मैसूर मराठा और सिख संघर्ष : अंग्रेजी विस्तार के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध

मैसूर मराठा और सिख संघर्ष :18वीं और 19वीं शताब्दी में भारत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी केवल व्यापारिक संस्था नहीं रही, बल्कि वह राजनीतिक और सैन्य शक्ति बन चुकी थी।
हालाँकि, भारत में अंग्रेजों के विस्तार को कई शक्तिशाली भारतीय राज्यों ने कड़ा प्रतिरोध दिया। इनमें प्रमुख थे—

  • मैसूर राज्य
  • मराठा संघ
  • सिख साम्राज्य

📌 इन तीनों शक्तियों के साथ हुए संघर्षों ने अंग्रेजों को भारत की सर्वोच्च शक्ति बनाया, लेकिन साथ ही यह संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता-चेतना और प्रतिरोध की परंपरा के प्रतीक भी हैं।


मैसूर संघर्ष (Anglo-Mysore Wars)

मैसूर का महत्व

  • दक्षिण भारत का शक्तिशाली राज्य
  • संगठित सेना और आधुनिक हथियार
  • फ्रांसीसी समर्थन

प्रमुख शासक

  • हैदर अली
  • टीपू सुल्तान

मैसूर युद्धों की संख्या

कुल चार आंग्ल-मैसूर युद्ध हुए—

युद्धअवधि
प्रथम1767–1769
द्वितीय1780–1784
तृतीय1790–1792
चतुर्थ1799

प्रमुख विशेषताएँ

  • टीपू सुल्तान ने आधुनिक रॉकेट तकनीक अपनाई
  • अंग्रेजों के विरुद्ध फ्रांसीसी सहयोग
  • मैसूर युद्ध अंग्रेजों के लिए सबसे कठिन युद्धों में थे

चतुर्थ मैसूर युद्ध (1799)

  • श्रीरंगपट्टनम का युद्ध
  • टीपू सुल्तान वीरगति को प्राप्त

📌 टीपू सुल्तान को
👉 “भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी” भी कहा जाता है।


परिणाम

✔ मैसूर अंग्रेजों के अधीन
✔ दक्षिण भारत में अंग्रेजी प्रभुत्व
✔ संगठित भारतीय प्रतिरोध का अंत


मराठा संघर्ष (Anglo-Maratha Wars)

मराठा शक्ति का स्वरूप

मराठा शक्ति एक संघात्मक व्यवस्था थी, जिसमें शामिल थे—

  • पेशवा (पुणे)
  • सिंधिया (ग्वालियर)
  • होल्कर (इंदौर)
  • भोंसले (नागपुर)

आंग्ल-मराठा युद्ध

युद्धअवधि
प्रथम1775–1782
द्वितीय1803–1805
तृतीय1817–1818

संघर्ष के कारण

  • मराठा संघ की आंतरिक फूट
  • पेशवा की कमजोरी
  • अंग्रेजों की सहायक संधि नीति

निर्णायक युद्ध

  • तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1817–18)

परिणाम

✔ पेशवा पद समाप्त
✔ मराठा संघ का विघटन
✔ मध्य और पश्चिम भारत अंग्रेजों के अधीन

📌 मराठा पतन के बाद अंग्रेजों के लिए
👉 भारत में कोई बड़ी राजनीतिक चुनौती शेष नहीं रही


सिख संघर्ष (Anglo-Sikh Wars)

सिख साम्राज्य का उदय

  • महाराजा रणजीत सिंह
  • राजधानी – लाहौर
  • अनुशासित खालसा सेना

आंग्ल-सिख युद्ध

युद्धअवधि
प्रथम1845–1846
द्वितीय1848–1849

संघर्ष के कारण

  • रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद राजनीतिक अस्थिरता
  • दरबार की साज़िशें
  • अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति

निर्णायक युद्ध

  • गुजरात का युद्ध (1849)

परिणाम

✔ पंजाब का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय
✔ सिख सैन्य शक्ति का अंत
✔ उत्तर-पश्चिम भारत पर अंग्रेजों का नियंत्रण


तुलनात्मक विश्लेषण

शक्तिप्रमुख नेतासंघर्ष की प्रकृतिपरिणाम
मैसूरटीपू सुल्तानसंगठित प्रतिरोधहार
मराठापेशवाआंतरिक फूटविघटन
सिखरणजीत सिंहअनुशासित सेनाविलय

ऐतिहासिक महत्व

अंग्रेजों के लिए

  • पूरे भारत पर राजनीतिक नियंत्रण
  • क्षेत्रीय शक्तियों का अंत
  • ब्रिटिश साम्राज्य का सुदृढ़ीकरण

भारत के लिए

  • स्वतंत्र भारतीय राज्यों का पतन
  • औपनिवेशिक शासन का विस्तार
  • भविष्य के राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि

📌 इन संघर्षों ने यह सिद्ध किया कि
👉 भारतीय प्रतिरोध मजबूत था, परंतु एकता का अभाव घातक सिद्ध हुआ।


परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

✔ टीपू सुल्तान – मैसूर
✔ श्रीरंगपट्टनम युद्ध – 1799
✔ तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध – 1817–18
✔ महाराजा रणजीत सिंह – सिख साम्राज्य
✔ पंजाब विलय – 1849


निष्कर्ष (Conclusion)

मैसूर, मराठा और सिख संघर्ष अंग्रेजी विस्तार के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध की अंतिम मजबूत दीवारें थीं।
हालाँकि ये शक्तियाँ अंततः पराजित हुईं, लेकिन इन्होंने अंग्रेजों को यह स्पष्ट कर दिया कि भारत को जीतना आसान नहीं है।

👉 यदि इन शक्तियों में एकता और समन्वय होता, तो भारत का इतिहास भिन्न हो सकता था।

“इन संघर्षों ने भारत को पराजय नहीं, बल्कि भविष्य के स्वतंत्रता संग्राम की चेतना दी।”


FAQs (Frequently Asked Questions)

Q1. मैसूर संघर्ष में सबसे महत्वपूर्ण शासक कौन था?

टीपू सुल्तान।

Q2. मराठा संघ क्यों विफल हुआ?

आंतरिक फूट और अंग्रेजों की कूटनीति के कारण।

Q3. सिख साम्राज्य का पतन कब हुआ?

1849 में, द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध के बाद।

Q4. अंग्रेजों को सबसे कड़ा प्रतिरोध किसने दिया?

मैसूर राज्य ने।

Q5. इन संघर्षों का सबसे बड़ा परिणाम क्या था?

पूरे भारत पर अंग्रेजी राजनीतिक नियंत्रण।

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