव के लिए राज्यों का समर्थन चाहिए।
  35. स्वयं अनुच्छेद 368 में संशोधन के लिए भी राज्यों की सहमति अनिवार्य है।
  36. साधारण बहुमत वाले संशोधन अनुच्छेद 4, 169 और 239-A के तहत होते हैं।
  37. संविधान का संशोधन विधेयक लोकसभा में गिरने पर सरकार संकट में आ सकती है।
  38. संशोधन की प्रक्रिया भारत को ‘न तो लचीला और न ही कठोर’ बनाती है।
  39. ब्रिटेन का संविधान पूरी तरह लचीला है (साधारण बहुमत से संशोधन)।
  40. अमेरिका का संविधान बहुत कठोर है (संशोधन के लिए 3/4 राज्यों की सहमति)।
  41. प्रथम संशोधन (1951): भाषण की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाए गए।
  42. प्रथम संशोधन द्वारा ही 9वीं अनुसूची जोड़ी गई थी।
  43. 7वां संशोधन (1956): राज्यों के भाषाई आधार पर पुनर्गठन को लागू किया गया।
  44. 42वां संशोधन (1976): इसे ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) कहा जाता है।
  45. 42वें संशोधन द्वारा प्रस्तावना में ‘समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता’ शब्द जोड़े गए।
  46. 42वें संशोधन द्वारा ही 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए थे।
  47. 44वां संशोधन (1978): संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर ‘कानूनी अधिकार’ बनाया गया।
  48. 44वें संशोधन ने राष्ट्रीय आपातकाल के लिए ‘आंतरिक अशांति’ की जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द जोड़ा।
  49. 52वां संशोधन (1985): दल-बदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) जोड़ा गया।
  50. 61वां संशोधन (1988): मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।
  51. 73वां संशोधन (1992): पंचायती राज संस्थानों को संवैधानिक दर्जा मिला।
  52. 74वां संशोधन (1992): नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।
  53. 86वां संशोधन (2002): शिक्षा के अधिकार (6-14 वर्ष) को मौलिक अधिकार बनाया गया।
  54. 89वां संशोधन (2003): SC और ST के लिए अलग-अलग राष्ट्रीय आयोग बनाए गए।
  55. 91वां संशोधन (2003): मंत्रिपरिषद का आकार लोकसभा की कुल सदस्य संख्या का 15% सीमित किया गया।
  56. 101वां संशोधन (2016): वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू किया गया।
  57. 102वां संशोधन (2018): पिछड़ा वर्ग राष्ट्रीय आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला।
  58. 103वां संशोधन (2019): आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (EWS) को 10% आरक्षण।
  59. 104वां संशोधन (2020): लोकसभा/विधानसभा में SC/ST आरक्षण 10 साल बढ़ा, आंग्ल-भारतीय कोटा खत्म।
  60. 105वां संशोधन (2021): राज्यों को अपनी OBC सूची बनाने की शक्ति वापस मिली।
  61. शंकरी प्रसाद मामला (1951) में कोर्ट ने कहा संसद मौलिक अधिकारों को बदल सकती है।
  62. गोलकनाथ मामला (1967) में कोर्ट ने कहा संसद मौलिक अधिकारों में कटौती नहीं कर सकती।
  63. 24वें संशोधन ने गोलकनाथ फैसले के प्रभाव को खत्म कर दिया।
  64. मिनर्वा मिल्स मामला (1980) में कोर्ट ने ‘सीमित संशोधन शक्ति’ को मूल ढांचा माना।
  65. वामन राव मामला (1981) ने स्पष्ट किया कि मूल ढांचे का सिद्धांत 24 अप्रैल 1973 के बाद के कानूनों पर लागू होगा।
  66. संशोधन की शक्ति अनुच्छेद 368 से मिलती है, लेकिन प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
  67. संविधान संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति ‘जेबी वीटो’ (Pocket Veto) द्वारा नहीं रोक सकते।
  68. संसद संविधान को ‘पूरी तरह से नया’ नहीं बना सकती, केवल संशोधन कर सकती है।
  69. न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति को संशोधन द्वारा छीना नहीं जा सकता।
  70. संविधान संशोधन के मामले में लोकसभा और राज्यसभा की शक्तियां बिल्कुल बराबर हैं।
  71. राज्यों की सहमति वाले संशोधनों में ‘समय’ की कोई सीमा नहीं है।
  72. संविधान का संघात्मक लक्षण बिना राज्यों की अनुमति के नहीं बदला जा सकता।
  73. 24वें संशोधन के बाद संविधान संशोधन बिल पर राष्ट्रपति केवल हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य हैं।
  74. संशोधन शक्ति असीमित नहीं है, यह न्यायिक नियंत्रण के अधीन है।
  75. साधारण बहुमत वाले संशोधन ‘संविधान संशोधन अधिनियम’ (CAA) की गिनती में नहीं आते।

🎯 PYQ

Q1. संविधान संशोधन की शक्ति किस अनुच्छेद में है?

उत्तर: अनुच्छेद 368

Q2. ‘मूल ढांचा सिद्धांत’ किस केस में दिया गया?

उत्तर: केशवानंद भारती (1973)

Q3. 42वां संशोधन किस नाम से प्रसिद्ध है?

उत्तर: Mini Constitution

Q4. संशोधन विधेयक पर राष्ट्रपति क्या कर सकते हैं?

उत्तर: हस्ताक्षर करना अनिवार्य (वापस नहीं भेज सकते)

Q5. GST किस संशोधन द्वारा लागू हुआ?

उत्तर: 101वां संशोधन


FAQ

प्रश्न 1: क्या संविधान संशोधन के लिए जनमत संग्रह होता है?

नहीं।

प्रश्न 2: क्या संसद संविधान पूरी तरह बदल सकती है?

नहीं, मूल ढांचा नहीं बदल सकती।

प्रश्न 3: क्या संयुक्त बैठक होती है?

नहीं।

प्रश्न 4: क्या राष्ट्रपति संशोधन विधेयक रोक सकते हैं?

नहीं।

प्रश्न 5: क्या राज्यों की सहमति हमेशा जरूरी है?

नहीं, केवल संघीय विषयों पर।

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Vikas Singh

लेखक: विकास सिंह

विकास सिंह 15+ वर्षों के शिक्षण अनुभव वाले General Studies (GS) शिक्षक हैं। उन्होंने GS Faculty के रूप में कार्य किया है तथा दो बार UPSC Mains परीक्षा में सम्मिलित हो चुके हैं। वे भारतीय राजव्यवस्था, इतिहास, भूगोल और सामान्य विज्ञान के विशेषज्ञ हैं। वर्तमान में वे वाराणसी में अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं और अपने YouTube चैनल Study2Study के माध्यम से शिक्षा जगत में योगदान दे रहे हैं।