ब्रिटिश शासन का मुख्य उद्देश्य भारत से अधिकतम राजस्व प्राप्त करना था।
कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी, इसलिए अंग्रेजों ने भूमि से राजस्व वसूली के लिए अलग-अलग भू-राजस्व व्यवस्थाएँ लागू कीं।
📌 इन नीतियों का प्रभाव केवल आर्थिक नहीं था, बल्कि इसने
- किसानों की स्थिति
- ग्रामीण समाज
- भारतीय कृषि संरचना
को गहराई से प्रभावित किया।
ब्रिटिश काल की तीन प्रमुख भू-राजस्व प्रणालियाँ थीं—
- स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement)
- रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari System)
- महालवाड़ी व्यवस्था (Mahalwari System)
स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement)
परिचय
स्थायी बंदोबस्त की शुरुआत 1793 में बंगाल, बिहार और उड़ीसा में की गई।
प्रवर्तक
- लॉर्ड कॉर्नवालिस
प्रमुख विशेषताएँ
- जमींदारों को भूमि का स्वामी बनाया गया
- किसानों और सरकार के बीच जमींदार मध्यस्थ बने
- राजस्व की राशि स्थायी कर दी गई
- समय पर कर न देने पर भूमि नीलाम
उद्देश्य
- राजस्व संग्रह में स्थिरता
- अंग्रेजों का प्रशासनिक बोझ कम करना
- जमींदार वर्ग को अंग्रेजों का समर्थक बनाना
प्रभाव
✔ सरकार को निश्चित आय
❌ किसानों का अत्यधिक शोषण
❌ जमींदार वर्ग का उदय
❌ कृषि विकास अवरुद्ध
📌 स्थायी बंदोबस्त ने
👉 किसानों को दासत्व की ओर धकेल दिया।
रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari System)
परिचय
रैयतवाड़ी व्यवस्था दक्षिण और पश्चिम भारत में लागू की गई।
प्रवर्तक
- थॉमस मुनरो
- रीड
प्रमुख विशेषताएँ
- किसान (रैयत) को भूमि का स्वामी माना गया
- किसान सीधे सरकार को कर देता था
- राजस्व दरें ऊँची और अस्थिर
- प्राकृतिक आपदा में भी कर अनिवार्य
लागू क्षेत्र
- मद्रास
- बॉम्बे
- असम
- कूर्ग
प्रभाव
✔ जमींदार वर्ग समाप्त
❌ किसानों पर सीधा सरकारी दबाव
❌ कर अदायगी में असमर्थता
❌ भूमि नीलामी और ऋणग्रस्तता
📌 यह व्यवस्था
👉 सैद्धांतिक रूप से किसान-हितैषी
👉 व्यावहारिक रूप से दमनकारी थी।
महालवाड़ी व्यवस्था (Mahalwari System)
परिचय
महालवाड़ी व्यवस्था उत्तर और मध्य भारत में लागू की गई।
प्रवर्तक
- होल्ट मैकेंजी
प्रमुख विशेषताएँ
- गाँव या महाल को इकाई माना गया
- सामूहिक रूप से राजस्व निर्धारण
- किसान और मुखिया उत्तरदायी
- राजस्व समय-समय पर संशोधित
लागू क्षेत्र
- उत्तर प्रदेश
- पंजाब
- मध्य भारत
प्रभाव
✔ सामूहिक उत्तरदायित्व
❌ भारी कर भार
❌ बार-बार संशोधन से अस्थिरता
❌ कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव
📌 यह व्यवस्था
👉 स्थायी और रैयतवाड़ी के बीच समझौता थी।
तीनों व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन
| आधार | स्थायी | रैयतवाड़ी | महालवाड़ी |
|---|---|---|---|
| इकाई | जमींदार | किसान | गाँव |
| प्रवर्तक | कॉर्नवालिस | मुनरो | मैकेंजी |
| कर | स्थायी | परिवर्तनीय | परिवर्तनीय |
| किसान स्थिति | सबसे खराब | खराब | अपेक्षाकृत बेहतर |
| क्षेत्र | बंगाल | दक्षिण | उत्तर |
ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों का समग्र प्रभाव
आर्थिक प्रभाव
- कृषि उत्पादन में गिरावट
- ग्रामीण गरीबी
- अकाल और भूखमरी
सामाजिक प्रभाव
- किसान-साहूकार संघर्ष
- जमींदार-किसान विभाजन
- ग्रामीण समाज का विघटन
राजनीतिक प्रभाव
- किसान विद्रोह
- 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि
- राष्ट्रीय आंदोलन को बल
📌 भू-राजस्व नीतियाँ
👉 ब्रिटिश शोषण की आर्थिक रीढ़ थीं।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
✔ स्थायी बंदोबस्त – 1793
✔ लॉर्ड कॉर्नवालिस – स्थायी व्यवस्था
✔ रैयतवाड़ी – थॉमस मुनरो
✔ महालवाड़ी – होल्ट मैकेंजी
✔ सबसे शोषणकारी – स्थायी बंदोबस्त
निष्कर्ष (Conclusion)
ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्थाएँ भारत की कृषि और ग्रामीण समाज के लिए विनाशकारी सिद्ध हुईं।
इन नीतियों का उद्देश्य कृषि सुधार नहीं, बल्कि
👉 अधिकतम राजस्व संग्रह था।
स्थायी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी—तीनों व्यवस्थाओं ने
- किसानों को निर्धन
- कृषि को पिछड़ा
- और भारत को आर्थिक रूप से कमजोर
बना दिया।
“ब्रिटिश भू-राजस्व नीतियों ने भारत की धरती से नहीं, बल्कि किसानों के जीवन से कर वसूला।”
FAQs (Frequently Asked Questions)
Q1. स्थायी बंदोबस्त किसने शुरू किया?
लॉर्ड कॉर्नवालिस ने।
Q2. रैयतवाड़ी व्यवस्था का मुख्य दोष क्या था?
उच्च और अनिश्चित कर।
Q3. महालवाड़ी व्यवस्था कहाँ लागू थी?
उत्तर और मध्य भारत में।
Q4. सबसे अधिक शोषणकारी व्यवस्था कौन-सी थी?
स्थायी बंदोबस्त।
Q5. भू-राजस्व नीतियाँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?
क्योंकि उन्होंने भारतीय कृषि और समाज को गहराई से प्रभावित किया।