द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पूरी दुनिया दो महाशक्तियों—अमेरिका (USA) और सोवियत संघ (USSR) के बीच बंट रही थी, तब दुनिया के कई नए स्वतंत्र देशों ने किसी भी गुट में शामिल न होने का फैसला किया। इसी विचारधारा को ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (Non-Aligned Movement) कहा जाता है।
1. गुटनिरपेक्षता का अर्थ क्या है?
गुटनिरपेक्षता का अर्थ ‘तटस्थता’ (Neutrality) या ‘अलगाववाद’ नहीं है। इसका अर्थ है—विश्व की किसी भी सैन्य शक्ति या गुट का हिस्सा न बनना और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करना। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विवेक और देश के हितों के आधार पर निर्णय लेना है।
2. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना और इतिहास
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव किसी एक घटना से नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया के तहत पड़ी:
- बांडुंग सम्मेलन (1955): इंडोनेशिया के बांडुंग में आयोजित इस सम्मेलन में 29 एशियाई और अफ्रीकी देशों ने भाग लिया। यहाँ उपनिवेशवाद के खिलाफ एकता की बात की गई, जिसने NAM का आधार तैयार किया।
- प्रथम शिखर सम्मेलन (1961): NAM का पहला आधिकारिक शिखर सम्मेलन 1961 में बेलग्रेड (यूगोस्लाविया) में हुआ। इसमें 25 देशों ने भाग लिया था।
🤝 मुख्य संस्थापक नेता (The Big Five)
NAM को खड़ा करने में इन 5 नेताओं का सबसे बड़ा हाथ था:
- पंडित जवाहरलाल नेहरू (भारत)
- जोसिप ब्रोज़ टीटो (यूगोस्लाविया)
- गमाल अब्दुल नासिर (मिस्र)
- सुकर्णो (इंडोनेशिया)
- क्वामे एनक्रूमा (घाना)
3. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मुख्य उद्देश्य
- साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध: उन देशों की आजादी का समर्थन करना जो अभी भी गुलाम थे।
- रंगभेद (Apartheid) का विरोध: दक्षिण अफ्रीका जैसी जगहों पर चल रहे नस्लीय भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाना।
- विश्व शांति और निशस्त्रीकरण: परमाणु हथियारों की होड़ को रोकना और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व (Peaceful Co-existence) को बढ़ावा देना।
- नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO): विकासशील देशों के आर्थिक विकास के लिए वैश्विक स्तर पर बदलाव की मांग करना।
4. गुटनिरपेक्ष आंदोलन और भारत
भारत के लिए गुटनिरपेक्षता केवल एक नीति नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सिद्धांत रहा है।
- नेहरू की दृष्टि: नेहरू जी का मानना था कि भारत को अपनी गरीबी और विकास पर ध्यान देना चाहिए, न कि महाशक्तियों के झगड़ों में पड़ना चाहिए।
- सकारात्मक भूमिका: भारत ने शीत युद्ध के दौरान कई संकटों (जैसे कोरिया युद्ध) में मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
- चुनौतियां: 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारत की इस नीति पर सवाल भी उठे, लेकिन भारत ने हमेशा स्पष्ट किया कि गुटनिरपेक्षता का मतलब राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करना नहीं है।
5. शीत युद्ध के बाद NAM की प्रासंगिकता (Relevance)
1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद कई लोगों ने कहा कि अब NAM की जरूरत नहीं है। लेकिन आज भी यह उतना ही जरूरी है क्योंकि:
- एकध्रुवीय विश्व का विरोध: यह विकासशील देशों को एक मंच देता है ताकि वे किसी एक महाशक्ति (जैसे अमेरिका या अब चीन) के दबाव में न आएं।
- आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन: इन वैश्विक समस्याओं पर विकासशील देशों की साझा आवाज उठाना।
- आर्थिक सहयोग: ‘दक्षिण-दक्षिण सहयोग’ (South-South Cooperation) को बढ़ावा देना।
6. गुटनिरपेक्षता के 5 सिद्धांत (पंचशील के आधार पर)
- एक-दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान।
- एक-दूसरे पर आक्रमण न करना।
- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
- समानता और पारस्परिक लाभ।
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
📝 UPSC / SSC Exam Oriented One-liners
- NAM का मुख्यालय जकार्ता (इंडोनेशिया) में स्थित है।
- वर्तमान में इसके कुल 120 सदस्य देश हैं।
- 7वां शिखर सम्मेलन (1983) नई दिल्ली में हुआ था, जिसकी अध्यक्षता इंदिरा गांधी ने की थी।
- NAM का कोई स्थायी संविधान या स्थायी सचिवालय (Secretariat) नहीं है।
- 18वां शिखर सम्मेलन (2019) बाकू (अजरबैजान) में आयोजित हुआ था।