20वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एक नए मोड़ पर पहुँचा। 1905 में बंगाल विभाजन ने भारतीयों की राजनीतिक चेतना को झकझोर दिया और इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन का उदय हुआ।
यह आंदोलन केवल प्रशासनिक निर्णय का विरोध नहीं था, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक स्वाभिमान और जन-आंदोलन का प्रतीक बन गया।
📌 बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने
👉 उदारवादी राजनीति से उग्र राष्ट्रवाद की ओर संक्रमण को गति दी।
बंगाल विभाजन (1905)
घोषणा
- तिथि: 16 अक्टूबर 1905
- घोषणा करने वाले: लॉर्ड कर्ज़न
प्रशासनिक तर्क
- बंगाल का विशाल आकार
- प्रशासनिक सुविधा
वास्तविक उद्देश्य
- फूट डालो और राज करो
- हिंदू–मुस्लिम विभाजन
- उभरते राष्ट्रवाद को कमजोर करना
📌 बंगाल को दो भागों में बाँटा गया—
- पश्चिम बंगाल (हिंदू बहुल)
- पूर्वी बंगाल और असम (मुस्लिम बहुल)
विभाजन विरोधी आंदोलन
प्रारंभ
- बंगाल के बुद्धिजीवियों और छात्रों द्वारा
- शांतिपूर्ण सभाएँ, जुलूस, याचिकाएँ
राष्ट्रीय स्वरूप
- पूरे भारत में समर्थन
- राजनीतिक मुद्दा राष्ट्रीय एजेंडा बना
📌 यह आंदोलन
👉 भारत का पहला व्यापक जनांदोलन था।
स्वदेशी आंदोलन (Swadeshi Movement)
अर्थ
स्वदेशी = अपने देश की वस्तुओं का उपयोग
उद्देश्य
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
- स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा
- आर्थिक आत्मनिर्भरता
📌 स्वदेशी आंदोलन
👉 आर्थिक राष्ट्रवाद का सशक्त रूप था।
स्वदेशी आंदोलन के कार्यक्रम
1️⃣ बहिष्कार (Boycott)
- विदेशी कपड़े, चीनी, नमक का बहिष्कार
- विदेशी वस्त्रों की सार्वजनिक होली
2️⃣ स्वदेशी (Promotion of Indigenous Goods)
- खादी और हस्तशिल्प
- स्वदेशी मिलों और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन
3️⃣ राष्ट्रीय शिक्षा
- राष्ट्रीय विद्यालय और कॉलेज
- विदेशी नियंत्रण से मुक्त शिक्षा
4️⃣ स्वावलंबन और आत्मशक्ति
- बैंक, बीमा, सहकारी संस्थाएँ
- महिला और छात्र सहभागिता
प्रमुख नेता और संगठन
उग्रवादी नेतृत्व
- बाल गंगाधर तिलक
- बिपिन चंद्र पाल
- लाला लाजपत राय
- अरविंद घोष
📌 इन्हें “लाल–बाल–पाल” कहा जाता है।
आंदोलन का प्रसार
- बंगाल से महाराष्ट्र, पंजाब, मद्रास तक
- छात्रों, महिलाओं और मजदूरों की भागीदारी
- प्रेस और साहित्य की सक्रिय भूमिका
सरकारी दमन
- प्रेस अधिनियम
- गिरफ्तारी और निर्वासन
- सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध
📌 दमन ने आंदोलन की तीव्रता और बढ़ा दी।
आंदोलन की सीमाएँ
- ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित प्रभाव
- आर्थिक संसाधनों की कमी
- नेतृत्व में मतभेद
- 1907 सूरत विभाजन (उदारवादी–उग्रवादी)
विभाजन की वापसी (1911)
निर्णय
- 1911 में बंगाल विभाजन रद्द
- राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित
📌 यह
👉 जन-दबाव की ऐतिहासिक जीत थी।
ऐतिहासिक महत्व
राष्ट्रीय आंदोलन के लिए
- जन-आधारित राजनीति
- उग्र राष्ट्रवाद का उदय
- आर्थिक स्वराज्य की अवधारणा
समाज के लिए
- महिला और छात्र सहभागिता
- राष्ट्रीय शिक्षा का विकास
- सांस्कृतिक पुनर्जागरण
📌 स्वदेशी आंदोलन
👉 गांधी युग के आंदोलनों की पूर्वपीठिका बना।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
✔ बंगाल विभाजन – 1905
✔ विभाजन रद्द – 1911
✔ स्वदेशी आंदोलन – 1905–08
✔ लाल–बाल–पाल – उग्रवादी नेता
✔ सूरत विभाजन – 1907
निष्कर्ष (Conclusion)
बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा और गति दी।
इसने भारतीयों को सिखाया कि
👉 राजनीतिक स्वतंत्रता आर्थिक आत्मनिर्भरता के बिना अधूरी है।
“स्वदेशी आंदोलन ने भारत को विरोध से निर्माण की ओर मोड़ा।”
FAQs (Frequently Asked Questions)
Q1. बंगाल विभाजन क्यों किया गया था?
राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने और सांप्रदायिक विभाजन के लिए।
Q2. स्वदेशी आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी उद्योगों का विकास।
Q3. लाल–बाल–पाल कौन थे?
उग्र राष्ट्रवाद के प्रमुख नेता—तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय।
Q4. बंगाल विभाजन कब रद्द हुआ?
1911 में।
Q5. स्वदेशी आंदोलन का दीर्घकालिक प्रभाव क्या था?
जन-आंदोलन की परंपरा और आर्थिक राष्ट्रवाद का विकास।