क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और प्रथम विश्व युद्ध (1907–1918)

1905 के बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन के बाद भारतीय राष्ट्रवाद ने एक उग्र और क्रांतिकारी रूप धारण किया।
जहाँ उदारवादी संवैधानिक सुधारों में विश्वास रखते थे, वहीं क्रांतिकारियों का मानना था कि सशस्त्र संघर्ष और बलिदान के बिना स्वतंत्रता संभव नहीं।

📌 इसी कालखंड में प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया अवसर और नई चुनौतियाँ दीं।


क्रांतिकारी राष्ट्रवाद क्या था?

क्रांतिकारी राष्ट्रवाद वह विचारधारा थी जिसमें—

  • विदेशी शासन को बलपूर्वक समाप्त करने का लक्ष्य
  • गुप्त संगठन और सशस्त्र संघर्ष
  • व्यक्तिगत बलिदान और वीरता पर बल

📌 इसका नारा था—
👉 “स्वराज्य बलिदान से मिलेगा।”


क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के कारण

1️⃣ बंगाल विभाजन (1905)

  • सरकारी दमन
  • स्वदेशी आंदोलन पर प्रतिबंध

2️⃣ उदारवादी राजनीति से मोहभंग

  • संवैधानिक तरीकों की विफलता
  • ठोस राजनीतिक परिणामों का अभाव

3️⃣ विदेशी क्रांतिकारी विचारों का प्रभाव

  • आयरलैंड, रूस, इटली की क्रांतियाँ

4️⃣ युवाओं में तीव्र राष्ट्रभाव

  • छात्र और शिक्षित वर्ग की भागीदारी

भारत में प्रमुख क्रांतिकारी संगठन

बंगाल

  • अनुशीलन समिति
  • युगांतर दल

महाराष्ट्र

  • अभिनव भारत (वीर सावरकर से संबद्ध)

पंजाब

  • क्रांतिकारी गुट और गुप्त समितियाँ

प्रमुख क्रांतिकारी नेता

  • अरविंद घोष
  • वीर सावरकर
  • खुदीराम बोस
  • रास बिहारी बोस

📌 इन क्रांतिकारियों ने युवाओं में
👉 साहस और बलिदान की भावना जगाई।


गदर आंदोलन (Ghadar Movement)

स्थापना

  • 1913, अमेरिका और कनाडा
  • नेता: लाला हरदयाल

उद्देश्य

  • भारत में सशस्त्र क्रांति
  • ब्रिटिश सेना में विद्रोह

📌 गदर आंदोलन
👉 प्रवासी भारतीयों का पहला संगठित क्रांतिकारी प्रयास था।


प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) और भारत

ब्रिटिश नीति

  • भारत से सैनिक और संसाधन
  • भारतीयों से सहयोग की अपेक्षा

भारतीय प्रतिक्रिया

  • उदारवादी और कांग्रेस का प्रारंभिक समर्थन
  • क्रांतिकारियों ने युद्ध को अवसर माना

📌 युद्ध ने
👉 ब्रिटिश शासन की कमजोरी उजागर की।


युद्धकालीन क्रांतिकारी गतिविधियाँ

प्रमुख प्रयास

  • सेना में विद्रोह की योजनाएँ
  • विदेशी शक्तियों से संपर्क
  • षड्यंत्र और सशस्त्र कार्रवाइयाँ

असफलता के कारण

  • गुप्त सूचनाएँ लीक
  • ब्रिटिश दमन
  • संगठित समन्वय का अभाव

होम रूल आंदोलन (1916)

नेतृत्व

  • बाल गंगाधर तिलक
  • एनी बेसेंट

उद्देश्य

  • स्वशासन (Home Rule)
  • संवैधानिक आंदोलन को पुनर्जीवित करना

📌 इसने
👉 जन-राजनीति को पुनः सक्रिय किया।


क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की सीमाएँ

  • व्यापक जनसमर्थन का अभाव
  • संगठनात्मक कमजोरी
  • अत्यधिक दमन
  • नेतृत्व का बिखराव

📌 फिर भी,
👉 इसका मनोवैज्ञानिक और वैचारिक प्रभाव गहरा था।


राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव

सकारात्मक प्रभाव

  • बलिदान की प्रेरणा
  • युवाओं का राजनीतिकरण
  • उग्र राष्ट्रवाद की परंपरा

दीर्घकालिक प्रभाव

  • गांधी युग के आंदोलनों के लिए पृष्ठभूमि
  • पूर्ण स्वराज्य की मांग का मार्ग प्रशस्त

ऐतिहासिक महत्व

भारत के लिए

  • स्वतंत्रता संघर्ष का उग्र चरण
  • राष्ट्रवाद की तीव्रता

विश्व युद्ध के संदर्भ में

  • भारत की सामरिक और आर्थिक भूमिका
  • ब्रिटिश सत्ता की सीमाएँ उजागर

📌 प्रथम विश्व युद्ध के बाद
👉 राष्ट्रीय आंदोलन अधिक व्यापक और संगठित हुआ।


परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

✔ क्रांतिकारी राष्ट्रवाद – 1907 के बाद
✔ गदर आंदोलन – 1913
✔ प्रथम विश्व युद्ध – 1914–1918
✔ होम रूल आंदोलन – 1916
✔ प्रमुख क्रांतिकारी – खुदीराम बोस, सावरकर


निष्कर्ष (Conclusion)

क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और प्रथम विश्व युद्ध ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा और दिशा दी।
यद्यपि क्रांतिकारी प्रयास सैन्य रूप से सफल नहीं हुए,
लेकिन उन्होंने—

  • भय का वातावरण तोड़ा
  • ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी
  • स्वतंत्रता के लिए पूर्ण समर्पण की मिसाल दी

“क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता की मशाल जलाई, जिसे आगे चलकर जन-आंदोलन ने प्रज्वलित रखा।”


FAQs (Frequently Asked Questions)

Q1. क्रांतिकारी राष्ट्रवाद क्या था?

विदेशी शासन को सशस्त्र संघर्ष से समाप्त करने की विचारधारा।

Q2. गदर आंदोलन का उद्देश्य क्या था?

भारत में सशस्त्र क्रांति और सैनिक विद्रोह।

Q3. प्रथम विश्व युद्ध का राष्ट्रीय आंदोलन पर क्या प्रभाव पड़ा?

इससे आंदोलन को नया अवसर और तीव्रता मिली।

Q4. होम रूल आंदोलन किसने शुरू किया?

बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने।

Q5. क्रांतिकारी राष्ट्रवाद क्यों असफल रहा?

जनसमर्थन और संगठन की कमी के कारण।

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